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बबच्चों के साथ बिताएं समय तो वे नहीं हारेंगे जिंदगी की जंग
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डॉक्टर संदीप राणा। संवाद
- फोटो : Hisar
हिसार। छोटे बच्चे अपनी पढ़ाई पर फोकस रखें और किशोर पढ़ाई का तनाव न लेकर अपनी रुचि के कार्य कर सकें। इसके लिए परिवार वालों को भी उनकी मदद करनी होगी। ताकि बच्चे अपने जीवन में सफलता हासिल कर सकें। यह कहना है गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप राणा का और जिला नागरिक अस्पताल में कार्यरत मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. पूनम दहिया का। दोनों विशेषज्ञों का कहना कि आजकल की भागमभाग जिंदगी में से बच्चों के लिए भी समय निकालें, ताकि वे अपनी जिंदगी की जंग न हारें। आज बाल दिवस है। इसलिए हमने मनोवैज्ञानिक और मनोरोग विशेषज्ञ से जाना कि बच्चे कैसे मानसिक रूप से मजबूत बनें और अभिभावक उनके कैसे सहायक बन सकें।
मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल देखने में आता है कि छोटे बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान न देकर टीवी देखने, मोबाइल पर गेम खेलने में व्यतीत करते हैं। इस वजह से वे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं। उसके बाद माता-पिता या अन्य अभिभावक उन्हें पढ़ाई के लिए टोकते हैं तो बच्चों में चिड़चिड़ापन आ जाता है। इसलिए इस मामले को गंभीरता से लेते हुए बच्चों की पढ़ाई और खेल में सामंजस्य बनाने का प्रयास करें।
बच्चों के साथ खाना खाएं, खेलें और उन्हें उनकी रुचि के काम भी करने दें : डॉ. पूनम
जिला नागरिक अस्पताल में मनोराग विशेषज्ञ डॉ. पूनम दहिया बतातीं है कि छोटे बच्चों के साथ दिन में कम से कम एक बार आप खुद भी भोजन करें, ताकि बच्चे भी आपके साथ घुल मिल जाएं। बच्चा आपकी बातों को समझ पाए और उन्हें अपने जीवन में उतार पाए। इसलिए बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताएं चाहे खाना साथ में खाएं या उनके साथ कोई आउटडोर गेम खेलें। इससे बच्चे पढ़ाई का तनाव नहीं लेंगे और आपकी बातों को ध्यान से सुनेंगे और वे अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देंगे। इसके अलावा आउटडोर गेम खेलने से बच्चों में शारीरिक विकास तो होगा ही साथ ही उनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का विकास होगा। इसे वे अपनी पढ़ाई और खेल पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। इसके अलावा बच्चों को उनकी रुचि के कार्य भी करने दे जैसे डांस, पेंटिंग रचनात्मक कार्य, कविता लेखन कहानी लेखन आदि। डॉ. पूनम दहिया ने बताया कि उनके पास महीन में चार से पांच बच्चे ऐसे आते हैं जो अभिभावकों के समय न देने या अन्य किसी कारण से अवसाद के शिकार होते हैं।
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किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों को डांटें नहीं, प्यार से बात करें : डॉ. संदीप
गुजवि के मनोवैज्ञानिक डॉ. संदीप राणा ने बताया कि बड़े किशोरावस्था के बच्चों में सुसाइड के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन पर अभिभावक और आसपास के लोगों का पढ़ाई को लेकर दबाव रहता है। कई बार सफल न होने पर वे सुसाइड तक कर लेते हैं। इन बातों से बचने के लिए अभिभावक को चाहिए कि वे किशोरावस्था में पहुंच चुके अपने बच्चों से प्यार से बात करें। उन्हें किसी बात के लिए डांट फटकार न लगाएं। अगर बच्चों को किसी तरह की कोई समस्या है तो उनसे पूछें और कहें कि हम आपकी मदद करेंगे। बच्चा किसी भी तरह की समस्या को परिवार के लोगों को बता सके। साथ ही बच्चों को उनकी रुचि के जो कार्य करना चाहते हैं उनमें उनका सहयोग करें। हो सकता है कि वह अपना कॅरिअर अपनी रुचि से बनाना चाहते हो, लेकिन परिवार और टीचर के दबाव के चलते ऐसा नहीं कर पा रहे हों। इसलिए बच्चों पर दबाव न देकर उनके रुचिकर कार्य में उनका साथ दें।
