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उपेक्षा का शिकार स्वतंत्रता सेनानी भक्तराम शर्मा का गांव नन्हेड़ी
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स्वतंत्रता सेनानी भक्तराम शर्मा। फाइल फोटो
- फोटो : Fatehabad
आजादी की लड़ाई में गांव नन्हेड़ी का भी इतिहास रहा है। इस गांव के सपूत भक्तराम शर्मा ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया था। मगर दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के बाद शासन-प्रशासन ने स्वतंत्रता सेनानी के इस गांव को पूरी तरह से उपेक्षित रखा है। देश को आजादी मिले सात दशक से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन गांव नन्हेड़ी का विकास स्थिर है।
गांव की तस्वीर जनप्रतिनिधियों, शासन व प्रशासन की उपेक्षा ब्यां कर रही है। देश की आजादी में अपनी आहुतियां देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भक्तराम शर्मा की गांव में कोई स्मृति शेष नहीं है। उनकी याद में कोई यादगार स्थल नहीं बनाया गया है। गांव के इस सपूत ने सन 1941 से 1947 तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेना में रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की थी। कुलां-रतिया मार्ग के किनारे बसे इस गांव की करीब चार हजार आबादी है। संवाद
दो बेटे करते हैं मजदूरी, फिर भी स्वतंत्रता सेनानी पिता का संजोकर रखे हैं इतिहास
भक्तराम शर्मा के तीन बेटे थे, जिनमें से एक की कुछ साल पहले मृत्यु हो गई थी। बाकी दोनों बेटों द्वारा अपने स्वर्गीय पिता का वर्षों पुराना इतिहास संजोकर रखा हुआ है। स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र सतीश कुमार बताते हैं कि बचपन से वो अपने पिता से आजादी से जुड़ी बातें सुना करते थे, जिन्हें आज भी वो याद कर भावुक हो जाते हैं। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते दोनों बेटे मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। मगर इसके साथ ही वह अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर सामाजिक कार्यों में भी अग्रसर रहने का प्रयास करते हैं।
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अब तो परिवार को सम्मानित करना ही भूल गया है प्रशासन
सतीश कुमार कहते हैं कि उनके स्वतंत्रता सेनानी पिता भक्तराम शर्मा ने कई यातनाएं काटी हैं। मगर अब तो प्रशासन परिवार को सम्मानित करना भी भूल गया है। साल में दो बार जिला मुख्यालय पर होने वाले स्वतंत्रता समारोह में उनके परिजनों की कोई उपस्थिति नहीं होती। सन 1980 में उनके पिता भक्तराम शर्मा का निधन हो गया था। इसके बाद एक बार उपायुक्त ने जिला मुख्यालय फतेहाबाद तथा एक बार उपमंडल अधिकारी द्वारा उपमंडल मुख्यालय टोहाना में स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मान के लिए बुलाया था। इसके बाद कोई सुध नहीं ली गई है। पिता की मृत्यु के बाद हालांकि सरकार की ओर से उनकी माता को सम्मान निधि स्वतंत्रता संग्राम पेंशन दी जाती थी, लेकिन सन 2001 में उनकी माता की मृत्यु होने के बाद ये पेंशन भी बंद हो गई है।
प्रतिमा स्थापित करने की मांग
सतीश कुमार ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा गांव में उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी भक्तराम शर्मा की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है। इस कारण लोगों को उनके स्वाधीनता आंदोलन में योगदान और संघर्ष गाथा की भी संपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाई है। वे गांव में अपने स्वर्गीय पिता की प्रतिमा स्थापित करने के लिए कई बार अधिकारियों से मिल चुके हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हो पाया है। परिजन व ग्रामीणों ने भी उनके स्मृति स्थल को संरक्षित करने की मांग की है।
गांव में खेल स्टेडियम की दरकार
देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी के गांव के युवाओं को खेल स्टेडियम की दरकार है। ग्रामीण लंबे समय से स्टेडियम की मांग उठा रहे हैं। युवाओं में आज भी देशभक्ति का जज्बा कायम है। कुछ युवा सरहदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं तो कई युवा सेना में भर्ती होने की तैयारी में जुटे हैं।
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गांव की तस्वीर जनप्रतिनिधियों, शासन व प्रशासन की उपेक्षा ब्यां कर रही है। देश की आजादी में अपनी आहुतियां देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भक्तराम शर्मा की गांव में कोई स्मृति शेष नहीं है। उनकी याद में कोई यादगार स्थल नहीं बनाया गया है। गांव के इस सपूत ने सन 1941 से 1947 तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेना में रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की थी। कुलां-रतिया मार्ग के किनारे बसे इस गांव की करीब चार हजार आबादी है। संवाद
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दो बेटे करते हैं मजदूरी, फिर भी स्वतंत्रता सेनानी पिता का संजोकर रखे हैं इतिहास
भक्तराम शर्मा के तीन बेटे थे, जिनमें से एक की कुछ साल पहले मृत्यु हो गई थी। बाकी दोनों बेटों द्वारा अपने स्वर्गीय पिता का वर्षों पुराना इतिहास संजोकर रखा हुआ है। स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र सतीश कुमार बताते हैं कि बचपन से वो अपने पिता से आजादी से जुड़ी बातें सुना करते थे, जिन्हें आज भी वो याद कर भावुक हो जाते हैं। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते दोनों बेटे मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। मगर इसके साथ ही वह अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर सामाजिक कार्यों में भी अग्रसर रहने का प्रयास करते हैं।
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अब तो परिवार को सम्मानित करना ही भूल गया है प्रशासन
सतीश कुमार कहते हैं कि उनके स्वतंत्रता सेनानी पिता भक्तराम शर्मा ने कई यातनाएं काटी हैं। मगर अब तो प्रशासन परिवार को सम्मानित करना भी भूल गया है। साल में दो बार जिला मुख्यालय पर होने वाले स्वतंत्रता समारोह में उनके परिजनों की कोई उपस्थिति नहीं होती। सन 1980 में उनके पिता भक्तराम शर्मा का निधन हो गया था। इसके बाद एक बार उपायुक्त ने जिला मुख्यालय फतेहाबाद तथा एक बार उपमंडल अधिकारी द्वारा उपमंडल मुख्यालय टोहाना में स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मान के लिए बुलाया था। इसके बाद कोई सुध नहीं ली गई है। पिता की मृत्यु के बाद हालांकि सरकार की ओर से उनकी माता को सम्मान निधि स्वतंत्रता संग्राम पेंशन दी जाती थी, लेकिन सन 2001 में उनकी माता की मृत्यु होने के बाद ये पेंशन भी बंद हो गई है।
प्रतिमा स्थापित करने की मांग
सतीश कुमार ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा गांव में उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी भक्तराम शर्मा की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है। इस कारण लोगों को उनके स्वाधीनता आंदोलन में योगदान और संघर्ष गाथा की भी संपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाई है। वे गांव में अपने स्वर्गीय पिता की प्रतिमा स्थापित करने के लिए कई बार अधिकारियों से मिल चुके हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हो पाया है। परिजन व ग्रामीणों ने भी उनके स्मृति स्थल को संरक्षित करने की मांग की है।
गांव में खेल स्टेडियम की दरकार
देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी के गांव के युवाओं को खेल स्टेडियम की दरकार है। ग्रामीण लंबे समय से स्टेडियम की मांग उठा रहे हैं। युवाओं में आज भी देशभक्ति का जज्बा कायम है। कुछ युवा सरहदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं तो कई युवा सेना में भर्ती होने की तैयारी में जुटे हैं।