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गीला-सूखा कचरा अलग-अलग करवाने, कंपोस्टिंग प्लांट तैयार करने के बाद भी एक साल में ही स्वच्छता रैंकिंग में पिछड़ गया शहर
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अमर उजाला ब्यूरो
हिसार। गीला-सूखा कचरा अलग-अलग एकत्रित करवाने, तोशाम रोड पर कंपोस्टिंग प्लांट तैयार करवाने, नई गाड़ियां और ई-रिक्शा खरीदने के बाद भी शहर इस बार स्वच्छता रैंकिंग में पिछड़ गया है। साल 2018 में जहां शहर पूरे प्रदेश में पांचवें नंबर पर रहा था, वहीं इस बार दो स्थान नीचे खिसककर सातवें नंबर पर आ गया है। इसी तरह देश भर में पिछली बार 146वीं रैंक मिली थी, जबकि इस बार 173वीं रैंकिंग मिली है। बताया जा रहा है कि शहर की स्वच्छता पर छह करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए हैं, फिर भी हम पिछली बार की रैंकिंग से पिछड़ गए।
रैंकिंग में गिरावट ने नगर निगम की स्वच्छता शाखा के स्वच्छता में सुधार के दावों की हवा निकाल दी है, क्योंकि यह पहला मौका है, जब इतने संसाधन होने के बाद रैंकिंग घटी है। पिछले दो सालों से लगातार रैंकिंग में बढ़ोतरी हो रही थी।
स्वच्छता के लिए खर्च होते हैं सालाना छह करोड़ से ज्यादा
नगर निगम प्रशासन शहर में स्वच्छता के लिए सालाना छह करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करता है। 3 करोड़ 60 लाख रुपये तो सिर्फ हुडा सेक्टरों की सफाई पर खर्च किए जाते हैं। वाहनों के लिए डीजल खरीदने पर एक करोड़ रुपये, छह लाख रुपये वाहनों के बीमे पर खर्च होते हैं। 36 लाख रुपये से अधिक शौचालयों के रखरखाव पर लगाए जाते हैं। इसके बाद भी स्वच्छता का यह हाल है। खास बात यह है कि नियमित और अनुबंधित कर्मचारियों की सैलरी इसके अलावा है।
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अधिकारियों ने बताया, कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होने को सबसे बड़ा कारण
निगम के एसई रामजीलाल ने स्वच्छता रैंकिंग में पिछडने का सबसे बड़ा कारण कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना बताया है। मगर उनका यह कारण इसलिए वाजिब नहीं लग रहा, क्योंकि पिछले सालों में भी यह प्लांट नहीं था। इसके बावजूद रैंकिंग में सुधार हुआ। इसके अलावा ऑनलाइन पोर्टल में कुछ जानकारियां ऐसी रहीं, जिन्हें जल्दबाजी में कम भर दिया गया। गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने का काम 20 वार्डों में शुरू हो गया था, लेकिन पोर्टल में सिर्फ 14 वार्ड का ही जिक्र किया गया।
इस बार 5 हजार नंबर का था सर्वे, मिले 2472.63 नंबर
हालांकि पिछले दोनों सर्वे चार हजार नंबरों के थे। मगर इस बार पांच हजार नंबरों का सर्वे कर दिया गया था। इसमें से हिसार शहर को 2472.63 नंबर मिले हैं। अधिकारियों की मानें तो कचरा प्रबंधन प्लांट और गीला-सूखा कचरा अलग-अलग करने के लिए ही 1250 अंक निर्धारित थे, जो हिसार के सीधे कट गए।
स्वच्छता में पिछड़ने के ये रहे मुख्य कारण
-- कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना
-- गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने की व्यवस्था बेहतर नहीं
-- डंपिंग प्वाइंट फ्री एरिया नहीं
-- निचले स्तर के अधिकारियों में गंभीरता नहीं रही
-- ऑनलाइन पोर्टल में भी पुख्ता डाटा नहीं चढ़ाया
-- स्वच्छता शाखा के कर्मचारियों की आपसी खींचतान भी एक कारण रही
स्वच्छता रैंकिंग कम आई है। अधिकारियों से जानकारी लेंगे कि कहां कमजोरी रही है। अभी से स्वच्छता को और बेहतर बनाने के लिए प्रयास शुरू करेंगे। निश्चित रूप से अब हालात बदलने पर गंभीरता से काम करेंगे।
- अशोक कुमार गर्ग, कमिश्नर, नगर निगम
रैंकिंग कम रहने का सबसे बड़ा कारण कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना है। अगर प्लांट होता तो नंबर अच्छे रहते। इसके अलावा ऑनलाइन डाटा में भी कुछ चीजें कम अपलोड कर दी गईं। आगे और बेहतर प्रयास करेंगे।
