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प्रशासकों के पास रुपयों का टोटा, गांवों में बैठा विकास का भट्ठा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 03 Apr 2022 11:57 PM IST
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There is a shortage of money with the administrators, the development kiln sitting in the villages
गांव हालुवास में गंदे पानी की निकासी न होने के कारण जोहड़ में जाता नालियों का गंदा पानी। संवाद - फोटो : Bhiwani
शिव कुमार
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भिवानी। गांवों की सरकार का कार्यकाल क्या खत्म हुआ, गांवों की सूरत ही बिगड़ गई। पहले जिले के गांवों के 302 चौधरी (सरपंच) थे। पिछले साल 23 फरवरी को इनकी चौधर क्या खत्म हुई, गांवों के विकास को ग्रहण लग गया। अब खस्ताहाल गंदगी से अटी गलियां, कीचड़ ही कीचड़, कचरे के ढेर गांवों की पहचान बनते जा रहे हैं।
दरअसल अब जिले के सात ब्लॉक के 302 गांवों का जिम्मा महज चार बीडीपीओ के कंधों पर है। इतना ही नहीं, एक ग्राम सचिव भी छह से सात पंचायतों का जिम्मा संभाल रहे हैं। किसी-किसी सचिव के जिम्मे तो नौ-नौ ग्राम पंचायतें हैं। ऐसे में गांवों का विकास का पहिया थमा ही नहीं उल्टा चल रहा है और गांवों की सूरत बिगड़ गई है। कहने को तो बीडीपीओ को 25 हजार रुपये तक के विकास कार्य कराने का अधिकार है। मगर इतनी राशि में कोई विकास कार्य करावाना संभव नहीं।
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बिना सरपंच गांवों की हालत कैसी है, इसका अंदाजा शहर से महज पांच किलोमीटर दादरी मार्ग पर स्थित विधायक के गोद लिए गांव हालुवास मे फैली अव्यवस्थाओं से ही लगाया जा सकता है। सफाई व्यवस्था बिल्कुल ठप है। वहीं गलियों की सूरत भी बदसूरत हो चली है। कचरे के ढेर लोगों का स्वागत करते हैं तो कीचड़ से भरी गलियों से वाहन निकालना या पैदल निकलना भी कड़ी चुनौती है। ग्रामीण स्वच्छ पानी को ही तरस रहे है। तीन दिन में एक ही बार पेयजल सप्लाई आती है। महज 200 मीटर के खस्ताहाल दिनोद मार्ग के फेर में ढाई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है।
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सरपंचों का कार्यकाल खत्म हुए 13 महीने बीत चुके हैं और चुनाव पर फैसला कोर्ट में विचाराधीन है। पंचायत चुनाव में देरी का सीधा असर गांवों के विकास और ग्रामीण व्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। गांवों की सूरत अनदेखी के कारण बिगड़ती जा रही है। विकास कार्य तो दूर सफाई व्यवस्था तक ठप है। ऐसे में ग्रामीण परेशान है। नेताओं, अधिकारियों से गुहार लगाने के बाद भी ठप व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। नियमानुसार 25 हजार रुपये तक के कार्य खंड विकास अधिकारी करवा सकते है मगर इस राशि में कोई भी विकास कार्य करवाना या रिपेयरिंग का कार्य संभव नहीं है। ऐसे में गांवों में न विकास कार्य हो रहे है और न ही खस्ताहाल व्यवस्थाओं की मरम्मत।
काम के बोझ तले दबे बीडीपीओ और सचिव, फिर भी नहीं हो रहे काम
जिले में सात ब्लॉक में 302 गांव हैं। इनका जिम्मा महज चार बीडीपीओ पर है। अभी एक नए आए है, वरना तो तीन ही बीडीपीओ थे। अब ग्राम सचिवों की बात करें तो जिलेभर में इनकी संख्या करीब 60 है। इनमें छह-सात रिटायरमेंट के नजदीक हैं। हर सचिव के जिम्मे पांच से छह पंचायतें है। कुछ के जिम्मे तो नौ-नौ पंचायतें है। जिले में जेई भी बहुत कम है। (संवाद)

स्टाफ की कमी
हमारा प्रयास है कि गांवों में व्यवस्था बनी रहे। चुनाव का फैसला तो कोर्ट में विचाराधीन है। हमारे यहां सात ब्लॉक में चार बीडीपीओ हैं। स्टाफ की कमी है, फिर भी ग्रामीणों को बेहतर सुविधाएं देने का प्रयास करते हैं।
-आशीष मान, जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी।
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