जींद। कृषि विज्ञान केंद्र पांडु पिंडारा ने फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर खंड स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। केंद्र प्रभारी डॉ. ब्रह्म प्रकाश राणा ने कहा कि खाद्यान्न उत्पादन में धान व गेहूं का करीब 75 फीसदी योगदान है। आंकड़ों के अनुसार भूमिगत जल, जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की कमी हो रही है और उपजाऊ भूमि बंजर में तबदील हो रही है।
उन्होंने कहा कि फसल अवशेष जलाने से हानिकारक गैसें निकली हैं, जो मनुष्य और पशुओं के लिए गंभीर खतरा हैं। फसल धुएं से पैदा कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड व मीथेन गैस वातावरण में कई तरह के बदलाव करती हैं। गेहूं की पकाई के समय यह गैस तापमान बढ़ाती हैं, जिससे पैदावार में कमी आती है। फानों में आग लगाने से भूमि की ऊपरी परत करीब दो इंच तक कठोर हो जाती है। इससे वायु व जल का संचार नहीं हो पाता और मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं। इस तरह से पशु चारे की भी समस्या होती है और धुएं से कई बार दुर्घटनाएं भी होती हैं। फानों अर्थात फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से कार्बनिक पदार्थ व अन्य पोषक तत्वों के कारण सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है। वहीं मिट्टी के भौतिक गुण जैसे संरचना, जल व पोषक तत्वों को धारण करने की क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा भूमि व वायु प्रदूषण नहीं होता और तापमान भी नहीं बढ़ता। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रामदयाल पंवार ने कहा कि गेहूं व धान के अवशेषों का प्रबंधन आसानी से किया जा सकता है। कंबाइन से कटाई करने और स्ट्रा रीपर से भूसा बनाने के बाद खेत में हैरो से बचे हुए अवशेषों को आसानी से मिलाया जा सकता है। फसल अवशेषों से कंपोस्ट तैयार कर खुंब का उत्पादन भी किया जा सकता है। फसल अवशेषों से विशेष रूप से गत्ता भी तैयार किया जा सकता है। मौसम वैज्ञानिक डॉ. राजेश ने कहा कि मौसम की जानकारी प्राप्त कर ही फसलों की सिंचाई का शेड्यूल तैयार करें, ताकि पानी की अनावश्यक बर्बादी को रोका जा सके। उन्होंने कहा कि हम जिस वातावरण में रहते हैं, उसे साफ व सही रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है। थोड़े लालच के चक्कर में बहुमूल्य धरोहर को नष्ट नहीं करना चाहिए।