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Hisar News: बिना नोटिस गिरफ्तारी मामले में तत्कालीन एसपी हाईकोर्ट में पेश
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हिसार। जिले में बिना नोटिस गिरफ्तारी के मामले को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट के आदेश पर वीरवार को हिसार के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) लोकेंद्र सिंह, सदर थाना प्रभारी मनदीप सिंह और जांच अधिकारी (आईओ) दिनेश कुमार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पेश हुए। कोर्ट ने जांच अधिकारी दिनेश कुमार के खिलाफ अवमानना की प्रक्रिया शुरू कर दी है और 21 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अधिवक्ता लाल बहादुर खोवाल ने बताया कि 29 अप्रैल 2022 को पुलिस ने सैनिक छावनी क्षेत्र स्थित एक पेट्रोल पंप के पास गांव सातरोड कलां निवासी अशोक कुमार पूनिया को पकड़ लिया था। आरोप है कि पुलिस ने उसके साथ मारपीट कर उसे झाड़ियों में फेंक दिया। बाद में अशोक कुमार को नागरिक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां उसका मेडिकल भी कराया गया। अगले दिन अस्पताल से सूचना मिलने पर सदर थाना पुलिस ने अशोक कुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 341 और 506 के तहत केस दर्ज कर लिया। इसके बाद उसे धारा 41(ए) का नोटिस दिए बिना गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जो कानूनन अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना माना जाता है। इस पर सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए कहा गया कि अर्नेश कुमार के फैसले की अवमानना मुकदमा दर्ज होने के बाद में मानी जाती। मगर इस मामले में पुलिस ने गिरफ्तारी से पहले मुकदमा दर्ज नहीं किया था।
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हाईकोर्ट की टिप्पणी व कानूनी पहलू
याचिकाकर्ता के वकील मुकेश राव ने कोर्ट को बताया कि अगर मुकदमा दर्ज होने से पहले गिरफ्तारी है तो डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य की सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक जजमेंट की अवहेलना हुई है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिना मामला दर्ज किए और उचित प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह माना कि अगर याचिका में उल्लेखित अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य केस इस मामले में लागू नहीं होता, तो इस स्थिति में डीके बसु की गाइडलाइंस पूरी तरह लागू होती हैं और अवमानना की कार्रवाई बनती है।
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तत्कालीन अधिकारियों की स्थिति
तत्कालीन एसपी लोकेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट में कहा कि थाना प्रभारी और जांच अधिकारी की कार्रवाई गलत थी और उनके खिलाफ विभागीय एक्शन लिया गया था। थाना प्रभारी मनदीप सिंह ने अदालत को बताया कि घटना के समय वह पेट्रोलिंग ड्यूटी पर थे। हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्कालीन एसपी और एसएचओ से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि उन्होंने इस अवैध गिरफ्तारी पर क्या कार्रवाई की।
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अधिवक्ता लाल बहादुर खोवाल ने बताया कि 29 अप्रैल 2022 को पुलिस ने सैनिक छावनी क्षेत्र स्थित एक पेट्रोल पंप के पास गांव सातरोड कलां निवासी अशोक कुमार पूनिया को पकड़ लिया था। आरोप है कि पुलिस ने उसके साथ मारपीट कर उसे झाड़ियों में फेंक दिया। बाद में अशोक कुमार को नागरिक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां उसका मेडिकल भी कराया गया। अगले दिन अस्पताल से सूचना मिलने पर सदर थाना पुलिस ने अशोक कुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 341 और 506 के तहत केस दर्ज कर लिया। इसके बाद उसे धारा 41(ए) का नोटिस दिए बिना गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जो कानूनन अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना माना जाता है। इस पर सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए कहा गया कि अर्नेश कुमार के फैसले की अवमानना मुकदमा दर्ज होने के बाद में मानी जाती। मगर इस मामले में पुलिस ने गिरफ्तारी से पहले मुकदमा दर्ज नहीं किया था।
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हाईकोर्ट की टिप्पणी व कानूनी पहलू
याचिकाकर्ता के वकील मुकेश राव ने कोर्ट को बताया कि अगर मुकदमा दर्ज होने से पहले गिरफ्तारी है तो डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य की सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक जजमेंट की अवहेलना हुई है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिना मामला दर्ज किए और उचित प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह माना कि अगर याचिका में उल्लेखित अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य केस इस मामले में लागू नहीं होता, तो इस स्थिति में डीके बसु की गाइडलाइंस पूरी तरह लागू होती हैं और अवमानना की कार्रवाई बनती है।
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तत्कालीन अधिकारियों की स्थिति
तत्कालीन एसपी लोकेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट में कहा कि थाना प्रभारी और जांच अधिकारी की कार्रवाई गलत थी और उनके खिलाफ विभागीय एक्शन लिया गया था। थाना प्रभारी मनदीप सिंह ने अदालत को बताया कि घटना के समय वह पेट्रोलिंग ड्यूटी पर थे। हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्कालीन एसपी और एसएचओ से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि उन्होंने इस अवैध गिरफ्तारी पर क्या कार्रवाई की।