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Hisar News: पांच हजार साल पहले भी विकसित थी तकनीक, खेती और जल प्रबंधन की समझ

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 13 Oct 2026 11:41 PM IST
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An understanding of technology, agriculture, and water management existed even five thousand years ago.
राखीगढ़ी महोत्सव में मॉक एक्सकवेशन करते डॉक्टर अप्पू सहारण।
नारनौंद। आज सुनियोजित सड़कें, जल निकासी, माप-तौल के मानक और आधुनिक तकनीक विकास के आधार माने जाते हैं लेकिन राखीगढ़ी की धरती पर करीब पांच हजार साल पहले विकसित सरस्वती-सिंधु सभ्यता में भी इनसे जुड़ी उन्नत समझ के प्रमाण मिलते हैं।
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यहां की खुदाई में मिले पुरातात्विक अवशेष बताते हैं कि उस समय के लोग घर बनाने और खेती करने के साथ लेखन, वजन मापन, परिवहन, जल प्रबंधन और व्यवस्थित जीवनशैली से भी परिचित थे। अब इस विरासत को आधुनिक तकनीक के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जाएगा।
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राखीगढ़ी में 19 से 25 अक्तूबर तक आयोजित होने वाले सात दिवसीय महोत्सव में पर्यटक पुरातात्विक अवशेषों और उनकी प्रतिकृतियों के साथ डिजिटल प्रदर्शनी के माध्यम से प्राचीन सभ्यता के विभिन्न पहलुओं को समझ सकेंगे। इसमें पहिया, बैलगाड़ी, लेखन कला, वजन मापन, सिलबट्टा, कृषि, जल प्रबंधन और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़े विषय प्रदर्शित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को उस दौर की वैज्ञानिक समझ, तकनीकी दक्षता और सामाजिक व्यवस्था से परिचित कराना है।
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खेती से लेकर माप-तौल तक, व्यवस्थित जीवन के प्रमाण
राखीगढ़ी की खुदाई में मिले लेखन से जुड़े चिह्न, मानकीकृत बाट और घरेलू वस्तुएं तत्कालीन समाज की विकसित व्यवस्था की जानकारी देते हैं। बाट इस बात के संकेत हैं कि वस्तुओं के लेन-देन और आर्थिक गतिविधियों में माप-तौल का महत्व था। सिलबट्टे जैसी वस्तुओं से घरेलू जीवन और भोजन तैयार करने की परंपराओं का पता चलता है। कृषि और पशुपालन उस समय लोगों की आजीविका के प्रमुख साधन थे। गेहूं और जौ जैसे अनाजों के पुरातात्विक प्रमाण तत्कालीन कृषि व्यवस्था की जानकारी देते हैं। वहीं, पहिए और बैलगाड़ी से जुड़े साक्ष्य परिवहन तथा आर्थिक गतिविधियों को समझने में मदद करते हैं। इन साक्ष्यों से पता चलता है कि उस समय का जीवन केवल बस्तियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उत्पादन, वस्तुओं के आदान-प्रदान और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप व्यवस्थाएं भी विकसित थीं।
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जल प्रबंधन में भी दिखाई देती थी दूरदर्शिता
किसी भी बस्ती के विकास में पानी की उपलब्धता और उसका प्रबंधन अहम होता है। सरस्वती-सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों पर मिले जल निकासी और जल प्रबंधन से जुड़े पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि उस समय पानी के उपयोग और निकासी को लेकर व्यावहारिक समझ विकसित थी। राखीगढ़ी की विरासत को भी इसी संदर्भ में समझने का प्रयास किया जाएगा। डिजिटल प्रदर्शनी में प्राचीन समाज की जीवनशैली को केवल वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि उनके उपयोग और तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में प्रस्तुत करने की योजना है। इससे पर्यटक समझ सकेंगे कि हजारों साल पहले लोग अपनी बस्तियों, घरेलू जरूरतों, कृषि और संसाधनों के प्रबंधन के लिए किस तरह की व्यवस्थाओं पर निर्भर थे।
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राजाओं की शक्ति नहीं, नागरिक जीवन की जरूरतों पर जोर
प्राचीन सभ्यताओं की चर्चा में मिस्र के विशाल पिरामिड और मेसोपोटामिया के जिग्गुरात का उल्लेख अक्सर होता है। ये स्मारक और धार्मिक संरचनाएं वहां की राजनीतिक तथा धार्मिक सत्ता की शक्ति को दर्शाती हैं। वहीं, सरस्वती-सिंधु सभ्यता की पहचान सुनियोजित नगरों, आवासीय व्यवस्था, जल निकासी और मानकीकृत निर्माण परंपराओं से भी होती है। इस तुलना का अर्थ यह नहीं है कि इन सभ्यताओं में केवल एक ही तरह की व्यवस्था थी। इसका उद्देश्य यह समझना है कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता के नगर नियोजन में सामुदायिक जरूरतों और दैनिक जीवन से जुड़े पहलुओं का महत्वपूर्ण स्थान था। व्यवस्थित बस्तियां, मानकीकृत ईंटें और जल निकासी की व्यवस्थाएं तत्कालीन शहरी जीवन की उन्नत समझ को सामने लाती हैं। डिजिटल प्रदर्शनी के माध्यम से पर्यटकों को सभ्यता की इस विशेषता से परिचित कराया जाएगा।

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पहिया, योग और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ेगी नई पीढ़ी
प्रदर्शनी में पहिए और बैलगाड़ी के साथ योग से संबंधित माने जाने वाले पुरातात्विक साक्ष्यों तथा शिवलिंग, स्वास्तिक और पीपल जैसे प्रतीकों से जुड़े विषय भी शामिल किए जाएंगे। इनके माध्यम से प्राचीन समाज की सांस्कृतिक परंपराओं और जीवनशैली को समझने का प्रयास होगा। हालांकि, किसी पुरातात्विक आकृति या प्रतीक को वर्तमान धार्मिक मान्यताओं से जोड़ते समय ऐतिहासिक साक्ष्यों और उनकी व्याख्याओं के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। राखीगढ़ी से मिली बैल की मिट्टी की मूर्ति भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। मूर्ति पर त्रिशूल जैसा दिखाई देने वाला निशान तत्कालीन पशुपालन या किसी अन्य व्यवहार से संबंधित हो सकता है। हालांकि, केवल समानता के आधार पर उसके उद्देश्य के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। डिजिटल प्रस्तुति के माध्यम से पर्यटकों को ऐसे अवशेषों की मदद से प्राचीन समाज को समझने की संभावनाओं से परिचित कराया जाएगा।पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के उप निदेशक डॉॅ. नरेंद्र परमार के अनुसार, डिजिटल प्रदर्शनी में सरस्वती-सिंधु सभ्यता और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विभिन्न पहलुओं को शामिल किया जाएगा। राखीगढ़ी में मिले पुरातात्विक साक्ष्यों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रदर्शित कर पर्यटकों को प्राचीन सभ्यता की विशेषताओं से परिचित कराया जाएगा। 19 से 25 अक्तूबर तक चलने वाला यह महोत्सव राखीगढ़ी की ऐतिहासिक पहचान को नए तरीके से सामने लाने का अवसर होगा। डिजिटल माध्यम से पर्यटक समझ सकेंगे कि हजारों साल पहले यहां के लोगों ने अपने परिवेश, संसाधनों और सामुदायिक जरूरतों के अनुसार जीवन की व्यवस्थाएं विकसित की थीं।
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