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महेंद्रगढ़ के शेरा-राजू तथा जींद के गोलू-भोलू पर टिकी सबकी निगाहें

Sun, 23 Dec 2018 02:39 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 23 Dec 2018 02:39 AM IST
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महेंद्रगढ़ के शेरा-राजू तथा जींद के गोलू-भोलू पर टिकी सबकी निगाहें

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झज्जर। पशु प्रदर्शनी में बेहतरीन नस्लों के पशु पहुंच रहे हैं। प्रदेश स्तरीय पशु प्रदर्शनी में भेड़-बकरी पालक तक को मंच प्रदान किया गया है। प्रदर्शनी में नांगल चौधरी से सिरोही नस्ल की बकरी व बकरा लेकर पहुंचे सुनील ने कहा कि बकरी पालन उनका पुश्तैनी काम है। पहले जीवन यापन के लिए बकरी पालते थे। बदलते परिवेश में तकनीक व मार्केटिंग के साथ बकरी पालन का काम लाभ का सौदा बन गया है और प्रतिवर्ष पांच से छह लाख कमा लेते हैं। सुनील ने बताया उनके पास दो उन्नत किस्म के शेरा व राजू बकरे हैं और करीब 60 बकरियां हैं। उनकी बकरी करीब छह किलो दूध प्रतिदिन तक देती है। दिल्ली व जयपुर तक के बड़े अस्पताल बकरी का दूध खरीदते हैं। उन्होंने बताया कि डेंगू के मरीज को फ्री में दूध देते हैं। उन्होंने कहा कि बकरी का दूध उनके लिए बैंक एटीएम से कम नहीं है। किसी भी समय दूध निकालो और बेचो। सुनील ने कहा कि पशु प्रदर्शनी का लाभ हुआ है उनको नाम के साथ शोहरत भी मिल रही है

साहीवाल नस्ल का पर्याय बन चुका है जितेंद्र गिल्ला खेड़ा
जितेंद्र गिल्लाखेड़ा साहीवाल नस्ल की ब्रीडिंग के क्षेत्र में स्थापित सितारा बन चुका है। जिसके ब्रीडिंग फार्म से हिमाचल, पंजाब, आंध्रा प्रदेश सरकार खरीद रही हैं। साहीवाल नस्ल की विश्व स्तरीय मांग को पूरा करने के लिए जितेंद्र गिल्लाखेड़ा के साथ जेके व रेमंड जैसी बड़ी कंपनियों ने एमओयू कर विदेशों में भी साहीवाल नस्ल के सीमंस बेचने का कार्य शुरू कर दिया है। जितेंद्र गिल्लाखेड़ा ने वर्ष 2004 में ब्रीडिंग का कार्य शुरू किया था। आज आईवीएफ की सुविधा उनके ब्रीडिंग फार्म हाउस में मौजूद है। जितेंद्र के फार्म हाउस में साहीवाल नस्ल की गाय प्रतिदिन 21 किलोग्राम तक दूध देती हैं।
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मशीनी युग को पछाड़ रही गोलू-भोलू की जोड़ी
बिजेंद्र के खेतों को आज भी गोलू-भोलू के बैलों की जोड़ी धरती का सीना चीरकर सोना उगलती है। मशीनी युग में बैलों की मांग को बनाए रखना बड़ी बात है। राज्य स्तरीय पशु प्रदर्शनी में पहुंचे जींद जिले के किसान बिजेंद्र ने बताया कि ट्रैक्टर अपनी जगह और बैलों की जोड़ी का अलग ही कमाल है। कपास, ईख जैसी फसलों की नलाई का काम बैलों की जोड़ी ही कर सकती है। बिजेंद्र ने बताया कि वे एकड़ को हलने के लिए एक हजार रुपये लेते हैं। इसी तरह एक सीजन में उनकी गोलू-भोलू की जोड़ी लाखों रुपये कमाकर देती है।
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मुर्राह रत्न विजेता नरेंद्र डिडवाड़ी घोलू फार्म हाउस की पशु प्रदर्शनी में धूम
मुरार्ह नस्ल की ब्रीडिंग में देश भर में पहचान बन चुके नरेंद्र डिडवानी मुरार्ह रत्न पदक विजेता के घोलू फार्म हाउस के पशुओं ने राज्य स्तरीय पशु प्रदर्शनी में धूम मचा रखी है। मुर्राह नस्ल की भैंस और सांड़ अपनी-अपनी श्रेणी में अव्वल बने हुए हैं वहीं शहंशाह, धोनी, नीरू नाम के झोटों को निहारने के लिए दर्शकों की भीड़ जमा रहती है। नरेंद्र ने बताया कि उनके मुरार्ह नस्ल के सीमंस की मांग पूरे देश में है । उन्होंने कहा कि उनके फार्म हाउस के कटड़ों की भी दूसरे राज्यों में भारी मांग है।

सोनिया सफेद घोड़ी के शरीर पर एक भी तिल नहीं
वर्ष 2016 राष्ट्रीय चैंपियन का तमगा हासिल कर चुकी मारवाड़ी मुकरी नस्ल सोनिया घोड़ी का कोई तोड़ नहीं। लगभग साढ़े पांच फीट उंची बिल्कुल सफेद रंग की घोड़ी के शरीर पर तिल तक निशान नहीं है। राज्यस्तरीय प्रदर्शनी में सोनिया घोड़ी को देखने के लिए लोगों खासकर युवाओं की लाइन लगी रहती है। घोड़ी के मालिक जोगिंद्र बहादुरगढ़ निवासी ने बताया कि उनके दादा व पिताजी शौक के लिए घोड़ी पालते हैं। अब तस्वीर बदल चुकी है। उनके पास कई घोड़े व घोड़ी हैं, लेकिन सोनिया की बात ही अलग है। इसकी मांग सबसे ज्यादा रहती है और एक साल में लगभग छह से सात लाख कमाकर देती है। उन्होंने कहा कि सोनिया को दूध, चने, जौ, हरी जई ,चूरमा आदि की खुराक दी जाती है। प्रतिदिन लगभग एक हजार रुपये की डाइट सोनिया खाती है। साथ कमाई का भी कोई तोड़ नहीं।


युवा वकील का युवा बादशाह भी प्रदर्शनी में छाया
लोवा खुर्द के युवा अजय शर्मा वकालत की पढ़ाई के साथ-साथ झोटा पालन में उतर आए हैं। युवा अजय ने बताया कि पशु प्रदर्शनियों ,अखबारों में झोटों की कमाई के बारे में पढ़कर तथा मुर्राह नस्ल के सीमंस की मांग को देखते हुए उनके मन में मुर्राह नस्ल का झोटा पालने की आई। पिताजी रमेश कुमार ने भी ना नहीं की और मुर्राह नस्ल का कटड़ा पाल लिया। अब उनका कटड़ा तीस माह का हो चुका है और ग्रामीणों ने इसकी चाल-ढ़ाल देखकर इसका नाम बादशाह रख दिया। अब इसे बादशाह की कहकर पुकारते हैं।
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