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अफसरों की नहीं टूट रही नींद, किसानों के डूबे सपने
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भिंडी की गलकर खराब खेती को दिखाता किसान रामकुमार का बेटा
- फोटो : Hisar
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सुरेंद्र दलाल
हिसार। किसानों के लिए गिरदावरी, मुआवजा, फसल बीमा योजना, खेतों से पानी निकलने के
दावे नगर निगम की सीमा से महज 2 किलोमीटर पर चंदन नगर गांव के खेतों में डूबे हुए हैं। इस पानी में किसानों के सपने भी डूब गए हैं। बारिश बंद होने के 27 दिन बाद भी यहां सैकड़ों एकड़ फसलों में पानी भरा हुआ है। हजारों रुपये प्रति एकड़ खर्च कर छह महीने में तैयार की नरमा, मूंग, सब्जियों की खेती पूरी तरह से तबाह हो चुकी है। महीने भर से पानी में खड़ेे पौधे गल चुके हैं। गंदा पानी अब बदबू फैला रहा है। जिसमें कई तरह के जहरीले जीव भी पैदा हो रहे हैं। पानी निकासी के लिए किसी ने अभी तक कोई प्रयास नहीं किया। धीरे-धीरे पानी सूखेगा तो ही खेत खाली हो पाएंगे। इस गांव में 80 प्रतिशत किसानों की फसल तबाह हो चुकी है। 2022 में किसानों की आय दोगुनी करने से महज दो महीने पहले इस गांव के किसानों को अपना घर चलाने के लिए रिश्तेदारों से उधार लेने पड़ेंगे। बच्चों की फीस भरने के लिए मजदूरी को मजबूर हो गए हैं। 60 प्रतिशत किसानों को अगली फसल की बिजाई की उम्मीद भी नहीं है। यह पूर्व सीएम चौधरी भजनलाल की कर्मस्थली आदमपुर विधानसभा क्षेत्र का आखिरी गांव है।
घर चलाने के लिए लेना पड़ेगा कर्ज
मैंने साढेे़ पांच एकड़ में नरमा लगाई थी। मेरा बेटा और मैं पूरे दिन नरमा में लगे रहते थे। इस बार बीमारियों का प्रकोप नहीं था। जिस कारण हमें अच्छी पैदावार होने की उम्मीद थी। नरमा की बिजाई, दवाई, निराई गुड़ाई पर 75 हजार खर्च कर चुके थे। केवल 8 मण यानी 320 किलो नरमा ही ले पाए थे। कुल 40 हजार की नरमा भी नहीं हुई। सितंबर महीने में 23 तारीख को हुई तेज बारिश से खेतों में दो फुट पानी भर गया। निकासी का कोई प्रबंध नहीं है। अब कोई उम्मीद नहीं बची है। अब भी आधा फीट पानी भरा हुआ है। अब तापमान में गिरावट आ रही है। जिस कारण अब जनवरी फरवरी तक पानी सूखने के आसार नहीं है। हमें तो गेहूं की फसल की उम्मीद नहीं। 40 साल से खेती कर रहा हूं मुझे तो आज तक किसी फसल का कोई मुआवजा हमें नहीं मिला। 2018 में भी हमारी गेेहूं की फसल पानी भरने के बाद गल गई थी। जिसका भी एक पैसा तक नहीं आया। हमारी फसलों का कोई बीमा नहीं था। घर चलाने के लिए रिश्तेदारों से कर्जा लेना पड़ेगा। खुद के खाने के लिए भी गेेहूं खरीद कर लाएंगे। बच्चों की फीस भरने के लिए मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं।
बहादुर सिंह, किसान, चंदन नगर
पहले पूरे गांव को खिलाते थे सब्जियां, अब खुद खरीदने को मजबूर
