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भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने काटे नाै सिर : शर्मा
Wed, 06 Aug 2025 12:20 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Wed, 06 Aug 2025 12:20 AM IST
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05जेएनडी18-मंदिर में शिव पुराण कथा सुनते हुए श्रद्धालु। स्रोत श्रद्धालु
- फोटो : विभाग
जींद। सफीदों रोड स्थित हनुमान मंदिर में शिवपुराण कथा मंगलवार को 8वें दिन जारी रही। कथा वाचक पुजारी राजेश शर्मा ने कहा कि शिवपुराण के अनुसार रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और अपने नौ सिर काटकर शिव को अर्पित कर दिए।
जब रावण अपना 10वां सिर काटने जा रहा था, तब शिवजी प्रकट हुए और रावण को वरदान मांगने को कहा। रावण ने शिवजी से लंका में निवास करने का वरदान मांगा। शिवजी ने रावण को शिवलिंग तो दे दिया लेकिन एक शर्त रखी कि यदि वह शिवलिंग धरती पर रखा गया तो वहीं स्थापित हो जाएगा।
जब रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था उसे रास्ते में लघुशंका लगी। शिवजी की शर्त को याद रखते हुए रावण ने शिवलिंग को एक गडरिये को यह कहकर सौंपा कि जब तक वह वापस न आए उसे शिवलिंग नीचे न रखना पड़े। गडरिये से शिवलिंग का वजन असहनीय हो गया, जिससे उसे शिवलिंग वहीं जमीन पर रखना पड़ा।
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इस प्रकार शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया और शिवजी रावण के साथ लंका नहीं गए। शिव पुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद भगवान शिव ने एक विशाल ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट होकर उन्हें उसका अंत खोजने की चुनौती दी।
इस स्तंभ के जिस स्थान पर गिरने को ही ज्योतिर्लिंग कहते हैं। ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद शुरू हुआ कि कौन श्रेष्ठ है। इस विवाद के समाधान के लिए भगवान शिव एक विशाल ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को इस स्तंभ का आदि और अंत खोजने की चुनौती दी।
जिस स्थान पर यह ज्योतिर्मय स्तंभ गिरा, वह स्थल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद से शिवलिंग के रूप में शिव की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
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जब रावण अपना 10वां सिर काटने जा रहा था, तब शिवजी प्रकट हुए और रावण को वरदान मांगने को कहा। रावण ने शिवजी से लंका में निवास करने का वरदान मांगा। शिवजी ने रावण को शिवलिंग तो दे दिया लेकिन एक शर्त रखी कि यदि वह शिवलिंग धरती पर रखा गया तो वहीं स्थापित हो जाएगा।
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जब रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था उसे रास्ते में लघुशंका लगी। शिवजी की शर्त को याद रखते हुए रावण ने शिवलिंग को एक गडरिये को यह कहकर सौंपा कि जब तक वह वापस न आए उसे शिवलिंग नीचे न रखना पड़े। गडरिये से शिवलिंग का वजन असहनीय हो गया, जिससे उसे शिवलिंग वहीं जमीन पर रखना पड़ा।
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इस प्रकार शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया और शिवजी रावण के साथ लंका नहीं गए। शिव पुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद के बाद भगवान शिव ने एक विशाल ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट होकर उन्हें उसका अंत खोजने की चुनौती दी।
इस स्तंभ के जिस स्थान पर गिरने को ही ज्योतिर्लिंग कहते हैं। ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद शुरू हुआ कि कौन श्रेष्ठ है। इस विवाद के समाधान के लिए भगवान शिव एक विशाल ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को इस स्तंभ का आदि और अंत खोजने की चुनौती दी।
जिस स्थान पर यह ज्योतिर्मय स्तंभ गिरा, वह स्थल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद से शिवलिंग के रूप में शिव की पूजा की परंपरा शुरू हुई।

05जेएनडी18-मंदिर में शिव पुराण कथा सुनते हुए श्रद्धालु। स्रोत श्रद्धालु- फोटो : विभाग