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बवानीखेड़ा के शिंभू सिंह तंवर ने जर्मनी की जेल में सात साल भोगी थीं यातनाएं
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शिंभू सिंह तंवर की फोटो के साथ उनकी पत्नी तोहफा देवी व परिवार के अन्य सदस्य। संवाद
- फोटो : Bhiwani
संजय कोकचा
बवानीखेड़ा। देश की आजादी में अनगिनत रणबांकुरों ने शामिल होकर मां भारती की सेवा की और दुश्मनों की कैद में अमानवीय यातनाएं सहन कीं। इन्हीं में से एक नाम है बवानीखेड़ा के शिंभू सिंह तंवर का। उन्होंने आजाद हिंदी फौज में शामिल होकर द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया। इस दौरान उन्हें जर्मनी की जेल में कैद कर लिया गया और सालों तक अमानवीय यातनाएं दी गईं। कई साल तक घर नहीं आने पर परिजनों ने उन्हें मृत मानकर अंतिम क्रियाओं की सभी रस्में पूरी कर दीं। हालांकि सात साल बाद जर्मनी से रिहा होकर घर लौटने पर परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
परिजनों की मानें तो शिंभू सिंह तंवर शुरुआत में अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुए। हालांकि वह देश को गुलामी की बेड़ी में देखकर बेचैन हो उठे और उस समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित हो उठे। इसके बाद वह अंग्रेजी सेना को छोड़कर नेताजी की आजाद हिंद सेना का हिस्सा हो गए।
वह नेताजी के काफी नजदीकी और भरोसेमंद लोगों में शुमार हो गए। गंभीर मुद्दों पर वह नेताजी साथ मंत्रणा करते और योजनाओं को अमलीजामा पहनाते थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज में रहकर द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया। हालांकि इस दौरान उन्हें बंधक बना लिया गया। वह कई सालों तक जर्मनी की जेल में बंद रहे और अमानवीय प्रताड़नाओं को सहन किया। जर्मनी से लौटने के बाद वह गांव के लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध किस्से सुनाते थे। 86 वर्ष की उम्र में 1998 में उनकी मौत हुई। संवाद
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बेटे की मौत के गम में मां ने तोड़ा दम
जर्मनी में जेल में बंधक बनाने के बाद परिजनों ने मान लिया था कि द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी मौत हो चुकी है। उनकी मौत का सदमा उनकी मां भोपा देवी सहन नहीं कर सकीं और कुछ दिन में ही उनकी मौत हो गई। हालांकि शिंभू सिंह तंवर लौटे तो वह देश की आजादी की खुशी अपनी मां के साथ बांटना चाहते थे लेकिन मां की मौत की जानकारी पर वह भी स्तब्ध रह गए।
खाने को मिलता था एक आलू अथवा चमड़ा
शिंभू सिंह तंवर की पत्नी तोहफा देवी (80) बताती हैं कि जर्मनी से लौटने के बाद शिंभूजी ने उन्हें कैद की दु:ख भरी दास्तान सुनाई थी। शिंभूजी बताते थे कि जेल में कई बार उन्हें पूरे दिन में केवल एक उबला आलू दिया जाता था तो कई बार चबाने के लिए महज चमड़ा दे दिया जाता था। बंदी की हालत अधिक खराब होती थी तो उसे थोड़ा सा पानी पिला दिया जाता था।
जेब में रखते थे नेताजी की फोटो
शिंभू सिंह तंवर के बेटे जयबीर और कंवरभान बताते हैं कि उनके पिता हमेशा नेताजी की फोटो अपनी जेब में रखते थे। वह उन्हें हमेशा आदर के साथ नेताजी कहकर पुकारते थे। उनके सामने कोई और नेताजी को सुभाषचंद्र बोस के नाम से पुकारता था तो वह पीड़ा महसूस करते थे। हर त्योहार पर वह नेताजी की तस्वीर घर पर लेकर आते थे।
शिंभूजी का परिवार भी देशसेवा में जुुटा
शिंभू सिंह तंवर ने आजाद सिंह फौज में रहकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी तो अब उनकी पीढ़ियां भी देशसेवा में जुटी हैं। उनका बेटा श्यामपाल सेना के नायब सूबेदार पद से तो एक पोता मनोज हवलदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके पोते मनजीत, राहुल और रवि भी कहते हैं यदि उन्हें मौका मिले तो वे भी सेना में जाकर देशसेवा करना चाहते हैं।
पूरा परिवार आज भी करता है गर्व महसूस
पूरा परिवार आज भी शिंभू सिंह तंवर के वंशज होने पर गर्व महसूस करते हैं। उनके पोते मनजीत ने बताया कि उनके दादा के कारण उनके परिवार को बहुत सम्मान मिलता है। उन्हें भी गर्व है कि वह उस परिवार से संबंध रखते हैं, जिसने देश की आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