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मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल देखने में आता है कि छोटे बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान न देकर टीवी देखने, मोबाइल पर गेम खेलने में व्यतीत करते हैं। इस वजह से वे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं। उसके बाद माता-पिता या अन्य अभिभावक उन्हें पढ़ाई के लिए टोकते हैं तो बच्चों में चिड़चिड़ापन आ जाता है। इसलिए इस मामले को गंभीरता से लेते हुए बच्चों की पढ़ाई और खेल में सामंजस्य बनाने का प्रयास करें।
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बच्चों के साथ खाना खाएं, खेलें और उन्हें उनकी रुचि के काम भी करने दें : डॉ. पूनम
जिला नागरिक अस्पताल में मनोराग विशेषज्ञ डॉ. पूनम दहिया बतातीं है कि छोटे बच्चों के साथ दिन में कम से कम एक बार आप खुद भी भोजन करें, ताकि बच्चे भी आपके साथ घुल मिल जाएं। बच्चा आपकी बातों को समझ पाए और उन्हें अपने जीवन में उतार पाए। इसलिए बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताएं चाहे खाना साथ में खाएं या उनके साथ कोई आउटडोर गेम खेलें। इससे बच्चे पढ़ाई का तनाव नहीं लेंगे और आपकी बातों को ध्यान से सुनेंगे और वे अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देंगे। इसके अलावा आउटडोर गेम खेलने से बच्चों में शारीरिक विकास तो होगा ही साथ ही उनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का विकास होगा। इसे वे अपनी पढ़ाई और खेल पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। इसके अलावा बच्चों को उनकी रुचि के कार्य भी करने दे जैसे डांस, पेंटिंग रचनात्मक कार्य, कविता लेखन कहानी लेखन आदि। डॉ. पूनम दहिया ने बताया कि उनके पास महीन में चार से पांच बच्चे ऐसे आते हैं जो अभिभावकों के समय न देने या अन्य किसी कारण से अवसाद के शिकार होते हैं।
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किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों को डांटें नहीं, प्यार से बात करें : डॉ. संदीप
गुजवि के मनोवैज्ञानिक डॉ. संदीप राणा ने बताया कि बड़े किशोरावस्था के बच्चों में सुसाइड के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन पर अभिभावक और आसपास के लोगों का पढ़ाई को लेकर दबाव रहता है। कई बार सफल न होने पर वे सुसाइड तक कर लेते हैं। इन बातों से बचने के लिए अभिभावक को चाहिए कि वे किशोरावस्था में पहुंच चुके अपने बच्चों से प्यार से बात करें। उन्हें किसी बात के लिए डांट फटकार न लगाएं। अगर बच्चों को किसी तरह की कोई समस्या है तो उनसे पूछें और कहें कि हम आपकी मदद करेंगे। बच्चा किसी भी तरह की समस्या को परिवार के लोगों को बता सके। साथ ही बच्चों को उनकी रुचि के जो कार्य करना चाहते हैं उनमें उनका सहयोग करें। हो सकता है कि वह अपना कॅरिअर अपनी रुचि से बनाना चाहते हो, लेकिन परिवार और टीचर के दबाव के चलते ऐसा नहीं कर पा रहे हों। इसलिए बच्चों पर दबाव न देकर उनके रुचिकर कार्य में उनका साथ दें।

डॉक्टर पूनम दहिया, मनोरोग विशेषज्ञ। संवाद- फोटो : Hisar