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20 लाख कीमत की सीबी नॉट जांच मशीन 800 रुपये की कार्टिरिज के अभाव में तीन माह से बंद
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कुलदीप जांगड़ा
हिसार। जिला टीबी अस्पताल में रखी 20 लाख रुपये कीमत की सीबी नॉट जांच मशीन (कार्टिरिज बेस्ड, न्यूक्लिक ऐसिट, एम्पलिफिकेशन टेस्ट) दो महीने से 800 रुपये की काटरेज के अभाव में बंद पड़ी है। वहीं, टीबी अस्पताल में दो माह पहले आई 57 लाख रुपये की कीमत की अत्याधुनिक तकनीक की नई एलपीए (लाइन प्रॉब एस्से) मशीन इंस्टॉल के अभाव में डिब्बे में बंद पड़ी है। इसका खामियाजा टीबी के मरीजों को सीबी नॉट टेस्ट की जांच के लिए निजी अस्पतालों में 2500 रुपये चुकाकर भुगतना पड़ रहा है।
रोजाना 15 से 20 मरीज पता करने के लिए टीबी अस्पताल में आते हैं। उनको स्टाफ से एक ही जवाब मिलता है कि अभी सामान नहीं आया है। अगर जिले में टीबी मरीजों की स्थिति की बात करे तो इस साल 2021 में 3500 के आसपास टीबी के मरीज मिले हैं। वहीं, पिछले साल 5861 टीबी ग्रस्त मरीज मिले थे। इनमें से अधिकतर मरीजों का इलाज चल रहा है। इन मरीजों को अपनी जांच निजी अस्पतालों में करवानी पड़ती है। संवाददाता ने ग्राउंड रिपोर्ट कर यह हकीकत जानी। इसके बदले अब अस्पताल में नारनौंद से ट्रू नॉट की मशीन मंगवाई गई है, लेकिन उसकी रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं है। (संवाद)
कंफर्म करने के लिए सीबी नॉट टेस्ट जरूरी
चिकित्सकों के अनुसार संदिग्ध मरीज का पहले शुरुआती टेस्ट किया जाता है। उसमें टीबी के होने का संदेह होता है तो उसे कंफर्म करने के लिए सीबी नॉट मशीन से टेस्ट जरूरी है। उसके बाद ही मरीज को टीबी घोषित किया जा सकता है। यह टेस्ट 6 माह बाद करवाना जरूरी है। यदि किसी मरीज को दवा काम नहीं कर रही तो दोबारा टेस्ट करना पड़ता है।
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हर सैंपल पर एक काटरेज की लागत और कीमत 800 रुपये
जब मशीन ठीक होती थी तो हर रोज सुबह-शाम दोनों शिफ्टों में स्टाफ करीब 20 सैंपल टेस्ट किए जाते थे। एक बार में चार सैंपल टेस्ट के लिए लगते थे। हर सैंपल के लिए एक काटेरेज की जरूरत होती है। इस हिसाब से 20 सैंपल पर 20 काटरेज लागत है। इसकी कीमत 800 से 900 रुपये बताई जा रही है। उस समय सैंपल टेस्टिंग का दबाव 60 से 70 होता था और मरीजों को दो दिन बाद रिपोर्ट मिलती थी। कई बार स्टाफ मरीजों को एक सप्ताह तक का वेटिंग समय देते थे।
चंडीगढ़ में हुई बैठक में उठाया था मुद्दा
सीबी नॉट मशीन का काटरेज एवं सभी सामान सरकार की ओर से ही आता है। जिला क्षय रोग अधिकारी ने लिखित में पत्र एवं व्हाट्सअप से सूचना दी है। 2 जुलाई को हुई चंडीगढ़ बैठक में उच्च अधिकारियों के सामने भी काटरेज एवं ओएसटी सेंटर में दवा उपलब्ध करवाने का मुद्दा उठाया था। मगर अधिकारी कोई सुध नहीं ले रहे। काटरेज एवं ओएसटी सेंटर में दवा की कमी हिसार ही नहीं प्रदेशभर में बनी हुई है।
एलपीए से होता है हाई लेवल का टेस्ट
जिस मरीज को टीबी निकल आता है तो उसका एलपीए मशीन से हाई लेवल का टेस्ट किया जाता है। इससे पता चलता है कि मरीज में कौन सी टीबी है और इसे कौन सी दवा देनी है, जिससे ठीक हो। वह क्यों नहीं ठीक हो रहा और कब तक इलाज चलेगा।
हमारी ओर से उच्च अधिकारियों को लिखित में भी पत्र भेजा गया है। व्हाट्सअप पर भी कई बार अवगत करवाया है। मई माह से काटरेज नहीं आ रही है। हमने नारनौंद से ट्रू नॉट मशीन मंगवाई है। यह समस्या काफी जगह बनी है। मैंने चंडीगढ़ बैठक में भी अधिकारियों के सामने यह मुद्दा रखा था। नई मशीन को इंस्टॉल करवाने के लिए इंजीनियर बुलाया जाएगा। - डॉ. कुलदीप डाबला, कार्यकारी डिप्टी सीएमओ, जिला क्षय रोग अधिकारी
