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..मम्मी मैं थोड़े ही दिन में बड़ा हो जाऊंगा और पैसे कमाऊंगा
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नागरिक अस्पताल में अपने मासूम बेटों के साथ वीना। संवाद
- फोटो : Bahadurgarh
बहादुरगढ़। रोजाना 12 घंटे से अधिक समय तक कड़ा परिश्रम करने वाला मेहनतकश श्रमिक गणेश शनिवार रात को लगी एमआइई बहादुरगढ़ में एक फैक्टरी में लगी आग में इस दुनिया से चला गया। अब उसके दो मासूम बेटों और पत्नी का जीवन अंधकारमय हो गया है। अपनी मां को रोते हुए चुप करवाते हुए गणेश का बड़ा लड़का निक्कू कहता है कि मम्मी मैं थोड़े ही दिन में बड़ा हो जाऊंगा और काम करके पैसे कमाऊंगा।
मशीन पर मेहनत करते अपने पति की आग में झुलसने और जहरीले धुएं में दम घुटने से मौत होने के बाद वीना देवी की हालत खराब है। वह रह-रहकर रो रही है। दूसरे श्रमिकों के लगातार समझाने पर चुप होती है तो पत्थर बनी सोचती रहती है कि अब उसका और उसके मासूम बेटों का क्या होगा। वीना का भतीजा अमर भी अपने बहनोई के साथ मशीन पर काम करते हुए ही काल का ग्रास बन गया। गणेश अपने इसी साले अमर को बचाने के लिए जल रही फैक्टरी के अंदर घुस गया था। दोनों अंदर फंस गए। बाहर खड़ी वीना अपने पति व भतीजे को बचाने के लिए गुहार लगाती रही। अंदर से गणेश और अमर भी जान बचाने के लिए पुकारे, लेकिन घंटाभर बाद उनकी आवाज आनी बंद हो गई। अगले दिन शनिवार की सुबह जले हुए मलबे में दबी दोनों की लाश मिली। अमर तीन बहनों का इकलौता भाई था।
दिनभर काम करने के बाद थका-हारा पिता गणेश अपने बच्चों के लिए खाने की चीज लाता था। उन पलों को याद कर वीना कहती है अब अब हमें रोटी भी नहीं मिल पाएगी। गणेश का बड़ा लड़का निक्कू 10 साल और छोटा टिंकू 7 वर्षीय है। टिंकू में अभी समझ की कमी है। उसकी नासमझी को देख वीना फिर फफक पड़ती है। बहादुरगढ़ की एक फैक्टरी में नौकरी कर रहे अपने एक जानकार की सलाह पर गणेश अपने परिवार और साले अमर को लेकर छह महीने पहले रोजगार के लिए बहादुरगढ़ आया था। लेकिन परिवार का सुखी रहना शायद प्रकृति को मंजूर नहीं था। वीना पढ़ी लिखी तो ही नहीं, शरीर से भी इतनी मजबूत नहीं है कि अपने पति गणेश की तरह कड़ा परिश्रम करके अपने व बच्चों का पेट भर सके। बिहार के जिला अररिया स्थित पैतृक गांव पकरी में कोई पैतृक संसाधन भी नहीं।
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औद्योगिक इकाइयों में श्रमिक सुरक्षा के इंतजाम न होना मेहनतकशों के लिए जानलेवा बन जाता है। जरूरी प्रशिक्षण की कमी के कारण भी हादसे होते हैं। श्रमिक नेता जयकरण कहते हैं कि कई कारखानों में आग बुझाने के पर्याप्त उपाय रहीं रहते। एमआइई के प्लॉट नंबर 1625 में चल रही जिस फैक्टरी में इन श्रमिकों की जान गई, उसमें बचाव के लिए जरूरी प्रबंध नहीं थे। जगह संकरी होने की वजह से फैक्टरी के गेट से सटा हुआ माल पड़ा था और इसमें आग लगने के कारण गणेश और अमर बाहर नहीं निकल पाए। जयकरण ने कहते हैं सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था की कमियों वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। पीड़ित परिवारों को कम से कम 20-20 लाख रुपये मुआवजा मिलना चाहिए।
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मशीन पर मेहनत करते अपने पति की आग में झुलसने और जहरीले धुएं में दम घुटने से मौत होने के बाद वीना देवी की हालत खराब है। वह रह-रहकर रो रही है। दूसरे श्रमिकों के लगातार समझाने पर चुप होती है तो पत्थर बनी सोचती रहती है कि अब उसका और उसके मासूम बेटों का क्या होगा। वीना का भतीजा अमर भी अपने बहनोई के साथ मशीन पर काम करते हुए ही काल का ग्रास बन गया। गणेश अपने इसी साले अमर को बचाने के लिए जल रही फैक्टरी के अंदर घुस गया था। दोनों अंदर फंस गए। बाहर खड़ी वीना अपने पति व भतीजे को बचाने के लिए गुहार लगाती रही। अंदर से गणेश और अमर भी जान बचाने के लिए पुकारे, लेकिन घंटाभर बाद उनकी आवाज आनी बंद हो गई। अगले दिन शनिवार की सुबह जले हुए मलबे में दबी दोनों की लाश मिली। अमर तीन बहनों का इकलौता भाई था।
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दिनभर काम करने के बाद थका-हारा पिता गणेश अपने बच्चों के लिए खाने की चीज लाता था। उन पलों को याद कर वीना कहती है अब अब हमें रोटी भी नहीं मिल पाएगी। गणेश का बड़ा लड़का निक्कू 10 साल और छोटा टिंकू 7 वर्षीय है। टिंकू में अभी समझ की कमी है। उसकी नासमझी को देख वीना फिर फफक पड़ती है। बहादुरगढ़ की एक फैक्टरी में नौकरी कर रहे अपने एक जानकार की सलाह पर गणेश अपने परिवार और साले अमर को लेकर छह महीने पहले रोजगार के लिए बहादुरगढ़ आया था। लेकिन परिवार का सुखी रहना शायद प्रकृति को मंजूर नहीं था। वीना पढ़ी लिखी तो ही नहीं, शरीर से भी इतनी मजबूत नहीं है कि अपने पति गणेश की तरह कड़ा परिश्रम करके अपने व बच्चों का पेट भर सके। बिहार के जिला अररिया स्थित पैतृक गांव पकरी में कोई पैतृक संसाधन भी नहीं।
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औद्योगिक इकाइयों में श्रमिक सुरक्षा के इंतजाम न होना मेहनतकशों के लिए जानलेवा बन जाता है। जरूरी प्रशिक्षण की कमी के कारण भी हादसे होते हैं। श्रमिक नेता जयकरण कहते हैं कि कई कारखानों में आग बुझाने के पर्याप्त उपाय रहीं रहते। एमआइई के प्लॉट नंबर 1625 में चल रही जिस फैक्टरी में इन श्रमिकों की जान गई, उसमें बचाव के लिए जरूरी प्रबंध नहीं थे। जगह संकरी होने की वजह से फैक्टरी के गेट से सटा हुआ माल पड़ा था और इसमें आग लगने के कारण गणेश और अमर बाहर नहीं निकल पाए। जयकरण ने कहते हैं सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था की कमियों वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। पीड़ित परिवारों को कम से कम 20-20 लाख रुपये मुआवजा मिलना चाहिए।