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झटका : निजी लैब के साथ अनुबंध खत्म, आरटीपीसीआर लैब में होगी सी और बी की जांच

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 27 Jul 2022 11:27 PM IST
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Setback: Contract with private labs ends, RTPCR labs to check C and B
फतेहाबाद के एनसीडी क्लीनिक में जांच करते हुए डॉक्टर। - फोटो : Fatehabad
फतेहाबाद। हेपेटाइटिस सी को लेकर प्रदेश में जिला रेड जोन में शामिल है। वर्ष 2017 से जिला मुख्यालय में उपचार शुरू हुआ तो अब तक 6310 मरीजों रजिस्ट्रेशन हो चुका है जिसमें 4850 मरीजों में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि हुई है। लेकिन अब हेपेटाइटिस सी की जांच को लेकर मरीजों को झटका लगा है।
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बता दें कि हेपेटाइटिस सी और बी की जांच निजी लैब में नहीं होगी, स्वास्थ्य विभाग का निजी लैब के साथ 27 जुलाई तक का अनुबंध था जो कि खत्म हो गया है। हेपेटाइटिस दिवस से निजी लैब कोर डायग्नोस्टिक पर सैंपल जांच नहीं होगी बल्कि गांव बड़ोपल की आरटीपीसीआर लैब में हेपेटाइटिस सी और बी के सैंपल भेजे जाएंगे। पूरे प्रदेश में इस संबंध में आदेश जारी हुए हैं। यहां आपको बता दे कि जिले में आरटीपीसीआर लैब माइक्रोबायलॉजिस्ट न होने से बंद है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि सी और बी के सैंपल जांच के लिए हिसार या सिरसा भेजे जा सकते है ंजब तक व्यवस्था नहीं होती है।
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बता दें कि उपचार के लिए जिले के हजारों मरीजों को 2017 से पहले कभी रोहतक पीजीआई के चक्कर काटने पड़ रहे थे तो कभी महंगी दवाइयां लेकर उपचार करवाना पड़ रहा था। जिला स्तर पर फरवरी 2017 में हेपेटाइटिस सी उपचार की सुविधा शुरू हुई। वर्ष 2020 में हेपेटाइटिस बी का उपचार भी शुरू हो गया है। संवाद
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मां से बच्चे में भी आ सकती है हेपेटाइटिस सी
हेपेटाइटिस सी बीमारी को लेकर सर्वे हुआ तो जिला रेड जोन में शामिल हुआ था। जिले में सबसे ज्यादा हेपेटाइटिस सी के मरीजों की रतिया क्षेत्र में पुष्टि हुई थी। हालांकि स्थिति अब कंट्रोल में है। वर्ष 2017 से अब तक जिले में हेपेटाइटिस सी लक्षण से ग्रस्त 6310 मरीज पंजीकृत हो चुके हैं और उनकी जांच करवाई गई। जांच के दौरान 4850 मरीजों में पुष्टि हुई। अब तक 4500 मरीज दवा लेकर स्वस्थ हो गए हैं और 350 मरीजों का फिलहाल उपचार चल रहा है। हेपेटाइटिस बी के जिले में अब 385 मरीज मिल चुके हैं और इनका उपचार चल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक कोर्स पूरा होने के तीन माह बाद भी जांच जरूरी है। ये खतरनाक बीमारी मां से बच्चे में भी आ सकती है, अगर समय रहते इसका उपचार लिया जाए तो बच्चे में आने से रोका जा सकता है।
रतिया क्षेत्र रेड जोन में शामिल
डाक्टरों के अनुसार हेपेटाइटिस सी वायरस के लक्षण पांच से लेकर सात सालों के बाद नजर आते हैं। क्षेत्र में सर्वे के दौरान सामने आया था कि आरएमपी डाक्टरों ने इलाके में कई लोगों को एक ही सीरिंज से टीके लगाए जिससे हेपेटाइटिस सी वायरस (एससीवी) एक से दूसरे में चला गया। रतिया व उसके आसपास के क्षेत्र में करीब 11 साल पहले काला-पीलिया के आशंकित मरीज सामने आने लगे थे। रतिया में सर्वे के दौरान करीब 15 सौ मरीज सामने आए और बढ़ते चले गए। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक रतिया, हमजापुर, बुर्ज, बीराबदी, टोहाना, कुलां, अकांवाली, झलनियां, एमपी सोतर, टिब्बी, अयाल्की, नहेड़ी, समैन, चिम्मो, इंदाछुई, बिलासपुर, हिजरावां खुर्द, अहरवां, घासवां, नागपुर, बहबलपुर, नथवान, रत्ताखेड़ा, भिरड़ाना, धीड़, हसंगा, जमालपुर, जल्लोपुर, कमाना समेत जिले के कई गांवों में हेपेटाइटिस सी के मरीज पाए गए।
तीन से छह माह खानी होती है दवा
डॉक्टरों के मुताबिक हेपेटाइटिस सी के मरीजों को तीन माह दवा खानी होती है। जिन मरीजों का लीवर खराब हो जाता है, उन मरीजों का 6 महीने दवाई दी जाती है। जिन मरीजों का उपचार पूरा हो गया है, उन्हें हेपेटाइटिस-सी का कार्ड टेस्ट दोबारा करवाने की जरूरत नहीं है, कार्ड टेस्ट 15 साल तक पॉजिटिव रह सकता है।

कोट
हेपेटाइटिस सी और बी की जांच पहले स्वास्थ्य विभाग द्वारा अनुबंध पर निजी लैब से टेस्ट होते थे जो कि अब नहीं होंगे। सैंपल आरटीपीसीआर लैब में होंगे। यहां लैब बंद बारे उच्च अधिकारियों को बता दिया गया है, इसको लेकर व्यवस्था की जाएगी। हेपेटाइटिस सी और बी को लेकर लोगों का जागरूक होना जरूरी है। जिस घर में मरीज को काला पीलिया है, उन्हें ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। जो लोग नशा करते हैं वह अपने साथियों के साथ एक ही सीरींज का प्रयोग करते हैं इसलिए नशे से दूर रहे हैं। टैटू भी ऐसी दुकान से बनवाएं जहां हर व्यक्ति के लिए अलग नीडल प्रयोग की जाती हो। दवा के साथ-साथ खाने-पीने का परहेज भी रखना जरूरी है। ये वायरस मां से बच्चे में आ सकता है इसलिए समय पर जांच करवाकर दवा जरूर लें।
-डॉ. मनीष टुटेजा, विशेषज्ञ एवं नोडल अधिकारी, नागरिक अस्पताल
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