- रामजीलाल, एसई, नगर निगम
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हिसार। गीला-सूखा कचरा अलग-अलग एकत्रित करवाने, तोशाम रोड पर कंपोस्टिंग प्लांट तैयार करवाने, नई गाड़ियां और ई-रिक्शा खरीदने के बाद भी शहर इस बार स्वच्छता रैंकिंग में पिछड़ गया है। साल 2018 में जहां शहर पूरे प्रदेश में पांचवें नंबर पर रहा था, वहीं इस बार दो स्थान नीचे खिसककर सातवें नंबर पर आ गया है। इसी तरह देश भर में पिछली बार 146वीं रैंक मिली थी, जबकि इस बार 173वीं रैंकिंग मिली है। बताया जा रहा है कि शहर की स्वच्छता पर छह करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए हैं, फिर भी हम पिछली बार की रैंकिंग से पिछड़ गए।
रैंकिंग में गिरावट ने नगर निगम की स्वच्छता शाखा के स्वच्छता में सुधार के दावों की हवा निकाल दी है, क्योंकि यह पहला मौका है, जब इतने संसाधन होने के बाद रैंकिंग घटी है। पिछले दो सालों से लगातार रैंकिंग में बढ़ोतरी हो रही थी।
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स्वच्छता के लिए खर्च होते हैं सालाना छह करोड़ से ज्यादा
नगर निगम प्रशासन शहर में स्वच्छता के लिए सालाना छह करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करता है। 3 करोड़ 60 लाख रुपये तो सिर्फ हुडा सेक्टरों की सफाई पर खर्च किए जाते हैं। वाहनों के लिए डीजल खरीदने पर एक करोड़ रुपये, छह लाख रुपये वाहनों के बीमे पर खर्च होते हैं। 36 लाख रुपये से अधिक शौचालयों के रखरखाव पर लगाए जाते हैं। इसके बाद भी स्वच्छता का यह हाल है। खास बात यह है कि नियमित और अनुबंधित कर्मचारियों की सैलरी इसके अलावा है।
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अधिकारियों ने बताया, कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होने को सबसे बड़ा कारण
निगम के एसई रामजीलाल ने स्वच्छता रैंकिंग में पिछडने का सबसे बड़ा कारण कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना बताया है। मगर उनका यह कारण इसलिए वाजिब नहीं लग रहा, क्योंकि पिछले सालों में भी यह प्लांट नहीं था। इसके बावजूद रैंकिंग में सुधार हुआ। इसके अलावा ऑनलाइन पोर्टल में कुछ जानकारियां ऐसी रहीं, जिन्हें जल्दबाजी में कम भर दिया गया। गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने का काम 20 वार्डों में शुरू हो गया था, लेकिन पोर्टल में सिर्फ 14 वार्ड का ही जिक्र किया गया।
इस बार 5 हजार नंबर का था सर्वे, मिले 2472.63 नंबर
हालांकि पिछले दोनों सर्वे चार हजार नंबरों के थे। मगर इस बार पांच हजार नंबरों का सर्वे कर दिया गया था। इसमें से हिसार शहर को 2472.63 नंबर मिले हैं। अधिकारियों की मानें तो कचरा प्रबंधन प्लांट और गीला-सूखा कचरा अलग-अलग करने के लिए ही 1250 अंक निर्धारित थे, जो हिसार के सीधे कट गए।
स्वच्छता में पिछड़ने के ये रहे मुख्य कारण
-- कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना
-- गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने की व्यवस्था बेहतर नहीं
-- डंपिंग प्वाइंट फ्री एरिया नहीं
-- निचले स्तर के अधिकारियों में गंभीरता नहीं रही
-- ऑनलाइन पोर्टल में भी पुख्ता डाटा नहीं चढ़ाया
-- स्वच्छता शाखा के कर्मचारियों की आपसी खींचतान भी एक कारण रही
स्वच्छता रैंकिंग कम आई है। अधिकारियों से जानकारी लेंगे कि कहां कमजोरी रही है। अभी से स्वच्छता को और बेहतर बनाने के लिए प्रयास शुरू करेंगे। निश्चित रूप से अब हालात बदलने पर गंभीरता से काम करेंगे।
- अशोक कुमार गर्ग, कमिश्नर, नगर निगम
रैंकिंग कम रहने का सबसे बड़ा कारण कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं होना है। अगर प्लांट होता तो नंबर अच्छे रहते। इसके अलावा ऑनलाइन डाटा में भी कुछ चीजें कम अपलोड कर दी गईं। आगे और बेहतर प्रयास करेंगे।
- रामजीलाल, एसई, नगर निगम