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27 करोड़ में सफाई का ठेका, न कर्मचारी तय न ही संशाधन
Updated Fri, 05 Oct 2018 01:00 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। नगर निगम के 20 वार्डों की सफाई 27 करोड़ रुपये सालाना में होगी। बीते साल यह ठेका साढ़े 22 करोड़ रुपये में दिया गया था। यही नहीं आवासीय के साथ ही कामर्शियल यूनिट से कचरा उठाने के नाम पर भी ठेकेदार हर महीने पैसे वसूलेंगे। ऐसा पहली बार होगा। फीस रहेगी 50 रुपये से लेकर पांच हजार तक। यानि 27 करोड़ के अलावा इससे भी मोटी आमदनी होना तय है। सफाई ठेकेदारों पर मेहरबानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कर्मचारियों की संख्या तक तय नहीं की गई। वर्क आर्डर में तो संसाधन तक का जिक्र नहीं है। ऐसे में इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ठेकेदार कम कर्मचारी लगाएंगे। ताकि अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें। निगम सफाई ठेकेदारों की पेमेंट से कटौती भी नहीं कर सकेगा। हालांकि सफाई नहीं मिलने पर जुर्माना लगाने का प्रावधान जरूर रखा गया है, लेकिन यह पूरी तरह से निगम की टीम पर निर्भर करेगा। यह मेहरबानी स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 में बाधा बन सकती है।
महंगा टेंडर, हाल वही
पांच करोड़ अधिक चुकाने पर भी सफाई व्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। वीरवार को मछली मार्केट, बांसो गेट और जुंडला गेट के समीप गंदगी के ढेर लगे थे। ऐेसे में नए टेंडर पर सवाल उठना लाजिमी है। वहीं, दूसरी ओर नगर निगम सफाई कर्मचारी तीन दिन की हड़ताल पर हैं, जिसका खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है।
नियम तो यह : कचरा अलग होना चाहिए
नए टेंडर के अनुसार हर घर से कचरा उठाना होगा। वह भी गलनशीन और अगलनशील अलग-अलग रूप में। इसे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट तक भी अलग पहुंचाना होगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं किया जा रहा है। कुछ ऐसी ही शर्त बीते साल के टेंडर में भी थी। बावजूद इसके पूरा साल कचरा अलग नहीं किया गया। कुछ ऐसी ही खानापूर्ति इस बार भी हो रही है।
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सफाई में बड़ा खेल
शहर निवासी सतीश, देवेंद्र, राहुल व प्रीतम का कहना है कि सफाई के ठेके में बड़ा खेल होता है। कर्मचारी और संसाधन कम लगाकर ठेकेदार अधिक पैसे कमाते हैं। इससे सफाई प्रभावित होती है। बीते साल निगम ने लगातार जांच की। हर बार खामियां मिली। ठेकेदारों की 30 लाख तक पेमेंट भी काटी गई। जो नियम इस बार बनाए गए हैं उनसे तो साफ है कि ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है।
स्वच्छता अभियान इसलिए हो सकता है फ्लॉप
1. 160 टन कचरे का निस्तारण आसान नहीं
क्या होना चाहिए : प्लांट की क्षमता 10 टन प्रति घंटा है। कंपनी को रोजाना 16 घंटे इसे चलाना होगा।
हकीकत : करार के अनुसार ऐसा संभव नहीं है। कंपनी को रोजाना 120 टन कचरे को खाद में बदलना है। प्लांट के प्रोजेक्ट मैनेजर राजीव गिरधर की मानें तो चार घंटे ओवरटाइम लगाकर 120 टन से जैविक खाद बनाते हैं। इस हिसाब से 40 टन रोजाना बच जाता है। इसके अलावा टूट-फूट होने पर भी प्लांट बंद भी रहता है।
2. कचरा अलग-अलग नहीं जाता
होना यह चाहिए : 160 टन कचरे में से करीब 130 टन से अधिक गलनशील कचरा है। यह प्लांट में अलग जाए तो बात बन सकती है।
हकीकत : 27 करोड़ सालाना में सफाई का ठेका देने के बावजूद प्लांट में अलग-अलग कचरा नहीं पहुंच रहा है। इसलिए प्लांट कचरे का ढेर बनता जा रहा है।
3. 120 टन का करार बाधा
समाधान : सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट चला रही कंपनी के साथ 120 टन का करार है। अधिक कचरे को खाद में बदलने के लिए कंपनी को अलग से राशि मिलनी चाहिए।
हकीकत : रोजाना चार घंटे अधिक प्लांट चलाने पर करीब दो लाख रुपये महीना अधिक खर्च आता है। ओवरटाइम लगाकर कंपनी घाटा क्यों उठाएगी। 120 टन का टेंडर है। इसलिए निगम भी उसे बाध्य नहीं कर सकता।
सफाई के लिए इस बार 20 वार्डों को चार जोन में बांटा गया है। एक अक्तूबर से ठेकेदारों ने काम शुरू कर दिया है। कॉमर्शियल एरिया में नाइट स्वीपिंग और टॉयलेट की सफाई भी इन्हें ही करनी होगी। निगम इन पर पूरी निगरानी रखेगा। सफाई से समझौता नहीं होगा।
