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चार बेटियों ने ली जैन धर्म की दीक्षा, अकेले खेड़ी जालब से हैं तीन बेटियां
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अमर उजाला ब्यूरो
नारनौंद (हिसार)। गांव माजरा के हाई स्कूल में जैन धर्म के जैन भागवती दीक्षा महोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम धर्म मुनि जैन के सानिध्य में हुआ। शुरुआत में पूरे गांव में शोभा यात्रा निकाली गई। इसमें चार बेटियों ने अपने जीवन की आस्था जैन धर्म में जताते हुए दीक्षा ग्रहण की। इन चारों बेटियां में कोई पायलट तो कोई सीए तो कोई टीचर बनना चाहती थीं, लेकिन अब इन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ले चारों बेटियों ने वचन लिया कि वह जैन धर्म के नियमों का पालन करेंगी और कभी भी धर्म की मर्यादा को ठेस नहीं पहुंचाएंगी। दीक्षा लेने वाली युवतियों में तीन अकेले गांव खेड़ी जालब से हैं। खेड़ी जालब की सुनैना जैन, विदिता जैन व कुसुम जैन और दिल्ली के उत्तम नगर निवासी समता जैन ने दीक्षा ग्रहण की। ये चारों बेटियां अपने परिवार के साथ प्रवचन सुनने जाती थीं और वहीं से इनका आध्यात्म की ओर हृदय परिवर्तन हुआ।
दीक्षा ग्रहण करने से पहले उन्होंने जैन धर्म के नियम पढ़कर उनके पालन का वचन भी दिया। वहीं इससे पहले एक सप्ताह तक जिस प्रकार से एक लड़की की शादी के कार्यक्रम होते हैं, वैसे ही इन बेटियों के सारे ख्वाब पूरे किए जाते हैं। उन्हें हल्दी लगती है, फिर मेहंदी लगाई जाती है। मंडप सजता है। दीक्षा से पहले चारों बेटियों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। चारों दुल्हन की तरह सजे जोड़े में मंच पर दीक्षा ग्रहण करने के लिए पहुंचीं। इसके बाद परिवार के लोगों के साथ सभी बेटियों ने मंच पर आखिरी बार मिलन किया। फिर चारों बेटियों का मुंडन करवाया गया। मुंडन के साथ चारों बेटियों ने सफेद वस्त्र धारण कर साध्वियों के भेष में बाहर निकलीं और अपने गुरु धर्म मुनि जैन से जैन धर्म की दीक्षा ली।
19 वर्षीय कुसुम जैन : पिता किसान
खेड़ी जालब निवासी कुसुम जैन एक साधारण किसान राममेहर की बेटी हैं, जोकि गांव के ही सरकारी स्कूल से दसवीं पास की है। परिवार में दो भाई व एक बहन हैं। पढ़ाई पूरी कर वह एयरफोर्स में जाना चाहती थी, लेकिन गांव खेड़ी जालब में जैन धर्म का संस्थानक बना हुआ है, जहां पर कुसुम भी प्रवचन सुनने जाती थीं, जिससे वह प्रभावित हुईं।
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20 वर्षीय समता जैन : पिता व्यापारी
दिल्ली के उत्तम नगर निवासी समता जैन के पिता व्यापारी हैं। दिल्ली में अपनी बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर वह चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहती थीं। पिता अशोक जैन एक कन्फेक्शनरी व्यापारी हैं, जिन्होंने जैन धर्म को अपनाकर सब कुछ त्यागकर यह धर्म अपनाया है। वह अपने परिवार के लोगों के साथ जैन धर्म के प्रवचन सुनने जाती थीं, जिससे प्रभावित होकर यह धर्म अपनाया है।
21 वर्षीय विदिता जैन : पिता किसान
खेड़ी जालब निवासी विदिता जैन एक किसान की बेटी है और गांव के ही सरकारी स्कूल से ही दसवीं पास की है। दो भाइयों व एक बहन के साथ परिवार में बड़ी हुई। पिता बारू राम की लाडली अक्सर प्रवचन सुनने के लिए खेड़ी जालब स्थित संस्थानक में जाती थीं, जहां से प्रभावित होकर उसने जैन धर्म अपनाकर समाज सेवा का निर्णय लिया। परिवार के समझाने के बाद भी नहीं मानी। आज परिवार इनके फैसले के साथ है। बताते हैं कि विदिता जैन टीचर बनना चाहती थीं।
22 वर्षीय सुनैना जैन : पिता किसान
