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खुले में बिकने वाले गुलाल से सावधान...कहीं त्वचा न कर दे खराब
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अमर उजाला ब्यूरो
बहादुरगढ़। होली खुशियां, मस्ती और उत्साह लेकर आती है, लेकिन रंगों के इस त्योहार में रंग से खेलने में जितना मजा होता है, उससे कहीं ज्यादा रंग छुड़ाने की टेंशन रहती है। दरअसल बुरा न मानो होली है कहकर रंग फेंकने बाले अल्हड़ युवकों की टोलियां अपनी पिचकारी व गुब्बारों में जो रंग इस्तेमाल करते हैं या गुलाल का प्रयोग करते हैं, उनमें अभ्रक, शीशा जैसे हानिकारक रसायनिक पदार्थ मिले होते हैं। इनसे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है। त्वचा में जलन शुरू हो जाती है। बाजार में खुले में बिकने वाले गुलाल से त्वचा खराब हो सकती है। इसलिए बाजार में खुले में बिकने वाले गुलाल और रंगों की खरीदारी से लोगों को बचना चाहिए। इस बारे में त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. आरके वशिष्ठ ने बताया कि आमतौर पर लोग खुले में रंग खेलते हैं, जिससे सूर्य की गर्मी से भी त्वचा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। खुले आसमान में हानिकारक पराबैंगनी किरणों के साथ-साथ नमी की कमी से त्वचा के रंग में कालापन आ जाता है। होली खेलने के बाद त्वचा निर्जीव बन जाती है। खास बात यह है कि बाजार में खुले में बिकने वाले रंग और गुलाल खरीदने से बचना चाहिए। वह रंग-गुलाल तो त्वचा को काफी हद तक नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए हर्बल गुलाल खरीदना चाहिए। शहर के रेलवे रोड, मेन बाजार, झज्जर रोड, नाहरा-नाहरी रोड के अलावा नजफगढ़ रोड समेत अन्य कई मार्गों पर होली के आइटम की दुकानें सजी हैं। वहीं सड़कों पर खुले में बिकने वाला गुलाल और रंग की दुकानें भी लगी हैं। मौजूदा दौर में बाजार में बिकने बाले रंगों में हर्बल तथा प्राकृतिक उत्पाद नाममात्र ही होते हैं।
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बहादुरगढ़। होली खुशियां, मस्ती और उत्साह लेकर आती है, लेकिन रंगों के इस त्योहार में रंग से खेलने में जितना मजा होता है, उससे कहीं ज्यादा रंग छुड़ाने की टेंशन रहती है। दरअसल बुरा न मानो होली है कहकर रंग फेंकने बाले अल्हड़ युवकों की टोलियां अपनी पिचकारी व गुब्बारों में जो रंग इस्तेमाल करते हैं या गुलाल का प्रयोग करते हैं, उनमें अभ्रक, शीशा जैसे हानिकारक रसायनिक पदार्थ मिले होते हैं। इनसे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है। त्वचा में जलन शुरू हो जाती है। बाजार में खुले में बिकने वाले गुलाल से त्वचा खराब हो सकती है। इसलिए बाजार में खुले में बिकने वाले गुलाल और रंगों की खरीदारी से लोगों को बचना चाहिए। इस बारे में त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. आरके वशिष्ठ ने बताया कि आमतौर पर लोग खुले में रंग खेलते हैं, जिससे सूर्य की गर्मी से भी त्वचा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। खुले आसमान में हानिकारक पराबैंगनी किरणों के साथ-साथ नमी की कमी से त्वचा के रंग में कालापन आ जाता है। होली खेलने के बाद त्वचा निर्जीव बन जाती है। खास बात यह है कि बाजार में खुले में बिकने वाले रंग और गुलाल खरीदने से बचना चाहिए। वह रंग-गुलाल तो त्वचा को काफी हद तक नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए हर्बल गुलाल खरीदना चाहिए। शहर के रेलवे रोड, मेन बाजार, झज्जर रोड, नाहरा-नाहरी रोड के अलावा नजफगढ़ रोड समेत अन्य कई मार्गों पर होली के आइटम की दुकानें सजी हैं। वहीं सड़कों पर खुले में बिकने वाला गुलाल और रंग की दुकानें भी लगी हैं। मौजूदा दौर में बाजार में बिकने बाले रंगों में हर्बल तथा प्राकृतिक उत्पाद नाममात्र ही होते हैं।