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सरकार ऐसे तो नहीं होगा किसानों का बेड़ा पार
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बढ़ती फसलोत्पादन लागत और जमीनों के किराये के चलते किसानों की हालत यह हो गई है कि यदि उन्होंने ठेके (किराये) पर जमीन लेकर खेतीबाड़ी करना शुरू किया है तो बड़ा घाटा उठाना पड़ रहा है, हालांकि यदि ट्रैक्टर-ट्राली आदि संसाधन व जमीन अपनी है तो गनीमत है। अनाज मंडियों में फसल की यदि यही दुर्गति रही तो वह दिन दूर नहीं कि अपनी जमीन पर भी परंपरागत खेती करने वाले किसान का मन उचट सकता है। हाल यह है कि मंडलायुक्त, उपायुक्त जैसे अफसरों के साथ मुख्यमंत्री तक के अनाज मंडी पहुंचने के बाद भी धान खरीद व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं आया है। सोमवार को भी राइस मिलर्स व अन्य खरीदार बिना किसी यंत्र के मुट्ठी में धान भरकर ही मनमाफिक नमी बताकर एमएसपी से कम रेट पर धान खरीदते दिखे।
बजीरपुर गांव के किसान चरण जीत सिंह लंबे समय से खेती किसानी करते हैं, उन्होंने बताया कि परिवार में दर्जनभर लोग हैं, 36 एकड़ जमीन पर धान लगाया, जिसमें 10 एकड़ में ऊषा-44 प्रजाति का धान लगाया, जिसका उत्पादन 250 क्विंटल रहा और 26 एकड़ में पीआर 121 लगाया, जिसकी पैदावार 520 क्विंटल रही। पीआर धान को राइस मिलर्स ने मुट्ठी से नाप कर नमी को अधिक बताकर 1888 की बजाय 1850 रुपये में तो ऊषा 44 को 1800 रुपये के भाव में खरीदा। जो कुल 14.62 लाख रुपये का हुआ। अपनी जमीन, अपने संसाधन, उनकी टूट फूट, मरम्मत, अपनी व परिजनों की मेहनत मजदूरी को छोड़ दिया जाए तो नौ लाख रुपये लागत आई है। इसमें करीब 5.62 लाख रुपये की बचत हुई है। इसमें आढ़तियों की देनदारी का ब्याज भी देना है, ट्रैक्टर ट्रालियों की मरम्मत भी करानी है। कुल मिलाकर परिवार का खर्च बुश्किल से ही चलता है।
-उत्तर प्रदेश के बिड़ौली (शामली) निवासी मीर हसन भी करनाल अनाज मंडी में धान लेकर आए। यहां तीन दिन से धान लेकर बैठे हैं, धान बिक नहीं रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने दस एकड़ में 1509 प्रजाति का धान लगाया। पिछले साल यह धान 2700 रुपये प्रति क्विंटल बिका था लेकिन आज धान को 1700 रुपये में बड़ी मुश्किल से राइस मिलर्स ने खरीदा है। 180 क्विंटल धान निकला, जो तीन लाख रुपये में बिका। इसे उत्पादित करने में दो लाख रुपये की लागत आई, यदि परिजनों की मजदूरी जोड़े तो ढ़ाई लाख रुपये तक पहुंच जाएगी। बचत के नाम पर भी 40-50 हजार रुपये मान सकते हैं। इतनी कम धनराशि में परिवार का खर्च चलाना काफी मुश्किल हो जाएगा।
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डाक वाला रुड़ान गांव के युवा किसान रोहित चौधरी बताते हैं कि उन्होंने जमीन को 50 हजार रुपये वार्षिक किराये पर लिया है, तो छमाही में धान की 1509 प्रजाति लगाई। इसमें 2.50 लाख रुपये तो जमीन का किराया ही चला गया। 160 क्विंटल धान निकला, जो आज 1700 प्रति क्विंटल के भाव में 2.80 लाख रुपये का ही बिका। जबकि दो लाख रुपये तो लागत ही आ गई, ऐसे में तो इस बार धान की फसल में बड़ा घाटा हो गया है। जमीन का किराया बेहद महंगा हो गया, लागत मूल्य काफी बढ़ गया है। कोरोना काल में मजदूरी, कटाई, रोपाई सभी कुछ महंगा था। ऐसी खेती किसानी का क्या फायदा है।
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बजीरपुर गांव के किसान चरण जीत सिंह लंबे समय से खेती किसानी करते हैं, उन्होंने बताया कि परिवार में दर्जनभर लोग हैं, 36 एकड़ जमीन पर धान लगाया, जिसमें 10 एकड़ में ऊषा-44 प्रजाति का धान लगाया, जिसका उत्पादन 250 क्विंटल रहा और 26 एकड़ में पीआर 121 लगाया, जिसकी पैदावार 520 क्विंटल रही। पीआर धान को राइस मिलर्स ने मुट्ठी से नाप कर नमी को अधिक बताकर 1888 की बजाय 1850 रुपये में तो ऊषा 44 को 1800 रुपये के भाव में खरीदा। जो कुल 14.62 लाख रुपये का हुआ। अपनी जमीन, अपने संसाधन, उनकी टूट फूट, मरम्मत, अपनी व परिजनों की मेहनत मजदूरी को छोड़ दिया जाए तो नौ लाख रुपये लागत आई है। इसमें करीब 5.62 लाख रुपये की बचत हुई है। इसमें आढ़तियों की देनदारी का ब्याज भी देना है, ट्रैक्टर ट्रालियों की मरम्मत भी करानी है। कुल मिलाकर परिवार का खर्च बुश्किल से ही चलता है।
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-उत्तर प्रदेश के बिड़ौली (शामली) निवासी मीर हसन भी करनाल अनाज मंडी में धान लेकर आए। यहां तीन दिन से धान लेकर बैठे हैं, धान बिक नहीं रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने दस एकड़ में 1509 प्रजाति का धान लगाया। पिछले साल यह धान 2700 रुपये प्रति क्विंटल बिका था लेकिन आज धान को 1700 रुपये में बड़ी मुश्किल से राइस मिलर्स ने खरीदा है। 180 क्विंटल धान निकला, जो तीन लाख रुपये में बिका। इसे उत्पादित करने में दो लाख रुपये की लागत आई, यदि परिजनों की मजदूरी जोड़े तो ढ़ाई लाख रुपये तक पहुंच जाएगी। बचत के नाम पर भी 40-50 हजार रुपये मान सकते हैं। इतनी कम धनराशि में परिवार का खर्च चलाना काफी मुश्किल हो जाएगा।
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डाक वाला रुड़ान गांव के युवा किसान रोहित चौधरी बताते हैं कि उन्होंने जमीन को 50 हजार रुपये वार्षिक किराये पर लिया है, तो छमाही में धान की 1509 प्रजाति लगाई। इसमें 2.50 लाख रुपये तो जमीन का किराया ही चला गया। 160 क्विंटल धान निकला, जो आज 1700 प्रति क्विंटल के भाव में 2.80 लाख रुपये का ही बिका। जबकि दो लाख रुपये तो लागत ही आ गई, ऐसे में तो इस बार धान की फसल में बड़ा घाटा हो गया है। जमीन का किराया बेहद महंगा हो गया, लागत मूल्य काफी बढ़ गया है। कोरोना काल में मजदूरी, कटाई, रोपाई सभी कुछ महंगा था। ऐसी खेती किसानी का क्या फायदा है।