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सरकार के गलत आंकड़ों ने बिगाड़ा किसानों का खेल, नरमे के भाव 68 सौ तक पहुंचे

Sat, 23 Jul 2016 12:08 AM IST
fatehabad
fatehabad Updated Sat, 23 Jul 2016 12:08 AM IST
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सुरेंद्र असीजा। किसानों के हाथ से निकलते ही नरमे के दाम आसमान छूने लगे हैं। किसान जब मंडी में नरमे की फसल लाए तो उनको 4500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से नरमा बेचना पड़ा। चार माह बाद ही इसके भाव 65 सौ प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। नरमे के भाव में एकाएक हुई बढ़ोतरी के पीछे कॉटन व्यापारी और एसोसिएशन का तर्क है कि सरकार के गलत आंकड़ेे और चीन में आई बाढ़ तथा पिछले साल के मुकाबले इस बार यहां कपास की बिजाई कम होना है। स्पिनिंग मिल एसोसिएशन का बड़ा तर्क है कि कॉटन एडवायजरी बोर्ड के गलत आंकड़ों से कॉटन व्यापारियों पर कपास की सप्लाई का संकट आ गया। इस कारण उन्हें मिल बंद होते देख ऊंचे भावों पर नरमा खरीदना पड़ रहा है।
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बता दें कि पिछले साल फतेहाबाद में 79 हजार हेक्टेयर भूमि पर नरमे की बिजाई हुई थी। नरमे की फसल सफेद मक्खी की चपेट में आई तो इस साल जिले में नरमे का रकबा 70 हजार हेक्टेयर ही रह गया। 2015-16 की नरमे की फसल मंडी में आई तो किसानों को चार हजार रुपये प्रति क्विंटल के पास रेट मिला।
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दाम बढ़कर पांच हजार तक पहुंचा तो 80 फीसदी किसान नरमे की फसल बेच चुके थे। अप्रैल के पहले सप्ताह नरमे के भाव 47 सौ रुपये प्रति क्विंटल थे। जुलाई के एक पखवाड़े बाद भाव बढ़कर 68 सौ रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए। नरमे के ऊंचे भावों को देखकर किसानों को पछतावा हो रहा है कि वे भी अगर नरमे की फसल का भंडारण कर लेते तो आज अधिक दाम मिलते। अहलीसदर के किसान रामकुमार ने बताया कि उसने 46 सौ रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अपनी पूरी फसल बेच दी थी। उस वक्त उसे बताया गया था कि अब नरमे के भाव इससे ऊपर नहीं जाएंगे, लेकिन अब भाव 68 सौ तक आ गए हैं।
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हरियाणा कॉटन मिल एसोसिएशन का कहना है कि भारत सरकार के उपक्रम कॉटन एडवायजरी बोर्ड ने इस सीजन के बारे में दावा किया था कि इस बार 3 करोड़ 80 लाख गांठों का उत्पादन होगा। बोर्ड ने कपड़ा मंत्रालय को भी यही आंकड़े प्रस्तुत किए। जबकि कई प्राइवेट एजेंसियां ये आंकड़ा महज तीन करोड़ ही बता रही थीं। अब अप्रैल 2016 में जब नरमे की फसल मंडियों में पहुंच गई तो कॉटन एडवायजरी बोर्ड ने सीजन खत्म होने के बाद बताया कि तीन करोड़ 10 लाख गांठों का उत्पादन ही संभव है। एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष सुशील मित्तल के अनुसार 70 लाख गांठों का कम उत्पादन होना व्यापारी वर्ग के लिए सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि स्पिनिंग मिलें सिस्टम के हिसाब से चलती हैं। इन मिलों की पिछले और रनिंग सीजन में 22 लाख गांठें प्रति महीने खपत होती है।

उस हिसाब से मिलों की सोच थी कि मार्केट में नरमे की फसल उपलब्ध है। जब जरूरत होगी, वे आसानी से खरीद लेंगे। हुआ इससे बिल्कुल उलट। बोर्ड के आंकड़े आते ही व्यापारियों को लगा कि माल कम है और व्यापारी व स्पिनिंग मिलों ने ऊंचे भावों में नरमे की खरीद शुरू कर दी ताकि उनकी फैक्ट्री कच्चे माल के अभाव से बंद ना हो।


दूसरा बड़ा कारण, चीन में कॉटन की पैदावार जल्द होती है। वहां बाढ़ से व्यापारी वर्ग के दिमाग में यह बात बैठ गई कि अब चीन में उत्पादन नहीं होगा और खपत अवश्य होगी। नरमे के दाम बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण रहा। तीसरा पिछली बार हरियाणा, पंजाब, गुजरात में नरमे की बिजाई 20 से 30 फीसदी कम हुई है। स्पिनिंग मिल एसोसिएशन को इस बात का खतरा है कि अब माल नहीं खरीदा तो आगे माल का उत्पादन कम है। इससे नरमे के भाव बढ़ गए हैं।

अब रेट गिरने की आशंका
नरमे के भाव दो दिन पहले तक 68 सौ रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए थे जो अब साढ़े 65 सौ तक आ गए हैं। यह सीजन का सबसे उच्चतम स्तर था। जानकार मानते हैं कि नरमे के दाम बढ़ने के कुछ फैक्टर के अलावा सटोरियों की भी अहम भूमिका थी। माना जा रहा है कि अब दाम नीचे आएंगे।


फैक्ट फाइल
पांच मन = एक नरमे की गांठ
एक मन = 37.330 किलो (पुराना मन)
नरमे की गांठों का उत्पादन रिपोर्ट : 3.80 करोड़
नरमे की गांठों का वास्तविक उत्पादन : 3.10 करोड़
2015-16 में बिजाई : 79 हजार हेक्टेयर
2016-17 में बिजाई : 70 हजार हेक्टेयर



कॉटन एडवायजरी बोर्ड व सरकारी एजेंसियों के गलत आंकड़े पेश करने के कारण कॉटन के खरीददारों में असुरक्षा की भावना घर कर गई। बोर्ड का लक्ष्य था कि तीन करोड़ 80 लाख गांठों का उत्पादन होगा, जबकि उत्पादन 70 लाख गांठों का कम हुआ। रिपोर्ट आते ही व्यापारियों ने नरमे को मनमाने दामों पर खरीदना शुरू कर दिया।
सुशील मित्तल, प्रदेशाध्यक्ष, हरियाणा कॉटन मिल एसोसिएशन
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