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50 साल पहले शहर में चार जगह ही होता था होलिका दहन, अब 50 से ज्यादा जगहों पर
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अमर उजाला ब्यूरो
चरखी दादरी। करीब पांच दशक पहले जब शहर की आबादी 10 हजार थी, उस समय मात्र चार स्थानों पर होलिका का दहन होता था। इस बार शहर में 50 स्थानों पर होलिका बनाई गई हैं। वहीं, एक अनुमान के अनुसार जिलेभर में 400 से अधिक स्थानों पर होलिका दहन होगा। 10 फरवरी को वसंत पंचमी पर्व पर इन स्थानों पर होलिका रख दी थी। इस बार होलिका दहन 20 मार्च को होना है।
होली पर्व को लेकर जिले मेें चहल-पहल शुरू हो गई है। बाजारों में भी रौनक शुरू हो गई है। चरखी दादरी का सबसे पुराना एरिया हीरा चौक, सुभाष चौक, छोटी बजारी व मथुरी घाटी को माना जाता है। यह क्षेत्र शहर की सबसे ज्यादा ऊंचाई पर हैं। श्यामसर तालाब के आसपास की बस्ती भी काफी पुरानी है। शहर की आबादी जब 10 हजार थी उस समय शहर में शहर में मात्र चार स्थानों पर होलिका दहन होता था। पुराना शहरवासी कीकरवासनी हनुमान मंदिर के समीप होलिका दहन करते थे। इसी दौरान शहर के लाधानपाना क्षेत्र, झज्जरघाटी में भी होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई। उसके बाद शहर की बंद पड़ी सीसीआई सीमेंट फैक्ट्री के समीप भी होलिका दहन होने लगा। बाद में मथुरी घाटी बस्ती में भी चरखी दरवाजा के समीप होलिका बनाकर दहन किया जाने लगा। अब शहर की आबादी करीब 80 हजार तक पहुंच गई है। शहर में 21 वार्ड हैं। हर वार्ड में अलग- अलग कई स्थानों पर होलिका दहन होता है। इस बार शहर में 70 स्थानों पर होलिका दहन होगा। पूरे जिले में 400 स्थानों पर होलिका दहन किया जाएगा। जिले में 172 गांव हैं। पुरानी परंपरा अनुसार गांव में एक ही स्थान पर होलिका दहन होता था लेकिन आजकल हर गांव में दो से तीन स्थानों पर होलिका बना रखी हैं।
बुजुर्ग बोले : होली का चाव हो रहा खत्म, मनाने का अंदाज भी बदला
शहर के 81 वर्षीय बुजुर्ग एवं गीता भवन ट्रस्टी गंगाराम बिरोहड़िया का कहना है कि आज का जमाना काफी बदल गया है लेकिन होली पर्व मनाने की परंपरा आज भी कायम है। पुराने समय में होलिका दहन का कार्य विधिवत रूप से मंत्रोच्चारण के साथ पुजारी एवं पंडित से करवाया जाता था। होलिका दहन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार निर्धारित समय पर होता था लेकिन आज होलिका दहन करते समय न तो शुभ मुहूर्त एवं समय देखा जाता है और न ही पंडित व पुजारी से मंत्रोच्चारण करवाया जाता है।
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60 वर्षीय लाधानपाना निवासी सुरेश कुमार ने बताया कि शहर में शुरूआत में चार स्थानों पर होलिका दहन होता था अब तो हर वार्ड में दो से तीन स्थानों पर होलिका दहन होता है। उनका मानना है कि होलिका पर्व मनाने के तौर-तरीकों में आज एकदम बदलाव आ गया है। पुराने जमाने में निर्धारित समय पर पंडित ही होलिका दहन करवाता था लेकिन आज यह रिवाज बीते जमाने की बन गई है। होली पर्व पर घरों में चावल, शक्कर, घी व दाल मुख्य पकवान होता था लेकिन आज घरों में रोज त्योहार मानता है। त्योहारों पर बाजार के रेडीमेड पकवान चलते हैं।
