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निजी ब्लड बैंकों से 14 हजार रुपये में प्लेटलेट्स की यूनिट ले रहे हैं लोग
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People are taking units of platelets from private blood banks for 14 thousand rupees
- फोटो : Kaithal
इसे लापरवाही नहीं कहा जाएगा। बल्कि लापरवाही की पराकाष्ठा है। जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए। इस समय डेंगू व वायरल बुखार में प्लेटलेट्स के लिए जहां लोग अस्पतालों के चक्कर काटने पर मजबूर हैं और निजी ब्लड बैंकों में प्रति यूनिट कम से कम 11 हजार व अधिकतम तो आपात स्थिति में 15 हजार रुपये तक प्रति यूनिट प्लेटलेटस के लिए भुगतान करने को मजबूर हैं। वहीं जिला अस्पताल में जहां यह सुविधा निशुल्क मिल सकती है, वहां रक्त में से प्लेटलेट्स अलग करने वाली करीब 14 लाख रुपये लागत वाली मशीन 2019 से बॉक्स में बंद पड़ी है। कोई अधिकारी इस मशीन को चालू करवाने की जहमत नहीं उठा रहा। पूछने पर एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल कर पल्ला झाड़ रहे हैं।
इस सीजन में डेंगू या वायरल बुखार के कारण लोगों में प्लेटलेट्स कम होने की समस्या सामने आई है। प्लेटलेट्स कम होने पर लोगों को निजी ब्लड बैंकों से प्लेटलेट्स की यूनिट लेनी पड़ती है। पहले इसके लिए रक्तदाता ढूंढना पड़ता है। इसके बाद प्रति यूनिट कम से कम 11 हजार रुपये तो अदा करने ही पड़ते हैं। आपात स्थिति में कुछ लोग 14000 से 15000 रुपये तक भी भुगतान करते हैं, लेकिन मजबूरीवश वे शिकायत नहीं कर पाते। तीन साल बाद जिले में डेंगू के मामले तीन गुणा से भी अधिक तो सरकारी आंकड़ों में आ चुके हैं। जिनके डेंगू के लिए सरकार द्वारा मान्यता टेस्ट नहीं होते, वह संख्या अलग है। यदि प्लेटलेट्स निकालने की सुविधा सरकारी अस्पताल में ही मिल जाए तो लोग निजी लैब में इतनी भारी भरकम राशि देने से बच सकते हैं। लेकिन शायद अधिकारियों को लोगों के स्वास्थ्य या उन्हें इस तरह की परेशानियों की परवाह ही नहीं है।
यह आम जन के प्रति अपराध है, ऐसे अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए
पूर्व मुख्य संसदीय सचिव रामपाल माजरा ने कहा कि आम लोग प्लेटलेट्स के अभाव में मर रहे हैं। किसी तरह यदि कोई व्यक्ति प्रबंध कर भी ले तो उसे भारी भरकम राशि चुकानी पड़ती है। जबकि यदि जिला अस्पताल में यही मशीन धूल फांक रही है तो यह आम आदमी के प्रति अपराध है। ऐसे लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। कोरोना के समय टीकों की ब्लैक हुई थी। मेडिकल कॉलेज तो दूर की बात है। एक नई मशीन प्रयोग नहीं की जा रही।
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इस सीजन में डेंगू या वायरल बुखार के कारण लोगों में प्लेटलेट्स कम होने की समस्या सामने आई है। प्लेटलेट्स कम होने पर लोगों को निजी ब्लड बैंकों से प्लेटलेट्स की यूनिट लेनी पड़ती है। पहले इसके लिए रक्तदाता ढूंढना पड़ता है। इसके बाद प्रति यूनिट कम से कम 11 हजार रुपये तो अदा करने ही पड़ते हैं। आपात स्थिति में कुछ लोग 14000 से 15000 रुपये तक भी भुगतान करते हैं, लेकिन मजबूरीवश वे शिकायत नहीं कर पाते। तीन साल बाद जिले में डेंगू के मामले तीन गुणा से भी अधिक तो सरकारी आंकड़ों में आ चुके हैं। जिनके डेंगू के लिए सरकार द्वारा मान्यता टेस्ट नहीं होते, वह संख्या अलग है। यदि प्लेटलेट्स निकालने की सुविधा सरकारी अस्पताल में ही मिल जाए तो लोग निजी लैब में इतनी भारी भरकम राशि देने से बच सकते हैं। लेकिन शायद अधिकारियों को लोगों के स्वास्थ्य या उन्हें इस तरह की परेशानियों की परवाह ही नहीं है।
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यह आम जन के प्रति अपराध है, ऐसे अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए
पूर्व मुख्य संसदीय सचिव रामपाल माजरा ने कहा कि आम लोग प्लेटलेट्स के अभाव में मर रहे हैं। किसी तरह यदि कोई व्यक्ति प्रबंध कर भी ले तो उसे भारी भरकम राशि चुकानी पड़ती है। जबकि यदि जिला अस्पताल में यही मशीन धूल फांक रही है तो यह आम आदमी के प्रति अपराध है। ऐसे लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज होना चाहिए। कोरोना के समय टीकों की ब्लैक हुई थी। मेडिकल कॉलेज तो दूर की बात है। एक नई मशीन प्रयोग नहीं की जा रही।
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