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Kurukshetra News: परीक्षा व्यवस्था पर किया मंथन 50-50 मूल्यांकन की ओर बढ़ेगा कुवि

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 19 Sep 2026 02:16 AM IST
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Deliberations held on the examination system; Kumaun University to move towards a 50-50 evaluation model.
कुरुक्षेत्र। जन परीक्षा संवाद  कार्यक्रम के तहत अपने विचार रखते हुए कुलपति प्रो सोमनाथ सचदेवा। - फोटो : Archive
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में परीक्षा व्यवस्था को विद्यार्थी केंद्रित बनाने की तैयारी चल रही है। इसके तहत आंतरिक और बाहरी मूल्यांकन के अनुपात में बदलाव किया जाएगा। कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। वर्तमान में विश्वविद्यालय में 30 फीसदी आंतरिक और 70 फीसदी बाहरी मूल्यांकन की व्यवस्था है। इसे धीरे-धीरे 50-50 के अनुपात की ओर ले जाने पर विचार हो रहा है।
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यह बात उन्होंने सीनेट हॉल में आयोजित एक दिवसीय जन परीक्षा संवाद कार्यशाला में कही। इस कार्यशाला का आयोजन आईक्यूएसी, परीक्षा शाखा और भारतीय शिक्षण मंडल ने मिलकर किया था। इसमें परीक्षा व्यवस्था को न्यायपूर्ण, पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी बनाने पर मंथन हुआ। कुलगुरु ने कहा कि परीक्षा केवल विद्यार्थियों को पास या फेल करने की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए।
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प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने आकलन और मूल्यांकन के बीच का अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि मूल्यांकन मुख्य रूप से निर्णय देने की प्रक्रिया है। वहीं, आकलन एक निरंतर और सुधारात्मक प्रक्रिया होती है। बाहरी परीक्षा अधिकतर निर्णयात्मक होती है, जबकि आंतरिक मूल्यांकन को सीखने से जोड़ा जा सकता है। परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए पूरी प्रक्रिया का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में प्रत्येक विषय के पाठ्यक्रम परिणाम और अधिगम परिणाम निर्धारित किए जाते हैं लेकिन चुनौती यह है कि प्रश्नपत्र के माध्यम से इनका सही आकलन हो। उन्होंने ब्लूम टैक्सानॉमी का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्यार्थियों में याद रखने, समझने, विश्लेषण करने, मूल्यांकन करने और सृजन करने जैसी अलग-अलग क्षमताएं होती हैं। प्रश्नपत्र तैयार करते समय सीखने के इन स्तरों को ध्यान में रखना चाहिए।
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परीक्षा शाखा की प्रक्रिया का भी हो परीक्षण : परीक्षा सुरक्षा और जवाबदेही पर चर्चा करते हुए प्रो. सचदेवा ने कहा कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक परीक्षण की व्यवस्था होती है, लेकिन परीक्षा शाखा की पूरी प्रक्रिया का नियमित प्रक्रिया परीक्षण भी होना चाहिए।

पुराने परीक्षा मामलों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कई वर्ष बाद किसी अनियमितता की जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। संबंधित अधिकारी या कर्मचारी उपलब्ध नहीं होते और यह पता लगाना भी कठिन होता है कि उस समय कौन व्यक्ति किस जिम्मेदारी पर था।
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