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चरखी दादरी। करीब पांच दशक पहले जब शहर की आबादी 10 हजार थी, उस समय मात्र चार स्थानों पर होलिका का दहन होता था। इस बार शहर में 50 स्थानों पर होलिका बनाई गई हैं। वहीं, एक अनुमान के अनुसार जिलेभर में 400 से अधिक स्थानों पर होलिका दहन होगा। 10 फरवरी को वसंत पंचमी पर्व पर इन स्थानों पर होलिका रख दी थी। इस बार होलिका दहन 20 मार्च को होना है।
होली पर्व को लेकर जिले मेें चहल-पहल शुरू हो गई है। बाजारों में भी रौनक शुरू हो गई है। चरखी दादरी का सबसे पुराना एरिया हीरा चौक, सुभाष चौक, छोटी बजारी व मथुरी घाटी को माना जाता है। यह क्षेत्र शहर की सबसे ज्यादा ऊंचाई पर हैं। श्यामसर तालाब के आसपास की बस्ती भी काफी पुरानी है। शहर की आबादी जब 10 हजार थी उस समय शहर में शहर में मात्र चार स्थानों पर होलिका दहन होता था। पुराना शहरवासी कीकरवासनी हनुमान मंदिर के समीप होलिका दहन करते थे। इसी दौरान शहर के लाधानपाना क्षेत्र, झज्जरघाटी में भी होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई। उसके बाद शहर की बंद पड़ी सीसीआई सीमेंट फैक्ट्री के समीप भी होलिका दहन होने लगा। बाद में मथुरी घाटी बस्ती में भी चरखी दरवाजा के समीप होलिका बनाकर दहन किया जाने लगा। अब शहर की आबादी करीब 80 हजार तक पहुंच गई है। शहर में 21 वार्ड हैं। हर वार्ड में अलग- अलग कई स्थानों पर होलिका दहन होता है। इस बार शहर में 70 स्थानों पर होलिका दहन होगा। पूरे जिले में 400 स्थानों पर होलिका दहन किया जाएगा। जिले में 172 गांव हैं। पुरानी परंपरा अनुसार गांव में एक ही स्थान पर होलिका दहन होता था लेकिन आजकल हर गांव में दो से तीन स्थानों पर होलिका बना रखी हैं।
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बुजुर्ग बोले : होली का चाव हो रहा खत्म, मनाने का अंदाज भी बदला
शहर के 81 वर्षीय बुजुर्ग एवं गीता भवन ट्रस्टी गंगाराम बिरोहड़िया का कहना है कि आज का जमाना काफी बदल गया है लेकिन होली पर्व मनाने की परंपरा आज भी कायम है। पुराने समय में होलिका दहन का कार्य विधिवत रूप से मंत्रोच्चारण के साथ पुजारी एवं पंडित से करवाया जाता था। होलिका दहन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार निर्धारित समय पर होता था लेकिन आज होलिका दहन करते समय न तो शुभ मुहूर्त एवं समय देखा जाता है और न ही पंडित व पुजारी से मंत्रोच्चारण करवाया जाता है।
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60 वर्षीय लाधानपाना निवासी सुरेश कुमार ने बताया कि शहर में शुरूआत में चार स्थानों पर होलिका दहन होता था अब तो हर वार्ड में दो से तीन स्थानों पर होलिका दहन होता है। उनका मानना है कि होलिका पर्व मनाने के तौर-तरीकों में आज एकदम बदलाव आ गया है। पुराने जमाने में निर्धारित समय पर पंडित ही होलिका दहन करवाता था लेकिन आज यह रिवाज बीते जमाने की बन गई है। होली पर्व पर घरों में चावल, शक्कर, घी व दाल मुख्य पकवान होता था लेकिन आज घरों में रोज त्योहार मानता है। त्योहारों पर बाजार के रेडीमेड पकवान चलते हैं।