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Karnal News: मनरेगा को कृषि कार्याें से जोड़ने और गांवों में विकास की गति बढ़ाने पर जोर
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। किसानों को डीएपी सहकारी समितियों के माध्यम से 75 प्रतिशत तक उपलब्ध कराई जाए। डीएपी के साथ खेतों के लिए अतिरिक्त दवाई देने पर पूर्णत: पाबंदी लगे। किसानों को मिलने वाले बीज की जांच भी कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से होनी चाहिए। किसानों को खेतों में बिजली रात के समय केवल आठ घंटे ही उपलब्ध करवाई जा रही है। किसानों को खेती के लिए 12 घंटे बिजली की आपूर्ति की जाए। यदि मनरेगा को कृषि कार्यों से जोड़ दिया जाए तो इससे कृषि पैदावार में बढ़ोत्तरी होगी और किसानों को कम मजदूरी पर कृषि कार्यों के लिए गांव में ही मजदूर मिल सकेंगे। अमर उजाला के जनसंवाद में सरपंचों और उनके प्रतिनिधियों ने उक्त मुद्दे जोरशोर से उठाए। कार्यक्रम में सरपंच प्रतिनिधियों ने ग्राम पंचायतों में किए जा रहे विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाने पर भी जोर दिया।
बीजों की प्रमाणिकता, डीएपी की उपलब्धता व बेहतर बिजली अपूर्ति हो मुहैया
किसानों को प्रमाणिक बीज की उपलब्धता करवाई जाए तो इससे कृषि की पैदावार के साथ-साथ गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। बशर्ते बीज की प्रमाणिकता की जांच समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों द्वारा की जाए। यदि किसानों को डीएपी सहकारी समिति के माध्यम से 75 प्रतिशत तक मुहैया करवाया जाए तो भी देश का किसान खुशहाल होगा। डीएपी के साथ अतिरिक्त दवाई न दी जाए, किसानों को बिजली की आपूर्ति दिन के समय ही 12 घंटे की जाए। - बहादुर सिंह मेहला, प्रदेश प्रवक्ता, सरछोटू राम भारतीय किसान यूनियन।
ग्रामीण विकास पर ध्यान दें सरकार
भाजपा सरकार में ग्रामीण विकास की रफ्तार में कमी आई है। एक कार्य के शुरू होने में करीब नौ माह का समय लग जाता है। ऐसे में ग्रामीण विकास कछुआ चाल पर ही होंगे। विकास कार्यों की प्रक्रिया आज भी वही है लेकिन समय अंतराल इतना ज्यादा हो गया है कि गांव का विकास सरपंचों के लिए चुनौती बन गया है। उनके गांव सौंकड़ा में जनस्वास्थ्य विभाग का समर्सिबल पंप खराब पड़ा है, जिसके नए बोर करवाने के लिए वह तीन माह से चक्कर काट रहे हैं लेकिन फंड की अनुपलब्धता के कारण समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। - सरदार भूपिंद्र सिंह विर्क, सरपंच प्रतिनिधि सौंकडा एवं भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश महासचिव।
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कृषि कार्यों को मनरेगा के साथ जोड़ जाए
यदि सरकार की मनरेगा योजना को कृषि कार्यों के साथ जोड़ा जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। किसान कार्यों के बदले मनरेगा मजदूरों की कुल दिहाड़ी सरकार के खाते में जमा करवाएगी। मजदूरों को मनरेगा दिहाड़ी के हिसाब से त्वरित भुगतान होगा। इससे किसानों को गांव में ही कम मजदूरी पर मनरेगा मजदूर मिल सकेंगे, वहीं मजदूरों को भी उनकी दिहाड़ी मेहनत के हिसाब से समय पर मिलेगी। वर्तमान समय में मनरेगा योजना में काफी खामियां हैं, फर्जी दिहाड़ी भरकर मेट व एबीपीओ सरकार को लूटने में लगे हैं। - पूर्व सरपंच लखविंद्र सिंह रमाणा।
फसल अवशेष प्रबंधन में खामियां
सरकार फसल अवशेष जलाने पर लगातार किसानों को प्रताड़ित कर रही है। फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। धरातल में किसी भी किसान को इसके लिए प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। फसल अवशेष जलाने पर किसानों से भारी भरकम जुर्माना वसूला जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर किसान के खेतों में पराली के गड्ढे बनाकर रख दिए जाते हैं जिनका एक माह तक भी उठान नहीं हो पाता। इस कारण से गेहूं की फसल की समय बर्बाद हो रहा है। - शेर सिंह मल्ली, पखाना।
गन्ने के टोकन अब खुद लगा रहा किसान
पहले गन्ने के टोकन लगवाने के लिए किसानों को लंबी-लंबी कतारों में लगना पड़ता था। इसके बाद गन्ने की तुलाई में भी काफी समय लगता था, लेकिन अब ऑनलाइन प्रक्रिया से किसान अपने घर बैठकर खुद ही टोकन लगा सकता है तथा अपनी गन्ने की तुलाई तक की प्रक्रिया को मोबाइल के माध्यम से देख सकता है। - सुखा सिंह, गंजोगढी पूर्व सह निदेशक, शुगर मिल
