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Jind News: जुलाना में प्राचीन काल के प्रतीक कुएं हुए जर्जर, प्रशासन नहीं ले रहा सुध
Mon, 12 Jan 2026 12:41 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Mon, 12 Jan 2026 12:41 AM IST
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11जेएनडी02: जुलाना में जर्जर पड़ा कुआं। संवाद
जुलाना। क्षेत्र में प्राचीन काल के प्रतीक रहे कुएं आज बदहाली की कहानी बयां कर रहे हैं। कभी जीवनदायिनी रहे ये कुएं न केवल जलस्रोत थे बल्कि जुलाना की सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की पहचान भी हुआ करते थे। इस कुएं का पानी पुराने समय में जींद रियासत के राजा तक पहुंचाया जाता था।
अब समय के साथ इन कुओं का महत्व भले ही कम हुआ हो लेकिन इनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्यवश प्रशासन की अनदेखी और संरक्षण के अभाव में यह कुएं जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं। जुलाना क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार जुलाना क्षेत्र में बने पत्थरों वाले कुओं का पानी कभी जींद रियासत के राजा तक पहुंचाया जाता था।
उस दौर में इन कुओं के पानी को शुद्ध और पवित्र माना जाता था। खास बात यह थी कि इन कुओं का निर्माण मजबूत पत्थरों और पारंपरिक तकनीकों से किया गया था, जो आज भी उनकी मजबूती की गवाही देते हैं। इसके बावजूद रखरखाव के अभाव में अब इन कुओं की दीवारें टूटने लगी हैं। कई कुएं मलबे से भर चुके हैं और कुछ पूरी तरह से बंद होने की कगार पर हैं।
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पहले गांव और कस्बे की बड़ी आबादी इन्हीं कुओं पर निर्भर थी। शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठान और त्योहारों के अवसर पर कुओं का विशेष महत्व होता था। महिलाएं सुबह-शाम पानी भरने आती थीं, जिससे सामाजिक मेलजोल भी बढ़ता था। आज आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था के चलते कुएं उपेक्षा का शिकार हो गए हैं लेकिन यह उपेक्षा हमारी सांस्कृतिक धरोहर को मिटाने के समान है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि कई बार प्रशासन को इन कुओं की मरम्मत और संरक्षण को लेकर अवगत कराया गया लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
बाक्स
कुओं का जीर्णोंद्धार कराया जाए
जुलाना के नागरिकों का मानना है कि यदि प्रशासन और पुरातत्व विभाग मिलकर इन कुओं का जीर्णोंद्धार कराए, तो यह न केवल ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का काम होगा बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी जुलाना को नई पहचान मिल सकती है। जरूरत इस बात की है कि प्राचीन कुओं को केवल बेकार पड़े ढांचे न समझकर, उन्हें हमारी विरासत मानते हुए संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने इतिहास से जुड़ सकें।
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अब समय के साथ इन कुओं का महत्व भले ही कम हुआ हो लेकिन इनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्यवश प्रशासन की अनदेखी और संरक्षण के अभाव में यह कुएं जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं। जुलाना क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार जुलाना क्षेत्र में बने पत्थरों वाले कुओं का पानी कभी जींद रियासत के राजा तक पहुंचाया जाता था।
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उस दौर में इन कुओं के पानी को शुद्ध और पवित्र माना जाता था। खास बात यह थी कि इन कुओं का निर्माण मजबूत पत्थरों और पारंपरिक तकनीकों से किया गया था, जो आज भी उनकी मजबूती की गवाही देते हैं। इसके बावजूद रखरखाव के अभाव में अब इन कुओं की दीवारें टूटने लगी हैं। कई कुएं मलबे से भर चुके हैं और कुछ पूरी तरह से बंद होने की कगार पर हैं।
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पहले गांव और कस्बे की बड़ी आबादी इन्हीं कुओं पर निर्भर थी। शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठान और त्योहारों के अवसर पर कुओं का विशेष महत्व होता था। महिलाएं सुबह-शाम पानी भरने आती थीं, जिससे सामाजिक मेलजोल भी बढ़ता था। आज आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था के चलते कुएं उपेक्षा का शिकार हो गए हैं लेकिन यह उपेक्षा हमारी सांस्कृतिक धरोहर को मिटाने के समान है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि कई बार प्रशासन को इन कुओं की मरम्मत और संरक्षण को लेकर अवगत कराया गया लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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कुओं का जीर्णोंद्धार कराया जाए
जुलाना के नागरिकों का मानना है कि यदि प्रशासन और पुरातत्व विभाग मिलकर इन कुओं का जीर्णोंद्धार कराए, तो यह न केवल ऐतिहासिक धरोहर को बचाने का काम होगा बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी जुलाना को नई पहचान मिल सकती है। जरूरत इस बात की है कि प्राचीन कुओं को केवल बेकार पड़े ढांचे न समझकर, उन्हें हमारी विरासत मानते हुए संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने इतिहास से जुड़ सकें।