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हिसार। जिला टीबी अस्पताल में रखी 20 लाख रुपये कीमत की सीबी नॉट जांच मशीन (कार्टिरिज बेस्ड, न्यूक्लिक ऐसिट, एम्पलिफिकेशन टेस्ट) दो महीने से 800 रुपये की काटरेज के अभाव में बंद पड़ी है। वहीं, टीबी अस्पताल में दो माह पहले आई 57 लाख रुपये की कीमत की अत्याधुनिक तकनीक की नई एलपीए (लाइन प्रॉब एस्से) मशीन इंस्टॉल के अभाव में डिब्बे में बंद पड़ी है। इसका खामियाजा टीबी के मरीजों को सीबी नॉट टेस्ट की जांच के लिए निजी अस्पतालों में 2500 रुपये चुकाकर भुगतना पड़ रहा है।
रोजाना 15 से 20 मरीज पता करने के लिए टीबी अस्पताल में आते हैं। उनको स्टाफ से एक ही जवाब मिलता है कि अभी सामान नहीं आया है। अगर जिले में टीबी मरीजों की स्थिति की बात करे तो इस साल 2021 में 3500 के आसपास टीबी के मरीज मिले हैं। वहीं, पिछले साल 5861 टीबी ग्रस्त मरीज मिले थे। इनमें से अधिकतर मरीजों का इलाज चल रहा है। इन मरीजों को अपनी जांच निजी अस्पतालों में करवानी पड़ती है। संवाददाता ने ग्राउंड रिपोर्ट कर यह हकीकत जानी। इसके बदले अब अस्पताल में नारनौंद से ट्रू नॉट की मशीन मंगवाई गई है, लेकिन उसकी रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं है। (संवाद)
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कंफर्म करने के लिए सीबी नॉट टेस्ट जरूरी
चिकित्सकों के अनुसार संदिग्ध मरीज का पहले शुरुआती टेस्ट किया जाता है। उसमें टीबी के होने का संदेह होता है तो उसे कंफर्म करने के लिए सीबी नॉट मशीन से टेस्ट जरूरी है। उसके बाद ही मरीज को टीबी घोषित किया जा सकता है। यह टेस्ट 6 माह बाद करवाना जरूरी है। यदि किसी मरीज को दवा काम नहीं कर रही तो दोबारा टेस्ट करना पड़ता है।
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हर सैंपल पर एक काटरेज की लागत और कीमत 800 रुपये
जब मशीन ठीक होती थी तो हर रोज सुबह-शाम दोनों शिफ्टों में स्टाफ करीब 20 सैंपल टेस्ट किए जाते थे। एक बार में चार सैंपल टेस्ट के लिए लगते थे। हर सैंपल के लिए एक काटेरेज की जरूरत होती है। इस हिसाब से 20 सैंपल पर 20 काटरेज लागत है। इसकी कीमत 800 से 900 रुपये बताई जा रही है। उस समय सैंपल टेस्टिंग का दबाव 60 से 70 होता था और मरीजों को दो दिन बाद रिपोर्ट मिलती थी। कई बार स्टाफ मरीजों को एक सप्ताह तक का वेटिंग समय देते थे।
चंडीगढ़ में हुई बैठक में उठाया था मुद्दा
सीबी नॉट मशीन का काटरेज एवं सभी सामान सरकार की ओर से ही आता है। जिला क्षय रोग अधिकारी ने लिखित में पत्र एवं व्हाट्सअप से सूचना दी है। 2 जुलाई को हुई चंडीगढ़ बैठक में उच्च अधिकारियों के सामने भी काटरेज एवं ओएसटी सेंटर में दवा उपलब्ध करवाने का मुद्दा उठाया था। मगर अधिकारी कोई सुध नहीं ले रहे। काटरेज एवं ओएसटी सेंटर में दवा की कमी हिसार ही नहीं प्रदेशभर में बनी हुई है।
एलपीए से होता है हाई लेवल का टेस्ट
जिस मरीज को टीबी निकल आता है तो उसका एलपीए मशीन से हाई लेवल का टेस्ट किया जाता है। इससे पता चलता है कि मरीज में कौन सी टीबी है और इसे कौन सी दवा देनी है, जिससे ठीक हो। वह क्यों नहीं ठीक हो रहा और कब तक इलाज चलेगा।
हमारी ओर से उच्च अधिकारियों को लिखित में भी पत्र भेजा गया है। व्हाट्सअप पर भी कई बार अवगत करवाया है। मई माह से काटरेज नहीं आ रही है। हमने नारनौंद से ट्रू नॉट मशीन मंगवाई है। यह समस्या काफी जगह बनी है। मैंने चंडीगढ़ बैठक में भी अधिकारियों के सामने यह मुद्दा रखा था। नई मशीन को इंस्टॉल करवाने के लिए इंजीनियर बुलाया जाएगा। - डॉ. कुलदीप डाबला, कार्यकारी डिप्टी सीएमओ, जिला क्षय रोग अधिकारी