मैंने एक एकड़ में आधे में भिंडी और आधे में घीया की पछेती किस्त लगाई थी। जब भिंडी व घीया लगने का समय आया तो बारिश के पानी ने सब खत्म कर दिया। आधा एकड़ खाली जमीन दूसरी सब्जियों के लिए रखी थी। आज भी हमारे सारे खेतों में पानी भरा हुआ है। अगर यह फसल अच्छी होती और भाव सही मिल जाते तो एक लाख रुपये का मुनाफा होता। जिससे चार सदस्यों का पूरा परिवार चलाते। हम अनुसूचित जाति से संबंधित रखते हैं । इस जमीन के अलावा हमारे पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं है। सबसे अधिक जोखिम होने के बाद भी सब्जियों की खेती का बीमा नहीं होता। अब बेटा और मैं शहर में दिहाड़ी करेंगे। खेत का यह पानी तो दो महीने तक भी नहीं सूखेगा। अगली फसल की कोई उम्मीद नहीं है। पहले पूरे गांव को सब्जी खिलाते थे। अब खाने के लिए भी सब्जियां लाने को मजबूर हो गए हैं। किसानों की आय दोगुनी तो कहां आधी भी नहीं रह गई। सरकार की योजनाओं से हमें तो कोई फायदा आज तक नहीं मिला।
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साहब राम, किसान, चंदन नगर
25 हजार से लगाईं सब्जियां, सब डूबी
मैंने आधा एकड़ में भिंडी और आधा एकड़ में पालक की सब्जियां लगाई थी। जिसमें करीब 25 हजार रुपये खर्च कर चुके थे। सब्जियां अगले महीने से बाजार में पहुंचाने की तैयारी थी। इसी बीच सितंबर माह में बारिश के कारण पूरी फसल खराब हो गई। दो एकड़ में नरमा थी। उसमें भी गुलाबी सूंडी का प्रकोप हो गया। एक एकड़ में 40 हजार से अधिक खर्च आया था, अब खर्च भी पूरा नहीं हो पाया। अब पानी सूखेगा तो भी दिसंबर जनवरी में ही गेहूं की फसल लगा पाएंगे। उससे जितना पैसा आएगा उसी से घर चलाएंगे। हमारा तो पूरा परिवार इस खेती पर ही निर्भर हैं। अब गेहूं की बिजाई के समय खाद-बीज के लिए उधार लेना पड़ेगा। परिवार चलाने के लिए कुछ कर्ज की जरूरत पड़ेगी। किसी भी फसल का कोई बीमा नहीं था। गिरदावरी के बारे में हमें तो कोई जानकारी नहीं है।
- विवेक कुमार, किसान, चंदन नगर
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हिसार। किसानों के लिए गिरदावरी, मुआवजा, फसल बीमा योजना, खेतों से पानी निकलने के
दावे नगर निगम की सीमा से महज 2 किलोमीटर पर चंदन नगर गांव के खेतों में डूबे हुए हैं। इस पानी में किसानों के सपने भी डूब गए हैं। बारिश बंद होने के 27 दिन बाद भी यहां सैकड़ों एकड़ फसलों में पानी भरा हुआ है। हजारों रुपये प्रति एकड़ खर्च कर छह महीने में तैयार की नरमा, मूंग, सब्जियों की खेती पूरी तरह से तबाह हो चुकी है। महीने भर से पानी में खड़ेे पौधे गल चुके हैं। गंदा पानी अब बदबू फैला रहा है। जिसमें कई तरह के जहरीले जीव भी पैदा हो रहे हैं। पानी निकासी के लिए किसी ने अभी तक कोई प्रयास नहीं किया। धीरे-धीरे पानी सूखेगा तो ही खेत खाली हो पाएंगे। इस गांव में 80 प्रतिशत किसानों की फसल तबाह हो चुकी है। 2022 में किसानों की आय दोगुनी करने से महज दो महीने पहले इस गांव के किसानों को अपना घर चलाने के लिए रिश्तेदारों से उधार लेने पड़ेंगे। बच्चों की फीस भरने के लिए मजदूरी को मजबूर हो गए हैं। 60 प्रतिशत किसानों को अगली फसल की बिजाई की उम्मीद भी नहीं है। यह पूर्व सीएम चौधरी भजनलाल की कर्मस्थली आदमपुर विधानसभा क्षेत्र का आखिरी गांव है।
घर चलाने के लिए लेना पड़ेगा कर्ज