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बवानीखेड़ा। देश की आजादी में अनगिनत रणबांकुरों ने शामिल होकर मां भारती की सेवा की और दुश्मनों की कैद में अमानवीय यातनाएं सहन कीं। इन्हीं में से एक नाम है बवानीखेड़ा के शिंभू सिंह तंवर का। उन्होंने आजाद हिंदी फौज में शामिल होकर द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया। इस दौरान उन्हें जर्मनी की जेल में कैद कर लिया गया और सालों तक अमानवीय यातनाएं दी गईं। कई साल तक घर नहीं आने पर परिजनों ने उन्हें मृत मानकर अंतिम क्रियाओं की सभी रस्में पूरी कर दीं। हालांकि सात साल बाद जर्मनी से रिहा होकर घर लौटने पर परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
परिजनों की मानें तो शिंभू सिंह तंवर शुरुआत में अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुए। हालांकि वह देश को गुलामी की बेड़ी में देखकर बेचैन हो उठे और उस समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित हो उठे। इसके बाद वह अंग्रेजी सेना को छोड़कर नेताजी की आजाद हिंद सेना का हिस्सा हो गए।
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वह नेताजी के काफी नजदीकी और भरोसेमंद लोगों में शुमार हो गए। गंभीर मुद्दों पर वह नेताजी साथ मंत्रणा करते और योजनाओं को अमलीजामा पहनाते थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज में रहकर द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया। हालांकि इस दौरान उन्हें बंधक बना लिया गया। वह कई सालों तक जर्मनी की जेल में बंद रहे और अमानवीय प्रताड़नाओं को सहन किया। जर्मनी से लौटने के बाद वह गांव के लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध किस्से सुनाते थे। 86 वर्ष की उम्र में 1998 में उनकी मौत हुई। संवाद
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बेटे की मौत के गम में मां ने तोड़ा दम
जर्मनी में जेल में बंधक बनाने के बाद परिजनों ने मान लिया था कि द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी मौत हो चुकी है। उनकी मौत का सदमा उनकी मां भोपा देवी सहन नहीं कर सकीं और कुछ दिन में ही उनकी मौत हो गई। हालांकि शिंभू सिंह तंवर लौटे तो वह देश की आजादी की खुशी अपनी मां के साथ बांटना चाहते थे लेकिन मां की मौत की जानकारी पर वह भी स्तब्ध रह गए।
खाने को मिलता था एक आलू अथवा चमड़ा
शिंभू सिंह तंवर की पत्नी तोहफा देवी (80) बताती हैं कि जर्मनी से लौटने के बाद शिंभूजी ने उन्हें कैद की दु:ख भरी दास्तान सुनाई थी। शिंभूजी बताते थे कि जेल में कई बार उन्हें पूरे दिन में केवल एक उबला आलू दिया जाता था तो कई बार चबाने के लिए महज चमड़ा दे दिया जाता था। बंदी की हालत अधिक खराब होती थी तो उसे थोड़ा सा पानी पिला दिया जाता था।
जेब में रखते थे नेताजी की फोटो
शिंभू सिंह तंवर के बेटे जयबीर और कंवरभान बताते हैं कि उनके पिता हमेशा नेताजी की फोटो अपनी जेब में रखते थे। वह उन्हें हमेशा आदर के साथ नेताजी कहकर पुकारते थे। उनके सामने कोई और नेताजी को सुभाषचंद्र बोस के नाम से पुकारता था तो वह पीड़ा महसूस करते थे। हर त्योहार पर वह नेताजी की तस्वीर घर पर लेकर आते थे।
शिंभूजी का परिवार भी देशसेवा में जुुटा
शिंभू सिंह तंवर ने आजाद सिंह फौज में रहकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी तो अब उनकी पीढ़ियां भी देशसेवा में जुटी हैं। उनका बेटा श्यामपाल सेना के नायब सूबेदार पद से तो एक पोता मनोज हवलदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके पोते मनजीत, राहुल और रवि भी कहते हैं यदि उन्हें मौका मिले तो वे भी सेना में जाकर देशसेवा करना चाहते हैं।
पूरा परिवार आज भी करता है गर्व महसूस
पूरा परिवार आज भी शिंभू सिंह तंवर के वंशज होने पर गर्व महसूस करते हैं। उनके पोते मनजीत ने बताया कि उनके दादा के कारण उनके परिवार को बहुत सम्मान मिलता है। उन्हें भी गर्व है कि वह उस परिवार से संबंध रखते हैं, जिसने देश की आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।