गांव खेड़ी जालब की सुनैना जैन के पिता भी किसान हैं और उन्होंने अपनी बेटी को गांव से ही दसवीं तक की पढ़ाई करवाई। एक भाई व दो बहनों के बीच पली-बढ़ी सुनैना जैन धर्म से इतनी प्रभावित हो चुकी थीं कि जब भी गांव में बने संस्थानक में कोई भी साधु या साध्वी आती थीं तो वह वहां पर जरूर जाती थीं। सुनैना एयरफोर्स में पायलट बनना चाहती थीं।
जैन धर्म चलता है पांच सिद्धांतों पर
पहला सिद्धांत अहिंसा - इसमें हम किसी भी प्राणी को जाने-अनजाने अपनी काया द्वारा हानि नहीं पहुंचाते। अहिंसा के सूक्ष्म स्तर के अनुसार किसी भी प्राणी के लिए अनिष्ट, बुरा, हानिकारक नहीं सोचते। इसके साथ ही अहिंसा के सूक्ष्मतम स्तर पर ऐसा बौद्धिक विकास होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति घृणा के भाव का त्याग हो जाता है।
दूसरा सिद्धांत सत्य - सत्य का अर्थ है उचित व अनुचित में से उचित का चुनाव करना और शाश्वत व क्षणभंगुर में से शाश्वत का चुनाव करना।
तीसरा सिद्धांत अचौर्य - आम भाषा में इसका अर्थ वस्तुएं न चुराने से है, लेकिन इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ है, शरीर-मन-बुद्धि को मैं नहीं मानना।
चौथा सिद्धांत ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्य के रास्ते को बताता है। यह सिद्धांत उपरोक्त तीन सिद्धांतों - अहिंसा, सत्य, अचौर्य के परिणामस्वरूप फलीभूत माना जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ब्रह्म+चर्य‘ अर्थात ब्रह्म में स्थिर रहना।
पांचवां सिद्धांत है अपरिग्रह - अपरिग्रह को इंगित करता है। इसमें तीन आयाम होते हैं। पहला वस्तुओं का अपरिग्रह, दूसरा व्यक्तिओं का अपरिग्रह, तीसरा विचारों का अपरिग्रह। तीनों का सार है कि मैं वस्तुओं, व्यक्तियों और विचारों का परित्याग करता हूं। इन पांचों सिद्धांतों को भगवान महावीर ने अपनाया था और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
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नारनौंद (हिसार)। गांव माजरा के हाई स्कूल में जैन धर्म के जैन भागवती दीक्षा महोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम धर्म मुनि जैन के सानिध्य में हुआ। शुरुआत में पूरे गांव में शोभा यात्रा निकाली गई। इसमें चार बेटियों ने अपने जीवन की आस्था जैन धर्म में जताते हुए दीक्षा ग्रहण की। इन चारों बेटियां में कोई पायलट तो कोई सीए तो कोई टीचर बनना चाहती थीं, लेकिन अब इन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ले चारों बेटियों ने वचन लिया कि वह जैन धर्म के नियमों का पालन करेंगी और कभी भी धर्म की मर्यादा को ठेस नहीं पहुंचाएंगी। दीक्षा लेने वाली युवतियों में तीन अकेले गांव खेड़ी जालब से हैं। खेड़ी जालब की सुनैना जैन, विदिता जैन व कुसुम जैन और दिल्ली के उत्तम नगर निवासी समता जैन ने दीक्षा ग्रहण की। ये चारों बेटियां अपने परिवार के साथ प्रवचन सुनने जाती थीं और वहीं से इनका आध्यात्म की ओर हृदय परिवर्तन हुआ।
दीक्षा ग्रहण करने से पहले उन्होंने जैन धर्म के नियम पढ़कर उनके पालन का वचन भी दिया। वहीं इससे पहले एक सप्ताह तक जिस प्रकार से एक लड़की की शादी के कार्यक्रम होते हैं, वैसे ही इन बेटियों के सारे ख्वाब पूरे किए जाते हैं। उन्हें हल्दी लगती है, फिर मेहंदी लगाई जाती है। मंडप सजता है। दीक्षा से पहले चारों बेटियों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। चारों दुल्हन की तरह सजे जोड़े में मंच पर दीक्षा ग्रहण करने के लिए पहुंचीं। इसके बाद परिवार के लोगों के साथ सभी बेटियों ने मंच पर आखिरी बार मिलन किया। फिर चारों बेटियों का मुंडन करवाया गया। मुंडन के साथ चारों बेटियों ने सफेद वस्त्र धारण कर साध्वियों के भेष में बाहर निकलीं और अपने गुरु धर्म मुनि जैन से जैन धर्म की दीक्षा ली।
