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सेल्फ मैनेजमेंट थैरेपी मिटाएगी टैंशन, बढ़ाएगी खुशी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 27 Dec 2021 11:24 PM IST
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Self management therapy will remove tension, increase happiness
हिसार। लोगों में कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। दिमाग में बेवजह चलने वाले विचार, स्वयं के बारे में बनने वाली अवधारणाएं आदि ऐसे कारण हैं, जो इंसान की खुशियों को कम कर रहें हैं। लेकिन अब टेंशन मिटेगी और खुशियों को बढ़ाया जा सकेगा। गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग द्वारा विकसित माइंडफूलनेस बेस्ड सेल्फ मैनेजमेंट थेरेपी का 40 शिक्षकों पर सफल प्रयोग हुआ है। 2 माह तक चले इंटरवेंशन प्रोग्राम के बाद स्कूल के इन 40 शिक्षकों की मनोदशा, अवधारणा, स्वयं को पहचाने की क्षमता और खुश रहने में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है। विभाग के मनोवैज्ञानिक प्रो. संदीप राणा और उनके निर्देशन में कार्य कर रही शोधार्थी प्रियंका इस थैरेपी पर काम कर रहे हैं। फिलहाल थैरेपी को पैटेंट करवाने की प्रक्रिया भी चल रही है।
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क्या है थेरेपी -
थेरेपी में मुख्य रूप से चार पहलुओं को शामिल किया गया है। जागरूकता एवं स्वीकृति, दूसरा विश्वास प्रबंधन, तीसरा व्यक्तिगत मजबूती, चौथा सकारात्मक भावनाएं। डॉ. राणा ने बताया कि कई बार हम शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं, लेकिन अपने तनाव और खुशियों को नहीं पहचान पाते, जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य का हिस्सा है। इससे हमारी खुशियां कम होती हैं। ऐसे में हम कार्यस्थल पर खुशियां बढ़ाने को लेकर काम कर रहे थे। हमने सबसे पहले शिक्षकों का खुश रहने का स्कोर असेसमेंट किया। इसके बाद उनकी काउंसिलिंग व वर्कशॉप की गई। जिसमें थेरेपी के विभिन्न पहलुओं के माध्यम से उनमें जागरूकता बढ़ाई गई।
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थेरेपी में इन पहलुओं को किया गया शामिल -
अवेयरनेस -
अपनी भावनाओं और विचारों के बारे में और वर्तमान के प्रति सजगता होना, साथ ही सहकर्मियों के बारे में कितने अवेयर है। इस बात का आंकलन किया गया।
धारणा -
व्यक्ति की धारणाओं के बारे में जाना गया। चाहे वो उसके अपने बारे में हो, सहकर्मियों को लेकर हों, कार्यस्थल को लेकर व जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में धारणाओं को बेहतर किया गया।
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पर्सनल स्ट्रेंथ -
थेरेपी के तीसरे चरण में व्यक्ति की व्यक्तिगत ताकत यानी उसकी काबिलियत को पहचान कर उसको कैसे बेहतर बनाया जाए, इसके बारे में बताया गया। व्यक्ति को सबसे ज्यादा खुशी तभी मिलती है, जब वह अपनी स्ट्रेंथ को पहचान कर उसे उपयोग में लाते हैं।
पॉजिटिव इमोशन-
थेरेपी के अंतिम चरण में कुछ सकारात्मक भावनाओं का विकास किया गया। जो जीवन में अच्छा हो उसकी पहचान व उसके लिए कृतज्ञता जताना। वो चाहे भगवान के प्रति हो, परिवार, दोस्तों या सहकर्मियों के प्रति कृतज्ञता हो।
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सकारात्मक संवाद से मिलती है खुशी -
शोध में सामने आया कि हमारा आत्मविश्वास व अपने आपसे संवाद जितना सकारात्मक होगा, उतना ही हमारी खुशी ज्यादा होगी। यह भी देखने में आया कि जब हम बीती हुई बातों को पकड़ कर नहीं रखते और माफ करने का भाव जिनमें होता है, जिन लोगों का अपने प्रति व जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण होता है। वह लोग कार्यस्थल पर ज्यादा खुश रहते हैं। सर्वे में 1 हफ्ते में 2 सेशन कराए गए थे, जो डेढ़ से 2 घंटे चलते थे।

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कोट -
दो माह पहले खुश रहने का स्कोर असेस्मेंट किया। 2 माह थेरेपी के बाद भी किया। तो खुश रहने के स्कोर में बेहतरी हुई। मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर हुआ। हम थेरेपी का पेटेंट करवा रहे हैं।
- प्रो. संदीप राणा, मनोवैज्ञानिक, मनोविज्ञान विभाग, गुजवि।
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