-धीरज कुमार, ईओ, नगर निगम, करनाल।
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करनाल। नगर निगम के 20 वार्डों की सफाई 27 करोड़ रुपये सालाना में होगी। बीते साल यह ठेका साढ़े 22 करोड़ रुपये में दिया गया था। यही नहीं आवासीय के साथ ही कामर्शियल यूनिट से कचरा उठाने के नाम पर भी ठेकेदार हर महीने पैसे वसूलेंगे। ऐसा पहली बार होगा। फीस रहेगी 50 रुपये से लेकर पांच हजार तक। यानि 27 करोड़ के अलावा इससे भी मोटी आमदनी होना तय है। सफाई ठेकेदारों पर मेहरबानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कर्मचारियों की संख्या तक तय नहीं की गई। वर्क आर्डर में तो संसाधन तक का जिक्र नहीं है। ऐसे में इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ठेकेदार कम कर्मचारी लगाएंगे। ताकि अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें। निगम सफाई ठेकेदारों की पेमेंट से कटौती भी नहीं कर सकेगा। हालांकि सफाई नहीं मिलने पर जुर्माना लगाने का प्रावधान जरूर रखा गया है, लेकिन यह पूरी तरह से निगम की टीम पर निर्भर करेगा। यह मेहरबानी स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 में बाधा बन सकती है।
महंगा टेंडर, हाल वही
पांच करोड़ अधिक चुकाने पर भी सफाई व्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। वीरवार को मछली मार्केट, बांसो गेट और जुंडला गेट के समीप गंदगी के ढेर लगे थे। ऐेसे में नए टेंडर पर सवाल उठना लाजिमी है। वहीं, दूसरी ओर नगर निगम सफाई कर्मचारी तीन दिन की हड़ताल पर हैं, जिसका खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है।
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नियम तो यह : कचरा अलग होना चाहिए
नए टेंडर के अनुसार हर घर से कचरा उठाना होगा। वह भी गलनशीन और अगलनशील अलग-अलग रूप में। इसे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट तक भी अलग पहुंचाना होगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं किया जा रहा है। कुछ ऐसी ही शर्त बीते साल के टेंडर में भी थी। बावजूद इसके पूरा साल कचरा अलग नहीं किया गया। कुछ ऐसी ही खानापूर्ति इस बार भी हो रही है।
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सफाई में बड़ा खेल
शहर निवासी सतीश, देवेंद्र, राहुल व प्रीतम का कहना है कि सफाई के ठेके में बड़ा खेल होता है। कर्मचारी और संसाधन कम लगाकर ठेकेदार अधिक पैसे कमाते हैं। इससे सफाई प्रभावित होती है। बीते साल निगम ने लगातार जांच की। हर बार खामियां मिली। ठेकेदारों की 30 लाख तक पेमेंट भी काटी गई। जो नियम इस बार बनाए गए हैं उनसे तो साफ है कि ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है।
स्वच्छता अभियान इसलिए हो सकता है फ्लॉप
1. 160 टन कचरे का निस्तारण आसान नहीं
क्या होना चाहिए : प्लांट की क्षमता 10 टन प्रति घंटा है। कंपनी को रोजाना 16 घंटे इसे चलाना होगा।
हकीकत : करार के अनुसार ऐसा संभव नहीं है। कंपनी को रोजाना 120 टन कचरे को खाद में बदलना है। प्लांट के प्रोजेक्ट मैनेजर राजीव गिरधर की मानें तो चार घंटे ओवरटाइम लगाकर 120 टन से जैविक खाद बनाते हैं। इस हिसाब से 40 टन रोजाना बच जाता है। इसके अलावा टूट-फूट होने पर भी प्लांट बंद भी रहता है।
2. कचरा अलग-अलग नहीं जाता
होना यह चाहिए : 160 टन कचरे में से करीब 130 टन से अधिक गलनशील कचरा है। यह प्लांट में अलग जाए तो बात बन सकती है।
हकीकत : 27 करोड़ सालाना में सफाई का ठेका देने के बावजूद प्लांट में अलग-अलग कचरा नहीं पहुंच रहा है। इसलिए प्लांट कचरे का ढेर बनता जा रहा है।
3. 120 टन का करार बाधा
समाधान : सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट चला रही कंपनी के साथ 120 टन का करार है। अधिक कचरे को खाद में बदलने के लिए कंपनी को अलग से राशि मिलनी चाहिए।
हकीकत : रोजाना चार घंटे अधिक प्लांट चलाने पर करीब दो लाख रुपये महीना अधिक खर्च आता है। ओवरटाइम लगाकर कंपनी घाटा क्यों उठाएगी। 120 टन का टेंडर है। इसलिए निगम भी उसे बाध्य नहीं कर सकता।
सफाई के लिए इस बार 20 वार्डों को चार जोन में बांटा गया है। एक अक्तूबर से ठेकेदारों ने काम शुरू कर दिया है। कॉमर्शियल एरिया में नाइट स्वीपिंग और टॉयलेट की सफाई भी इन्हें ही करनी होगी। निगम इन पर पूरी निगरानी रखेगा। सफाई से समझौता नहीं होगा।
-धीरज कुमार, ईओ, नगर निगम, करनाल।