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19 वर्षीय कुसुम जैन : पिता किसान
खेड़ी जालब निवासी कुसुम जैन एक साधारण किसान राममेहर की बेटी हैं, जोकि गांव के ही सरकारी स्कूल से दसवीं पास की है। परिवार में दो भाई व एक बहन हैं। पढ़ाई पूरी कर वह एयरफोर्स में जाना चाहती थी, लेकिन गांव खेड़ी जालब में जैन धर्म का संस्थानक बना हुआ है, जहां पर कुसुम भी प्रवचन सुनने जाती थीं, जिससे वह प्रभावित हुईं।
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20 वर्षीय समता जैन : पिता व्यापारी
दिल्ली के उत्तम नगर निवासी समता जैन के पिता व्यापारी हैं। दिल्ली में अपनी बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर वह चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहती थीं। पिता अशोक जैन एक कन्फेक्शनरी व्यापारी हैं, जिन्होंने जैन धर्म को अपनाकर सब कुछ त्यागकर यह धर्म अपनाया है। वह अपने परिवार के लोगों के साथ जैन धर्म के प्रवचन सुनने जाती थीं, जिससे प्रभावित होकर यह धर्म अपनाया है।
21 वर्षीय विदिता जैन : पिता किसान
खेड़ी जालब निवासी विदिता जैन एक किसान की बेटी है और गांव के ही सरकारी स्कूल से ही दसवीं पास की है। दो भाइयों व एक बहन के साथ परिवार में बड़ी हुई। पिता बारू राम की लाडली अक्सर प्रवचन सुनने के लिए खेड़ी जालब स्थित संस्थानक में जाती थीं, जहां से प्रभावित होकर उसने जैन धर्म अपनाकर समाज सेवा का निर्णय लिया। परिवार के समझाने के बाद भी नहीं मानी। आज परिवार इनके फैसले के साथ है। बताते हैं कि विदिता जैन टीचर बनना चाहती थीं।
22 वर्षीय सुनैना जैन : पिता किसान
गांव खेड़ी जालब की सुनैना जैन के पिता भी किसान हैं और उन्होंने अपनी बेटी को गांव से ही दसवीं तक की पढ़ाई करवाई। एक भाई व दो बहनों के बीच पली-बढ़ी सुनैना जैन धर्म से इतनी प्रभावित हो चुकी थीं कि जब भी गांव में बने संस्थानक में कोई भी साधु या साध्वी आती थीं तो वह वहां पर जरूर जाती थीं। सुनैना एयरफोर्स में पायलट बनना चाहती थीं।
जैन धर्म चलता है पांच सिद्धांतों पर
पहला सिद्धांत अहिंसा - इसमें हम किसी भी प्राणी को जाने-अनजाने अपनी काया द्वारा हानि नहीं पहुंचाते। अहिंसा के सूक्ष्म स्तर के अनुसार किसी भी प्राणी के लिए अनिष्ट, बुरा, हानिकारक नहीं सोचते। इसके साथ ही अहिंसा के सूक्ष्मतम स्तर पर ऐसा बौद्धिक विकास होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति घृणा के भाव का त्याग हो जाता है।
दूसरा सिद्धांत सत्य - सत्य का अर्थ है उचित व अनुचित में से उचित का चुनाव करना और शाश्वत व क्षणभंगुर में से शाश्वत का चुनाव करना।
तीसरा सिद्धांत अचौर्य - आम भाषा में इसका अर्थ वस्तुएं न चुराने से है, लेकिन इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ है, शरीर-मन-बुद्धि को मैं नहीं मानना।
चौथा सिद्धांत ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्य के रास्ते को बताता है। यह सिद्धांत उपरोक्त तीन सिद्धांतों - अहिंसा, सत्य, अचौर्य के परिणामस्वरूप फलीभूत माना जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ब्रह्म+चर्य‘ अर्थात ब्रह्म में स्थिर रहना।
पांचवां सिद्धांत है अपरिग्रह - अपरिग्रह को इंगित करता है। इसमें तीन आयाम होते हैं। पहला वस्तुओं का अपरिग्रह, दूसरा व्यक्तिओं का अपरिग्रह, तीसरा विचारों का अपरिग्रह। तीनों का सार है कि मैं वस्तुओं, व्यक्तियों और विचारों का परित्याग करता हूं। इन पांचों सिद्धांतों को भगवान महावीर ने अपनाया था और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी।