मैं हांसी हूं! मुझे लौटा दो, मेरा गौरव...
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कोई रंग भेद नहीं, कोई नस्लभेद नहीं और मैंने तो कभी दिलों में भी भेद नहीं किया। मैं तो सदा से अपने गौरव, शान और खूबसूरत अतीत के लिए जाना जाता हूं। ये ठीक है कि पृथ्वी राज चौहान मेरे आखिरी शासक थे, लेकिन मैंने हमेशा से ही पश्चिम से आने वाले आक्रमणकारियों को रोका है।
मैं तमाम मजहबों की इबादत के लिए भी जाना जाता हूं। यहीं नहीं मेरे यहां के सफेद दानेदार पेड़ों का तो पूरा देश कायल है। वो भी समय था जब मैंने मोहम्मद गौरी और महमूद गजनवी के आक्रमणों को भी विफल किया।
मेरे ऐतिहासिक स्मारक एकता की गवाही देते है तो यहां गलियों में बिखरे पड़े शिलाखंड और शिलालेख बर्बादी का वक्त भी बयां करते हैं। मैं देश की आजादी के संग्राम का भी गवाह हूं। यहां के लोगों में जब भी आपसी फूट पड़ी, मैंने तब-तब तबाही के मंजर सहे हैं। मैं तरक्की के रास्ते पर जाना चाहता था, लेकिन मुझे न जाने किस की बुरी नजर लग गई।
जाट आरक्षण आंदोलन की आड़ में 21-22 फरवरी को मैं जल उठा। मैंने सीने को चीरने वाली वो कराह सुनी है। मेरा रंगीन चेहरा अब स्याह काला पड़ चुका है। हमेशा आपसी भाईचारे का संदेश देते-देते मैं खुद ही अपने भाइयों को भूल गया। मैंने शिक्षा की अलख जगाने वाले स्कूलों को नहीं भी बख्शा।
मेरे घर जलकर राख हो गए। चेहरा अपने ही चेहरे को पहचानना भूल गया। एक ही चमकती थाली में खाने वाले क्यों भाईचारा भूल गए। आगजनी के खौफनाक मंजर के बाद अब न वो थाली है और न ही उसकी चमक। दो ही रातों में वे अब वे पराए हो गए। हमराहियों के रास्ते जुदा हो गए। मेरे बच्चों के आंसू पिघले हुए लावे की तरह मेरी छाती पर गिर रहे हैं। भाईजी ढाबा की रौनक धुएं की कालिख में गुम हो गई है। ढाणियों में आग के बाद विरानी है।
रात को लोग अब यहां रुकने की स्थिति में नहीं है। मुझे समझ नहीं आ रहा मेरे रक्षक वो साहस क्यों नहीं जुटा पाए। मेरी सेना की शौर्य गाथा पूरे विश्व में जानी जाती है। यहां अपने भाइयों पर जुल्म ढहा रहे उपद्रवियों पर मेरी सेना बेबस नजर क्यों आई। कोई मुझे मरा अतीत लौटा दो। मेरे बच्चों को खुली हवा में सांस लेने की पाबंदी हटा लो। मुझे लौटा दो मेरा वैभव, मेरा गौरव...
...ये मेरे शहर की बातें हैं। लोग चाहते हैं कि शहर से उस कालिख को धोया जाए जिसके कारण खूबसूरती पर धब्बा लग गया है। हांसी को करीब से जानने वाले लोगों से भी हमने बात की जिन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा इस शहर के नाम किया है...
मकान बनाने में वक्त लगता है गिराने में नहीं
इस हिंसा ने ऐसे घाव दिए है जो आने वाले लंबे वक्त तक नहीं भरेंगे। 1947 के घाव तो अभी तक नहीं भरे थे कि एक नया घाव हो गया। इस देश को खतरा विदेश से नहीं यहां के तुच्छ स्वार्थी नेताओं से है। ये विवेकहीन राजनीति करने वाले नेताओं को पता होना चाहिए मकान बनने में काफी समय लगता है, लेकिन गिरने में वक्त नहीं लगता। मकान बनने का ताना बाना गठित होने में बड़ा वक्त लगता है।
- जगदीश सैनी, इतिहासकार।
ये जान माल का नहीं, इंसानियत का नुकसान है
हम सारे इंसान है। कर्म और धर्म यह नहीं सिखाता है कि इंसान दूसरे इंसान का खून बहाए। शांति, प्रेम व भाईचारा सबसे बड़ा हथियार होता है। धर्म की आड़ में कुछ लोगों ने जो भी किया है गलत किया है। ये घाव बड़ी मुश्किल से भरेगा। किसी का भी नुकसान हुआ है वो नाजायज है। ये जान माल के अलावा इंसानियत का भी नुकसान है। मेहनत की कमाई हुई पूंजी स्वार्थी तत्वों के कारण स्वाह हो गई। सभी को मिल जुल कर रहना होगा और भाईचारे को फिर से जीवित करना होगा।
- सतीश कालडा, प्रधान मानव जागृति मंच।
वो भी कम्बख्त तेरा चाहने वाला निकला
1947 में पाकिस्तान से आए थे। अब फिर ऐसा ही लग रहा है। इस हिंसा ने हमें पाकिस्तान की याद दिला दी है। सरकार की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है तो कि वो कैसा काम करें। जो हुआ है वो बेहद गलत हुआ है। अब सरकार अगर बेहतर एक्शन लेती है तो लोगों का दर्द कुछ कम हो सकता है और अगर ढुलमुल रवैया रहा तो जनता के दिल से सरकार का भरोसा उठ जाएगा। शायर ने लिखा है, करते रहे हम काजी से फरिया, वो भी कम्बख्त तेरा चाहने वाला निकला।
- ज्ञानचंद सेठी, सीनियार सिटीजन।
वोटों की सियासत से आई भाईचारे पर चोट
जातीय हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा लगता है कि वोटों की सियासत से भाईचारे पर चोट की गई है। राजनीतिक लोगों की गलती से यह हुआ है। हरियाणा के हांसी में सबसे ज्यादा प्रेम हांसी में था। पता नहीं चला माहौल कहां से और क्यों खराब हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज में जहर फैला है।
किसी के बहकावे में ये सब हुआ है। हम लोगों को समझा रहे है। लोगों को भी समझना होगा कि हम सभी एक दूसरे पर निर्भर है। किसान मजदूर पर निर्भर करता है। व्यापारी जमींदार पर निर्भर है। किसी के साथ दुश्मनी नहीं थी, लेकिन फिर भी हिंसा हुई है। दस नूंह की कमाई की जानी चाहिए। वोटों की सियासत से माहौल बिगाड़ना अच्छा नहीं है।
- रघुबीर कामिलारमण सिसाय, पूर्व वाईस चेयरमैन शूगर मिल जींद।
भूलने में ही फायदा है
जो हुआ उसे भूल जाना चाहिए। जो हुआ बेहद गलत हुआ है। कुरेदने से कोई लाभ नहीं है, इससे केवल घाव ही बढ़ेंगे। हिंसा करने वालों का कोई धर्म नहीं है। दोनों समाज ने ही अच्छा नहीं किया है। कुछ सिरफिरे लोगों की बात है। उन्हीं से चूक हुई है। समझदारी से काम लेना चाहिए।
-अमीलाल चंदेला, रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर, एग्रीकल्चर।