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महिलाओं की सुमित्र बनीं मंगाली की सुमित्रा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 18 Sep 2022 11:42 PM IST
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Sumitra of Mangali becomes good friend of women
एमएसएमई की तरफ से लगाए गए व्यापार मेले में अपने उत्पाद प्रदर्शित करतीं सुमित्रा। - फोटो : Hisar
हिसार। शहर के नजदीकी गांव मंगाली की सुमित्रा महिलाओं से आत्मनिर्भरता की अलख जगा रही हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुमित्रा न सिर्फ खुद पैरों पर खड़ी हुईं, बल्कि अपनी ही जैसी करीब 15 हजार जरूरतमंद महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़कर आत्मनिर्भर बना चुकी है। यही नहीं सुमित्रा पड़ोसी देश पाकिस्तान तक की महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं। सुमित्रा को महिला उत्थान में उनके योगदान के लिए कई बार सम्मानित किया जा चुका है।
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यूं शुरू किया सफर
सुमित्रा ने बताया कि मेरे परिवार का बीपीएल कार्ड बना हुआ था। इसके आधार पर मैं वर्ष 1990 में मकान के लिए लोन लेने बीडीओ कार्यालय में गई। वहां मुझे लोन तो नहीं मिला, लेकिन वहां तैनात अधिकारी ने मुझे एक स्कीम की किताब दी। मैंने उस किताब को पढ़ा। इसके बाद मैं उक्त अधिकारी से बोली कि मुझे लोन नहीं चाहिए। मुझे इस किताब के अनुसार यह समूह बनाना है। इसके बाद मैंने 10 महिलाओं के साथ एक समूह बनाया। सबसे पहले मुझे पंजीरी बनाने का काम दिया गया। बस यही से मेरे सफर की शुरुआत हुई। वर्ष 2000 में स्वयं सहायता समूह की याजना आई तो जिले का सबसे पहला समूह जागृति महिला समूह मैंने ही बनाया था। इस समूह के तहत महिलाएं मनके बनाती थीं।
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दिल्ली व्यापार मेले में प्रदर्शित किए अपने उत्पाद
सुमित्रा ने बताया कि हमारा समूह पहले मनके बनाकर उन्हें गांव के ही बड़े व्यापारियों को बेचता था और वे व्यापारी उसे दिल्ली सप्लाई करते थे, जहां उनसे विभिन्न बैग, माला समेत अलग-अलग उत्पाद बनाए जाते थे। यह देखकर मैंने दिल्ली में उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद हमारा समूह मनके बनाने के साथ-साथ उनसे विभिन्न वस्तुएं भी बनाने लगा। हमनें अपने उत्पादों को दिल्ली व्यापार मेले में भी प्रदर्शित किया। सुमित्रा ने बताया कि मैंने लगातार 15 साल इस मेले में स्टॉल लगाई। इसके अलावा मैंने देश के अन्य हिस्सों में लगने वाले मेलों व प्रदर्शनियों में अपने उत्पाद प्रदर्शित किए।
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कई गांवों में बनवाए स्वयं सहायता समूह
यहां से सुमित्रा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बकौल सुमित्रा मैंने मंगाली के अलावा आसपास के गांवों में भी महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनवाए। इस तरह से मैंने आसपास की गांवों की करीब 1500 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। इसके बाद वर्ष 2006 में मैंने भारती फाउंडेशन के नाम एक एनजीओ बना ली। इसके माध्यम से मैंने नाबार्ड से कई प्रोजेक्ट लिए। इन प्रोजेक्ट के माध्यम से मैंने जींद, फतेहाबाद, भिवानी व चरखी दादरी आदि जिलों में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उनके स्वयं सहायता समूह बनवाए।
पाकिस्तान जाकर दिया प्रशिक्षण
सुमित्रा के अनुसार फरवरी 2012 में एक दिन मुझे तत्कालीन डीसी व एडीसी ने कागजाज के साथ कार्यालय बुलाया। वहां उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें पाकिस्तान जाकर वहां की महिलाओं को प्रशिक्षण देना है। पहले तो मैं बहुत घबरा गई, लेकिन बाद में तैयार हो गई। 10 दिनों के लिए पाकिस्तान गई। वहां मैंने महिलाओं को लकड़ी के मोती बनाने का प्रशिक्षण दिया।

खुद पढ़ी व बच्चों को दिलवाई उच्च शिक्षा
सुमित्रा ने बताया कि मेरी 14 साल की उम्र में ही शादी हो गई थी, जिस कारण से मुझे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। जिस समय मेरी शादी हुई, उस समय मैं 5वीं कक्षा में पढ़ती थी। मगर शादी के बाद मैंने दसवीं परीक्षा पास की। मैंने अपने चारों बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलवाई। मेरी एक बेटी बीटेक पास है, जबकि बेटा रक्षा मंत्रालय में बतौर ऑडिटर कार्यरत है। सुमित्रा के मुताबिक स्वयं सहायता समूह ने सिर्फ मेरा ही नहीं, बल्कि हजारों महिलाओं का जीवन बदल दिया।
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