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राज्यकवि उदयभानु ‘हंस’ की विरासत खाली प्लाट और टीन शेड के नीचे बिखरी
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उदयभानु हंस के मकान का खाली पड़ा प्लाट
- फोटो : Hisar
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हिसार। अपनी रुबाइयों से हिंदी साहित्य में विश्व स्तर की पहचान बनाने वाले कवि उदयभानु हंस की विरासत अब खाली प्लाट में ईंट-पत्थरों के टुकड़ों में बिखर चुकी है। कभी देश-विदेश में चमकने वाले हिंदी साहित्य के मोती की पुस्तकों की धरोहर एक शिष्य के पास टीन शेड के नीचे कोने में रखी हुई है। आसपास के लोग भी अब उनको भुला रहे हैं। उनके मकान से महज 100 मीटर दूर बसे लोग भी उनका पता नहीं बता पा रहे। राज्य कवि उदयभानु हंस की हिसार में आखिरी निशानी उनका प्लाट भी बिकने के लिए तैयार है। हरियाणा के पहले राज्यकवि के नाम पर शहर में किसी भी चीज का नामकरण नहीं है। हंस हिसार में 65 साल रहे, लेकिन उनके जाने के महज दो साल में ही हिसार ने उन्हें भुला दिया है।
पाकिस्तान में मुल्तान के पास मुजफ्फरगढ़ के डेरा दीन पनाह में जन्मे उदय भानु हंस को बंटवारे के बाद दर-ब-दर भटकना पड़ा था। 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला संबोधन सुनने वह लाल किले में मौजूद थे। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों में हालात सुधरेंगे तो वह अपनी जन्मभूमि मुल्तान चले जाएंगे, बावजूद इसके कि अब वह पाकिस्तान का हिस्सा था। ऐसा न हुआ, न होना था। उन्होंने कुछ समय करनाल में बिताया, जहां उनके बड़े भाई और पिता बस गए थे। उनकी पत्नी कृष्णा भी पाकिस्तान से आए परिवार की बेटी थी। वह अपनी पत्नी कृष्णा को लेकर दिल्ली चले गए। दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ी। अस्थायी शिक्षक के तौर पर पढ़ाया भी। सरायकी उनकी मां-बोली थी। संस्कृत, उर्दू, फारसी में वह पारंगत थे। संस्कृत जानने के कारण हिंदी सीखने में उन्हें वक्त नहीं लगा। हिंदी में ही उन्होंने दिल्ली आकर प्रभाकर किया। फिर एमए भी किया। हिंदी में उन्होंने रुबाइयां लिखीं। जो साहित्य में नया प्रयोग था। राजकीय महाविद्यालय हिसार में हिंदी प्रवक्ता बनने का अवसर मिला तो 20 सितंबर 1954 को यहां आ गए। कॉलेज में कला संस्कृति के मंच त्रिवेणी के जरिये उन्होंने कई कला प्रतिभाओं को आगे बढ़ाया। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार गुलशन सचदेव, झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस भगवती प्रसाद, हिसार के उद्योगपति विजय कौशिक, दिल्ली के मुख्य आयकर आयुक्त रहे अशोक भारद्वाज, दिल्ली में जज रहे आरके जैन, अभिनेता यशपाल शर्मा भी उन्हें हमेशा गुरु मानते रहे। हिसार में रहते हुए ही उदयभानु हंस की लेखनी से तमाम कविता पुस्तकें आईं। इनमें दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह पर हिंदी में पहला महाकाव्य ‘संत सिपाही’ भी शामिल है। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें 1968 में निराला पुरस्कार दिया था। उन्हें पहले राज्य कवि का पुरस्कार मिला था।
हंस साहित्य
भेदियों के ढंग
हंस मुक्तावली
संत सिपाही देसां में देस हरियाणा
शंख और शहनाई
पुरस्कार-सम्मान
(हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से)राज्य कवि - 1966
सुर पुरस्कार - 2006
हरियाणा साहित्य रत्न सम्मान - 2009
(उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से)निराला पुरस्कार - 1968
दो साल पहले चले गए....
उदयभानु हंस का जन्म 2 अगस्त 1926 को पाकिस्तान में हुआ। 26 फरवरी 2019 को वह इस सांसरिक जीवन को छोड़कर चले गए। उनके आखिरी दिनों में उनकी स्मृतियां कमजोर होने लगी थी। सीएम मनोहरलाल उनका स्वास्थ्य पूछने उनके घर भी पहुंचे थे। हंस के निधन के बाद उनके बेटे शशि हंस हिसार को छोड़कर गुरुग्राम में चले गए। मकान को तोड़कर प्लाट को ब्रिकी के लिए छोड़ा हुआ है। उनके पास कुछ पुस्तकें थी। जो पड़ोस में रहने वाले उनके शिष्य सुरेश कुमार के पास टीन शेड के नीचे एक कोने में अव्यवस्थित हालत में पड़ी हैं।
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पाकिस्तान में मुल्तान के पास मुजफ्फरगढ़ के डेरा दीन पनाह में जन्मे उदय भानु हंस को बंटवारे के बाद दर-ब-दर भटकना पड़ा था। 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला संबोधन सुनने वह लाल किले में मौजूद थे। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों में हालात सुधरेंगे तो वह अपनी जन्मभूमि मुल्तान चले जाएंगे, बावजूद इसके कि अब वह पाकिस्तान का हिस्सा था। ऐसा न हुआ, न होना था। उन्होंने कुछ समय करनाल में बिताया, जहां उनके बड़े भाई और पिता बस गए थे। उनकी पत्नी कृष्णा भी पाकिस्तान से आए परिवार की बेटी थी। वह अपनी पत्नी कृष्णा को लेकर दिल्ली चले गए। दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ी। अस्थायी शिक्षक के तौर पर पढ़ाया भी। सरायकी उनकी मां-बोली थी। संस्कृत, उर्दू, फारसी में वह पारंगत थे। संस्कृत जानने के कारण हिंदी सीखने में उन्हें वक्त नहीं लगा। हिंदी में ही उन्होंने दिल्ली आकर प्रभाकर किया। फिर एमए भी किया। हिंदी में उन्होंने रुबाइयां लिखीं। जो साहित्य में नया प्रयोग था। राजकीय महाविद्यालय हिसार में हिंदी प्रवक्ता बनने का अवसर मिला तो 20 सितंबर 1954 को यहां आ गए। कॉलेज में कला संस्कृति के मंच त्रिवेणी के जरिये उन्होंने कई कला प्रतिभाओं को आगे बढ़ाया। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार गुलशन सचदेव, झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस भगवती प्रसाद, हिसार के उद्योगपति विजय कौशिक, दिल्ली के मुख्य आयकर आयुक्त रहे अशोक भारद्वाज, दिल्ली में जज रहे आरके जैन, अभिनेता यशपाल शर्मा भी उन्हें हमेशा गुरु मानते रहे। हिसार में रहते हुए ही उदयभानु हंस की लेखनी से तमाम कविता पुस्तकें आईं। इनमें दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह पर हिंदी में पहला महाकाव्य ‘संत सिपाही’ भी शामिल है। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें 1968 में निराला पुरस्कार दिया था। उन्हें पहले राज्य कवि का पुरस्कार मिला था।
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भेदियों के ढंग
हंस मुक्तावली
संत सिपाही देसां में देस हरियाणा
शंख और शहनाई
पुरस्कार-सम्मान
(हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से)राज्य कवि - 1966
सुर पुरस्कार - 2006
हरियाणा साहित्य रत्न सम्मान - 2009
(उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से)निराला पुरस्कार - 1968
दो साल पहले चले गए....
उदयभानु हंस का जन्म 2 अगस्त 1926 को पाकिस्तान में हुआ। 26 फरवरी 2019 को वह इस सांसरिक जीवन को छोड़कर चले गए। उनके आखिरी दिनों में उनकी स्मृतियां कमजोर होने लगी थी। सीएम मनोहरलाल उनका स्वास्थ्य पूछने उनके घर भी पहुंचे थे। हंस के निधन के बाद उनके बेटे शशि हंस हिसार को छोड़कर गुरुग्राम में चले गए। मकान को तोड़कर प्लाट को ब्रिकी के लिए छोड़ा हुआ है। उनके पास कुछ पुस्तकें थी। जो पड़ोस में रहने वाले उनके शिष्य सुरेश कुमार के पास टीन शेड के नीचे एक कोने में अव्यवस्थित हालत में पड़ी हैं।

टीन शेड के नीचे कोने में पड़ी उदयभानु हंस की स्मृति पुस्तकें- फोटो : Hisar
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