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करनाल। किसानों को डीएपी सहकारी समितियों के माध्यम से 75 प्रतिशत तक उपलब्ध कराई जाए। डीएपी के साथ खेतों के लिए अतिरिक्त दवाई देने पर पूर्णत: पाबंदी लगे। किसानों को मिलने वाले बीज की जांच भी कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से होनी चाहिए। किसानों को खेतों में बिजली रात के समय केवल आठ घंटे ही उपलब्ध करवाई जा रही है। किसानों को खेती के लिए 12 घंटे बिजली की आपूर्ति की जाए। यदि मनरेगा को कृषि कार्यों से जोड़ दिया जाए तो इससे कृषि पैदावार में बढ़ोत्तरी होगी और किसानों को कम मजदूरी पर कृषि कार्यों के लिए गांव में ही मजदूर मिल सकेंगे। अमर उजाला के जनसंवाद में सरपंचों और उनके प्रतिनिधियों ने उक्त मुद्दे जोरशोर से उठाए। कार्यक्रम में सरपंच प्रतिनिधियों ने ग्राम पंचायतों में किए जा रहे विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाने पर भी जोर दिया।
बीजों की प्रमाणिकता, डीएपी की उपलब्धता व बेहतर बिजली अपूर्ति हो मुहैया
किसानों को प्रमाणिक बीज की उपलब्धता करवाई जाए तो इससे कृषि की पैदावार के साथ-साथ गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। बशर्ते बीज की प्रमाणिकता की जांच समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों द्वारा की जाए। यदि किसानों को डीएपी सहकारी समिति के माध्यम से 75 प्रतिशत तक मुहैया करवाया जाए तो भी देश का किसान खुशहाल होगा। डीएपी के साथ अतिरिक्त दवाई न दी जाए, किसानों को बिजली की आपूर्ति दिन के समय ही 12 घंटे की जाए। - बहादुर सिंह मेहला, प्रदेश प्रवक्ता, सरछोटू राम भारतीय किसान यूनियन।
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ग्रामीण विकास पर ध्यान दें सरकार
भाजपा सरकार में ग्रामीण विकास की रफ्तार में कमी आई है। एक कार्य के शुरू होने में करीब नौ माह का समय लग जाता है। ऐसे में ग्रामीण विकास कछुआ चाल पर ही होंगे। विकास कार्यों की प्रक्रिया आज भी वही है लेकिन समय अंतराल इतना ज्यादा हो गया है कि गांव का विकास सरपंचों के लिए चुनौती बन गया है। उनके गांव सौंकड़ा में जनस्वास्थ्य विभाग का समर्सिबल पंप खराब पड़ा है, जिसके नए बोर करवाने के लिए वह तीन माह से चक्कर काट रहे हैं लेकिन फंड की अनुपलब्धता के कारण समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। - सरदार भूपिंद्र सिंह विर्क, सरपंच प्रतिनिधि सौंकडा एवं भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश महासचिव।
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कृषि कार्यों को मनरेगा के साथ जोड़ जाए
यदि सरकार की मनरेगा योजना को कृषि कार्यों के साथ जोड़ा जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। किसान कार्यों के बदले मनरेगा मजदूरों की कुल दिहाड़ी सरकार के खाते में जमा करवाएगी। मजदूरों को मनरेगा दिहाड़ी के हिसाब से त्वरित भुगतान होगा। इससे किसानों को गांव में ही कम मजदूरी पर मनरेगा मजदूर मिल सकेंगे, वहीं मजदूरों को भी उनकी दिहाड़ी मेहनत के हिसाब से समय पर मिलेगी। वर्तमान समय में मनरेगा योजना में काफी खामियां हैं, फर्जी दिहाड़ी भरकर मेट व एबीपीओ सरकार को लूटने में लगे हैं। - पूर्व सरपंच लखविंद्र सिंह रमाणा।
फसल अवशेष प्रबंधन में खामियां
सरकार फसल अवशेष जलाने पर लगातार किसानों को प्रताड़ित कर रही है। फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। धरातल में किसी भी किसान को इसके लिए प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। फसल अवशेष जलाने पर किसानों से भारी भरकम जुर्माना वसूला जा रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर किसान के खेतों में पराली के गड्ढे बनाकर रख दिए जाते हैं जिनका एक माह तक भी उठान नहीं हो पाता। इस कारण से गेहूं की फसल की समय बर्बाद हो रहा है। - शेर सिंह मल्ली, पखाना।
गन्ने के टोकन अब खुद लगा रहा किसान
पहले गन्ने के टोकन लगवाने के लिए किसानों को लंबी-लंबी कतारों में लगना पड़ता था। इसके बाद गन्ने की तुलाई में भी काफी समय लगता था, लेकिन अब ऑनलाइन प्रक्रिया से किसान अपने घर बैठकर खुद ही टोकन लगा सकता है तथा अपनी गन्ने की तुलाई तक की प्रक्रिया को मोबाइल के माध्यम से देख सकता है। - सुखा सिंह, गंजोगढी पूर्व सह निदेशक, शुगर मिल