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21 साल की उम्र में 11 पाकिस्तानियों को मौत के घाट उतार शहीद हुए थे पवित्र
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जय कुमार
नारनौंद। भारत ने 26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। कारगिल युद्ध में भारत की जीत के बाद से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों के सम्मान के लिए मनाया जाता है। आज सोमवार को कारगिल विजय दिवस की 22वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, लेकिन धरातल पर शहीदों को सम्मान नहीं मिल रहा है। मेरा बेटा पवित्र 29 फरवरी 1996 को 8 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान 9 जुलाई 1999 में 11 दुश्मनों को मौत के घाट उताकर वह देश के लिए शहीद हो गया। शहीद की याद में गांव में उसकी प्रतिमा लगवाकर शहीद स्मारक बनाया गया। अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को किसी ने खंडित कर दिया। आज तक प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया। इसके अलावा प्रशासन ने भी क्षतिग्रस्त प्रतिमा को ठीक कराने की जहमत तक नहीं उठाई। आखिर में परिवार ने ही प्रतिमा को दुरुस्त कराया। सरकार उनके शहीद बेटे के नाम पर स्कूल का नाम रखे। सरकार शहीदों का सम्मान करने में ढीला रवैया अपना रही है। इससे अन्य सैनिकों का भी मनोबल गिरेगा। सरकार को सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।
- सुजानी देवी, शहीद की मां
पवित्र का जन्म और शहादत की तारीख 9 ही
शहीद पवित्र का जन्म गांव खेड़ी रोज में 9 अगस्त 1978 को एक फौजी के घर में हुआ था। दसवीं कक्षा गांव के सरकारी स्कूल से पास कर 11वीं की पढ़ाई के दौरान ही 29 फरवरी 1996 को 8 जाट रेजिमेंट में आर्मी में भर्ती हो गए। 9 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में लोहा लेते हुए 11 दुश्मनों को मौत के घाट उतार कर देश के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए। बड़े इत्तफाक की बात है कि शहीद पवित्र की जन्म व शहादत की तारीख 9 ही है।
अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को किया था खंडित
शहीद पवित्र के भाई सवित्र श्योराण ने बताया कि परिवार द्वारा शहीद पवित्र कुमार के स्मारक का निर्माण गांव में कराया गया था। किसी शरारती तत्व ने 28 अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को खंडित कर दिया था। तीन साल बीत जाने के बाद भी शहीद की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को पकड़ा नहीं जा सका। प्रशासन ने प्रतिमा को ठीक तक नहीं कराया तो दो साल बाद उन्होंने खुद उसे दुरुस्त कराया।
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दो पंचायतों के कारण शहीद के नामकरण में आई दिक्कत
शहीद पवित्र श्योराण की अंतिम यात्रा में शामिल इनेलो सरकार में तत्कालीन मंत्री अत्तर सिंह सैनी ने गांव के सरकारी स्कूल का नाम पवित्र श्योराण के नाम पर रखे जाने की घोषणा की थी। इसके बाद प्रशासन ने स्कूल मुख्याध्यापक को पंचायत का प्रस्ताव करवाने के लिए लिखा। मगर पंचायत ने यह कहते हुए प्रस्ताव पास करने से इनकार कर दिया कि शहीद दूसरी पंचायत में आता है जबकि मिल्कपुर गांव का यह स्कूल दोनों पंचायतों का साझा है। शहीद के ताऊ महासिंह श्योराण के मुताबिक पवित्र श्योराण ने इसी सरकारी स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की थी, इसलिए मिल्कपुर गांव के सरकारी स्कूल का नाम शहीद पवित्र श्योराण के नाम पर किया जाए और तत्कालीन सरकार की घोषणा को अमलीजामा पहनाया जाए। वहीं शहीद के स्मारक स्थल पर युवाओं के मार्गदर्शन के लिए एक लाइब्रेरी भी बनाई जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां शहीदों के बारे में जान सकें।
गांव में मूलभूत सुविधाओं की कमी
शहीद पवित्र के गांव खेड़ी रोज (मिल्कपुर) से नारनौंद उपमंडल पर आने वाली सड़क की हालत बहुत खस्ता है। गांव में पीने के पानी की स्थिति बहुत ही खराब है। लोग पीने का पानी दूर दराज खेतों से ही लेकर काम चला रहे हैं। वहीं गांव से गंदे पानी की निकासी के भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। (संवाद)
