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Jind News: भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा पंडाल
Fri, 13 Mar 2026 11:51 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Fri, 13 Mar 2026 11:51 PM IST
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13जेएनडी16: कथा सुनती महिलाएं। संवाद।
नरवाना। गांव दबलैन स्थित डेरा बाबा फकीरां वाला में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनाया गया।
शुक्रवार को कथा के दौरान कथावाचक बाल योगी रंजना नंद दास महाराज ने भजनों की प्रस्तुतियां दीं। इस पर पर श्रद्धालु झूम उठे। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की झांकी भी प्रस्तुत की गई। भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से पंडाल गूंज उठा। कथा व्यास ने बताया कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सच्चे प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का अद्भुत उदाहरण है।
दोनों ने गुरु संदीपनि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी और उसी समय से उनकी गहरी मित्रता हो गई थी। समय के साथ श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए, जबकि सुदामा एक गरीब ब्राह्मण के रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि सुदामा की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार उनके घर में भोजन तक का अभाव हो जाता था।
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एक दिन पत्नी ने उनसे मित्र श्रीकृष्ण से मिलने और सहायता मांगने का आग्रह किया। पहले तो सुदामा ने संकोच किया लेकिन पत्नी के आग्रह पर वे द्वारका जाने के लिए तैयार हो गए। घर में देने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए पत्नी ने पड़ोस से चावल उधार लेकर एक पोटली में बांध दिए और वही श्रीकृष्ण के लिए भेंट के रूप में दे दिए।
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शुक्रवार को कथा के दौरान कथावाचक बाल योगी रंजना नंद दास महाराज ने भजनों की प्रस्तुतियां दीं। इस पर पर श्रद्धालु झूम उठे। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की झांकी भी प्रस्तुत की गई। भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से पंडाल गूंज उठा। कथा व्यास ने बताया कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सच्चे प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का अद्भुत उदाहरण है।
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दोनों ने गुरु संदीपनि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी और उसी समय से उनकी गहरी मित्रता हो गई थी। समय के साथ श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए, जबकि सुदामा एक गरीब ब्राह्मण के रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि सुदामा की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार उनके घर में भोजन तक का अभाव हो जाता था।
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एक दिन पत्नी ने उनसे मित्र श्रीकृष्ण से मिलने और सहायता मांगने का आग्रह किया। पहले तो सुदामा ने संकोच किया लेकिन पत्नी के आग्रह पर वे द्वारका जाने के लिए तैयार हो गए। घर में देने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए पत्नी ने पड़ोस से चावल उधार लेकर एक पोटली में बांध दिए और वही श्रीकृष्ण के लिए भेंट के रूप में दे दिए।