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Hisar News: एचएयू को मधुमक्खी मल्टीपरपज डिस्पेंसर के लिए मिला पेटेंट, कुलपति ने दी बधाई

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 05 Jan 2026 12:40 AM IST
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HAU received a patent for the bee multipurpose dispenser, Vice-Chancellor congratulated
हिसार में एचएयू के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज वैज्ञानिक के साथ
हिसार। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के वैज्ञानिक प्रो. ओपी चौधरी द्वारा विकसित ‘मधुमक्खी बक्से के लिए मल्टीपरपज डिस्पेंसर’ को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से डिजाइन पेटेंट संख्या 320896-00 प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने प्रो. ओपी चौधरी को बधाई दी और इसे मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में एक नवाचारी और उपयोगी खोज बताया।
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प्रो. कांबोज ने बताया कि यह मल्टीपरपज डिस्पेंसर विशेष रूप से उन कीटों और बीमारियों की रोकथाम के लिए विकसित किया गया है, जो मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस डिस्पेंसर के माध्यम से ठोस, द्रव, पाउडर, जैल आदि सभी प्रकार के कीटनाशक और माइटनाशक रसायन का सुरक्षित उपयोग किया जा सकता है। यह यंत्र वरोआ माइट, पैरासिटिक माइट सिंड्रोम, अकरैपिस माइट, यूरोपियन फाउल ब्रूड और मोमी पतंगा जैसी समस्याओं के नियंत्रण में प्रभावी सिद्ध होता है।
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इस डिस्पेंसर की खासियत यह है कि इसे मधुमक्खी बक्से में कहीं भी आसानी से लगाया जा सकता है। इसके प्रयोग से मधुमक्खियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और शहद, पराग, रॉयल जैली आदि उत्पादों में रसायनों के अवशेषों से बचाव होता है। इसके कारण, भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने इसे डिजाइन पेटेंट प्रदान किया है।
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प्रो. ओपी चौधरी ने बताया कि इस डिस्पेंसर का उपयोग एपिस मेलीफेरा और एपिस सेरेन जैसी दोनों प्रमुख मधुमक्खी प्रजातियों में किया जा सकता है। यह रसायनों से मधुमक्खियों को बचाते हुए उनके शत्रुओं का प्रभावी नियंत्रण करता है। इसका प्रयोग सभी मौसमों में किया जा सकता है, जिससे मधुमक्खी पालकों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है और श्रम की भी बचत होती है।

प्रो. चौधरी ने बताया कि मधुमक्खियां परागण के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में हर साल लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये का योगदान करती हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 से वरोआ माइट के कारण देश में 50 से 70 प्रतिशत तक मधुमक्खी कॉलोनियां प्रभावित हुई हैं, लेकिन उनके द्वारा विकसित समन्वित वरोआ प्रबंधन विधि से इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया गया है। इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. पवन कुमार, अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग, कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एसके पाहुजा और मानव संसाधन प्रबंधन निदेशक डॉ. रमेश कुमार माैजूद रहे।
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