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नारनौंद। भारत ने 26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। कारगिल युद्ध में भारत की जीत के बाद से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों के सम्मान के लिए मनाया जाता है। आज सोमवार को कारगिल विजय दिवस की 22वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, लेकिन धरातल पर शहीदों को सम्मान नहीं मिल रहा है। मेरा बेटा पवित्र 29 फरवरी 1996 को 8 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान 9 जुलाई 1999 में 11 दुश्मनों को मौत के घाट उताकर वह देश के लिए शहीद हो गया। शहीद की याद में गांव में उसकी प्रतिमा लगवाकर शहीद स्मारक बनाया गया। अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को किसी ने खंडित कर दिया। आज तक प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया। इसके अलावा प्रशासन ने भी क्षतिग्रस्त प्रतिमा को ठीक कराने की जहमत तक नहीं उठाई। आखिर में परिवार ने ही प्रतिमा को दुरुस्त कराया। सरकार उनके शहीद बेटे के नाम पर स्कूल का नाम रखे। सरकार शहीदों का सम्मान करने में ढीला रवैया अपना रही है। इससे अन्य सैनिकों का भी मनोबल गिरेगा। सरकार को सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।
- सुजानी देवी, शहीद की मां
पवित्र का जन्म और शहादत की तारीख 9 ही
शहीद पवित्र का जन्म गांव खेड़ी रोज में 9 अगस्त 1978 को एक फौजी के घर में हुआ था। दसवीं कक्षा गांव के सरकारी स्कूल से पास कर 11वीं की पढ़ाई के दौरान ही 29 फरवरी 1996 को 8 जाट रेजिमेंट में आर्मी में भर्ती हो गए। 9 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में लोहा लेते हुए 11 दुश्मनों को मौत के घाट उतार कर देश के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए। बड़े इत्तफाक की बात है कि शहीद पवित्र की जन्म व शहादत की तारीख 9 ही है।
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अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को किया था खंडित
शहीद पवित्र के भाई सवित्र श्योराण ने बताया कि परिवार द्वारा शहीद पवित्र कुमार के स्मारक का निर्माण गांव में कराया गया था। किसी शरारती तत्व ने 28 अप्रैल 2018 को शहीद की प्रतिमा को खंडित कर दिया था। तीन साल बीत जाने के बाद भी शहीद की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को पकड़ा नहीं जा सका। प्रशासन ने प्रतिमा को ठीक तक नहीं कराया तो दो साल बाद उन्होंने खुद उसे दुरुस्त कराया।
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दो पंचायतों के कारण शहीद के नामकरण में आई दिक्कत
शहीद पवित्र श्योराण की अंतिम यात्रा में शामिल इनेलो सरकार में तत्कालीन मंत्री अत्तर सिंह सैनी ने गांव के सरकारी स्कूल का नाम पवित्र श्योराण के नाम पर रखे जाने की घोषणा की थी। इसके बाद प्रशासन ने स्कूल मुख्याध्यापक को पंचायत का प्रस्ताव करवाने के लिए लिखा। मगर पंचायत ने यह कहते हुए प्रस्ताव पास करने से इनकार कर दिया कि शहीद दूसरी पंचायत में आता है जबकि मिल्कपुर गांव का यह स्कूल दोनों पंचायतों का साझा है। शहीद के ताऊ महासिंह श्योराण के मुताबिक पवित्र श्योराण ने इसी सरकारी स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की थी, इसलिए मिल्कपुर गांव के सरकारी स्कूल का नाम शहीद पवित्र श्योराण के नाम पर किया जाए और तत्कालीन सरकार की घोषणा को अमलीजामा पहनाया जाए। वहीं शहीद के स्मारक स्थल पर युवाओं के मार्गदर्शन के लिए एक लाइब्रेरी भी बनाई जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां शहीदों के बारे में जान सकें।
गांव में मूलभूत सुविधाओं की कमी
शहीद पवित्र के गांव खेड़ी रोज (मिल्कपुर) से नारनौंद उपमंडल पर आने वाली सड़क की हालत बहुत खस्ता है। गांव में पीने के पानी की स्थिति बहुत ही खराब है। लोग पीने का पानी दूर दराज खेतों से ही लेकर काम चला रहे हैं। वहीं गांव से गंदे पानी की निकासी के भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। (संवाद)