मैंने साढेे़ पांच एकड़ में नरमा लगाई थी। मेरा बेटा और मैं पूरे दिन नरमा में लगे रहते थे। इस बार बीमारियों का प्रकोप नहीं था। जिस कारण हमें अच्छी पैदावार होने की उम्मीद थी। नरमा की बिजाई, दवाई, निराई गुड़ाई पर 75 हजार खर्च कर चुके थे। केवल 8 मण यानी 320 किलो नरमा ही ले पाए थे। कुल 40 हजार की नरमा भी नहीं हुई। सितंबर महीने में 23 तारीख को हुई तेज बारिश से खेतों में दो फुट पानी भर गया। निकासी का कोई प्रबंध नहीं है। अब कोई उम्मीद नहीं बची है। अब भी आधा फीट पानी भरा हुआ है। अब तापमान में गिरावट आ रही है। जिस कारण अब जनवरी फरवरी तक पानी सूखने के आसार नहीं है। हमें तो गेहूं की फसल की उम्मीद नहीं। 40 साल से खेती कर रहा हूं मुझे तो आज तक किसी फसल का कोई मुआवजा हमें नहीं मिला। 2018 में भी हमारी गेेहूं की फसल पानी भरने के बाद गल गई थी। जिसका भी एक पैसा तक नहीं आया। हमारी फसलों का कोई बीमा नहीं था। घर चलाने के लिए रिश्तेदारों से कर्जा लेना पड़ेगा। खुद के खाने के लिए भी गेेहूं खरीद कर लाएंगे। बच्चों की फीस भरने के लिए मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं।
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बहादुर सिंह, किसान, चंदन नगर
पहले पूरे गांव को खिलाते थे सब्जियां, अब खुद खरीदने को मजबूर
मैंने एक एकड़ में आधे में भिंडी और आधे में घीया की पछेती किस्त लगाई थी। जब भिंडी व घीया लगने का समय आया तो बारिश के पानी ने सब खत्म कर दिया। आधा एकड़ खाली जमीन दूसरी सब्जियों के लिए रखी थी। आज भी हमारे सारे खेतों में पानी भरा हुआ है। अगर यह फसल अच्छी होती और भाव सही मिल जाते तो एक लाख रुपये का मुनाफा होता। जिससे चार सदस्यों का पूरा परिवार चलाते। हम अनुसूचित जाति से संबंधित रखते हैं । इस जमीन के अलावा हमारे पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं है। सबसे अधिक जोखिम होने के बाद भी सब्जियों की खेती का बीमा नहीं होता। अब बेटा और मैं शहर में दिहाड़ी करेंगे। खेत का यह पानी तो दो महीने तक भी नहीं सूखेगा। अगली फसल की कोई उम्मीद नहीं है। पहले पूरे गांव को सब्जी खिलाते थे। अब खाने के लिए भी सब्जियां लाने को मजबूर हो गए हैं। किसानों की आय दोगुनी तो कहां आधी भी नहीं रह गई। सरकार की योजनाओं से हमें तो कोई फायदा आज तक नहीं मिला।
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साहब राम, किसान, चंदन नगर
25 हजार से लगाईं सब्जियां, सब डूबी
मैंने आधा एकड़ में भिंडी और आधा एकड़ में पालक की सब्जियां लगाई थी। जिसमें करीब 25 हजार रुपये खर्च कर चुके थे। सब्जियां अगले महीने से बाजार में पहुंचाने की तैयारी थी। इसी बीच सितंबर माह में बारिश के कारण पूरी फसल खराब हो गई। दो एकड़ में नरमा थी। उसमें भी गुलाबी सूंडी का प्रकोप हो गया। एक एकड़ में 40 हजार से अधिक खर्च आया था, अब खर्च भी पूरा नहीं हो पाया। अब पानी सूखेगा तो भी दिसंबर जनवरी में ही गेहूं की फसल लगा पाएंगे। उससे जितना पैसा आएगा उसी से घर चलाएंगे। हमारा तो पूरा परिवार इस खेती पर ही निर्भर हैं। अब गेहूं की बिजाई के समय खाद-बीज के लिए उधार लेना पड़ेगा। परिवार चलाने के लिए कुछ कर्ज की जरूरत पड़ेगी। किसी भी फसल का कोई बीमा नहीं था। गिरदावरी के बारे में हमें तो कोई जानकारी नहीं है।
- विवेक कुमार, किसान, चंदन नगर

नरमा में भरे पानी को दिखाता किसान साहब राम का बेटा कौर सिंह- फोटो : Hisar