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नहीं पूरी हुई शहीद के नाम स्टेडियम बनाने की मांग
jind
Updated Tue, 26 Jul 2016 12:41 AM IST
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घिमाणा गांव में शहीद आशीष की याद में बना स्मारक।
- फोटो : bureau
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साल 1999 में हुए कारगिल युद्घ में हमारे देश के जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर पाकिस्तानी सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया था। इस जंग में जिले के घिमाना गांव के बेटे आशीष ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए देश के लिए शहादत की। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद आशीष के परिवार को आज तक वो सम्मान नहीं मिल पाया, जिसका वो हकदार है। शहीद आशीष राजपुताना रायफल में तैनात थे। कारगिल युद्घ शुरू होते ही वे मोर्चे पर उतर गए। कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मन को छकाते हुए राजपुताना रायफल का बहादुर सिपाही आगे बढ़ता रहा, लेकिन 15 जून 1999 को दुश्मन की गोली लगने से आशीष वीरगति को प्राप्त हो गए। इसके बाद आशीष के गांव घिमाना में उनके नाम से स्वागत द्वार बनाया गया। स्कूल के एक गेट का नाम भी शहीद आशीष के नाम रखा गया है। प्रदेश सरकार द्वारा शहीद आशीष के परिवार को पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद तो दी गई, लेकिन इसके अलावा कोई सुध नहीं ली गई। शहीद के पिता राममेहर ने बताया कि शहीद आशीष के नाम से गांव में सरकार से स्टेडियम बनाने की मांग की गई। ग्रामीण इस स्टेडियम के लिए जमीन तक देने को तैयार हैं, लेकिन सरकार इसमें कोई रुचि नहीं ले रही है। शहीद की प्रतिमा पर अनावरण के लिए आज तक कोई नेता या मंत्री गांव में नहीं आया। वहीं जिला प्रशासन द्वारा भी कोई सुध नहीं ली गई।
खाली घोषणाएं ही हुई
छोटूराम किसान क्लब के सलाहकार सुनील आर्य ने बताया कि हर जंग में, चाहे वह आजादी की लड़ाई हो या फिर आजादी के बाद भारत-चीन व भारत-पाक युद्ध हो, उसमें घिमाना गांव के वीरों ने अपनी शहादत दी है। इसके बावजूद गांव की अनदेखी हो रही है। उस समय गांव में शहीद आशीष के नाम से लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की गई थी। इसका बोर्ड भी लग गया, लेकिन आज तक लाइब्रेरी में किताबें नहीं आई। फिलहाल लाइब्रेरी की जगह पीएचसी चल रही है। वहीं पाठशाला का नाम भी शहीद आशीष के नाम पर रखने की घोषणा की गई, लेकिन आज तक इस पर कोई अमल नहीं हुआ।
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खाली घोषणाएं ही हुई
छोटूराम किसान क्लब के सलाहकार सुनील आर्य ने बताया कि हर जंग में, चाहे वह आजादी की लड़ाई हो या फिर आजादी के बाद भारत-चीन व भारत-पाक युद्ध हो, उसमें घिमाना गांव के वीरों ने अपनी शहादत दी है। इसके बावजूद गांव की अनदेखी हो रही है। उस समय गांव में शहीद आशीष के नाम से लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की गई थी। इसका बोर्ड भी लग गया, लेकिन आज तक लाइब्रेरी में किताबें नहीं आई। फिलहाल लाइब्रेरी की जगह पीएचसी चल रही है। वहीं पाठशाला का नाम भी शहीद आशीष के नाम पर रखने की घोषणा की गई, लेकिन आज तक इस पर कोई अमल नहीं हुआ।
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