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रोशनी के राग भूली वक्त की शहनाइयां, आसमानी झील ढूंढे चांद की परछाइयां

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 04 Feb 2022 11:27 PM IST
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The lights of time are forgotten, the shadows of the moon find the sky lake
वसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर अमर उजाला हिसार कार्यालय में आयोजित काव्य गोष्ठी में मौजूद कवि और क - फोटो : Hisar
हिसार। वसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत अमर उजाला कार्यालय में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें शहर के कवि व कवयित्रियों ने महिला सशक्तीकरण पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। समारोह में कवि सतीश कौशिक ने रोशनी के राग भूली वक्त की शहनाइयां, आसमानी झील ढूंढे चांद की परछाइयां कविता सुनाई।
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कवयित्री कल्पना रहेजा ने सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत की। उन्होंने मुलतानी में गीत भी गाया। काव्य समारोह का आकर्षण चौथी कक्षा का 9 वर्षीय बाल कवि युगांतर प्रधान रहा। युगांतर ने अपनी कविता के जरिये देश की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए जोश भर दिया। करीब एक घंटे तक चली काव्य गोष्ठी में गिटार पर अपनी प्रस्तुति देते हुए नवीन निषाद ने माहौल को संगीतमय बना दिया। कार्यक्रम का अंत हल्के अंदाज में हरियाणवीं चुटकलों के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार कमलेश भारतीय और संचालन जीजेयू के डीवाईडब्ल्यू में कार्यरत रश्मि ने किया।
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दर्द तुझे भी तो होता होगा
मेरे ख्वाब देखने की आस में तू कभी तो रातों में सोता होगा।
बांहों में टूटकर बिखर जाने का मन तेरा भी तो होता होगा।
यूं पत्थर दिल बनकर रुलाता है पल पल नेमत को,
जख्म-ए-दिल के अंधेरों में तू भी तो कभी रोता होगा।
तू मर्द है तो क्या पर प्यार ना मिलने से दर्द तुझे भी तो होता होगा।
- पूनम जांगड़ा, निर्देशिका एवं कवयित्री
ओढ़ वासंती मुखौटे
रोशनी के राग भूली वक्त की शहनाईयां,
आसमानी झील ढूंढे चांद की परछाईयां,
धुंध को ढोती हवाऍं हांफती चलती रही,
नागफनियां बरगदों की छांव में पलती रही।
- सतीश कौशिक, कवि
जुड़वां बेटी का दर्द
जब मैं इस दुनिया में आई,
घर में मातम सा छा गया,
पर जब पीछे-पीछे आया जुड़वां भाई,
दादी ने थाली जोर-जोर से बजाई,
पूरे गांव में खबर फैली बेटा हुआ,
बेटी का नामोनिशान भी नहीं॥
- सरोज श्योराण, कवयित्री
आई रे आई वसंत ऋतु...
बागों में कलियां मुस्काई,
फूल-फूल पर बैठे भंवरे,
धूल-धूल में महक समाई,
देखो वसंत ऋतु है आई॥
- अर्चना ठकराल, कवयित्री
पत्थर की अभिलाषा
मुझसे कोई टॉफी खिलौनों की दुकान बनवा लेते, जहां बच्चे आंखे चमकाते, रोते, जिद्द करते मां-बाप को सतातेे
तो अच्छा होता। मैं निर्जीव हूं, बस इतना है कि क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, खुद को बस इंसान बना लेते
तो अच्छा होता॥ - प्रो. सरोज कवयित्री, जीजेयू
नया सपना...
एक नशा हर जिंदगी में साथ होना चाहिए।
ख्वाब छोटा ही सही सबको पिरोना चाहिए।
रूठ जाएं रास्ते मंजिल बिना हासिल किए।
हौसलों को फिर नया सपना संजोना चाहिए।
- रिंपी लीखा, अभिनेत्री एवं गायिका, हांसी
भारत देश है दिव्य कांति...
भारत देश है अद्भुत शांति का,
समय की नदी, घाट इतिहास के,
सदी दर सदी पाठ विश्वास के,
संस्कारों की धारा सनातन रहे,
संबंधों की मिठास से हर दिन त्योहार-सा मना रहे हैं,
मैं हर पल हर दिन अपने देश का सम्मान करता हूं,
सपना यही देश के उत्थान का मैं ध्यान करता हूं।
- युगांतर प्रधान, बाल कवि
अब मैं अपने बहुत पास हूं...
अपने मंगलसूत्र कंगन-टीके और तागड़ी के
सारे सोने को तोड़-मरोड़,
अपनी रीढ़ को जा लिया मैंने
और वह फौलाद सी मजबूत,
दुनिया का सामना करने
एक योद्धा की तरह तनी खड़ी है अब॥
- शमीम शर्मा, साहित्यकार एवं कवयित्री
एक दिन किताबों के पन्ने
हरे होंगे और सुनाएंगे
पेड़ से किताब,
होने तक की कहानी
छोटी-छोटी तीलियां
जीवित हो माचिसों से निकलेंगी
और जलने जलाने से मना कर देंगी
- शिम्पी मेहरा, कवि, जीजेयू
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