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किसानों को नहीं भा रहा निर्मला का बजट
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भले ही केंद्र सरकार आम बजट में किसानों के लिए बहुत कुछ करने का दम भरती हो लेकिन तीन कृषि कानूनों की वापसी को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का बजट नहीं भा रहा है। किसानों का कहना है कि एमएसपी जारी रखने की बात तो पहले से ही सरकार कर रही है, लेकिन इसे कानूनी जामा तो अब तक नहीं पहनाया गया। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को भी लागू नहीं किया गया तो बजट की घोषणाओं पर आखिर कैसे विश्वास करें।
बसताड़ा टोल प्लाजा पर आंदोलन की कमान संभाल रहे भाकियू के जिला प्रधान अजय राणा ने कहा कि बजट में भले ही लंबी चौड़ी घोषणाएं की हों, लेकिन इनसे वास्तविक किसानों को कोई भला होने वाला नहीं है। इसमें नया कुछ भी नहीं है, एमएसपी जारी रखने की बात सरकार पहले से ही करती आ रही है, लेकिन सभी जानते हैं कि किसानों को अपनी फसलों को बेचने के लिए कितना परेशान होना पड़ रहा है। इसे कानून में लाकर अनिवार्यता क्यों नहीं दी जा रही है। किसान आशीष मलिक ने बताया कि इसमें आम आदमी को भी किसी तरह की कोई राहत नहीं दी गई है। एक तरफ सरकार नए कृषि कानून लाकर खेती किसानी को छीनने का प्रयास कर रही है, दूसरी ओर किसानों का बजटकर बताकर जख्मों पर नमक छिड़क रही है। भारतीय किसान मजदूर नौजवान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र आर्य दादूपुर ने बजट को नई पैकिंग में पुराना सामान करार देते हुए कहा कि वित्तीय घाटे को केवल कृषि में निवेश बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। हमारे पूर्व के बजटों में भी भारी खामियां रही हैं, जिसका नतीजा रहा है कि हम हमारे देश से बाद में आजाद होने वाले चीन और जापान से काफी पीछे हैं। पहले जीडीपी में कृषि का योगदान 74 प्रतिशत था जबकि आज मात्र 14 प्रतिशत है। सरकारें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा नहीं दे पाई। कृषि को उद्योग का दर्जा देकर ही देश की वित्तीय स्थिति में सुधार संभव है। बजट के मौजूदा प्रावधान नाकाफी प्रतीत हो रहे हैं।
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बसताड़ा टोल प्लाजा पर आंदोलन की कमान संभाल रहे भाकियू के जिला प्रधान अजय राणा ने कहा कि बजट में भले ही लंबी चौड़ी घोषणाएं की हों, लेकिन इनसे वास्तविक किसानों को कोई भला होने वाला नहीं है। इसमें नया कुछ भी नहीं है, एमएसपी जारी रखने की बात सरकार पहले से ही करती आ रही है, लेकिन सभी जानते हैं कि किसानों को अपनी फसलों को बेचने के लिए कितना परेशान होना पड़ रहा है। इसे कानून में लाकर अनिवार्यता क्यों नहीं दी जा रही है। किसान आशीष मलिक ने बताया कि इसमें आम आदमी को भी किसी तरह की कोई राहत नहीं दी गई है। एक तरफ सरकार नए कृषि कानून लाकर खेती किसानी को छीनने का प्रयास कर रही है, दूसरी ओर किसानों का बजटकर बताकर जख्मों पर नमक छिड़क रही है। भारतीय किसान मजदूर नौजवान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र आर्य दादूपुर ने बजट को नई पैकिंग में पुराना सामान करार देते हुए कहा कि वित्तीय घाटे को केवल कृषि में निवेश बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। हमारे पूर्व के बजटों में भी भारी खामियां रही हैं, जिसका नतीजा रहा है कि हम हमारे देश से बाद में आजाद होने वाले चीन और जापान से काफी पीछे हैं। पहले जीडीपी में कृषि का योगदान 74 प्रतिशत था जबकि आज मात्र 14 प्रतिशत है। सरकारें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा नहीं दे पाई। कृषि को उद्योग का दर्जा देकर ही देश की वित्तीय स्थिति में सुधार संभव है। बजट के मौजूदा प्रावधान नाकाफी प्रतीत हो रहे हैं।
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