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घायल होने के बावजूद घुसपैठियों को आखिरी क्षण तक खदेड़ते रहे थे हवलदार राम कुमार लांबा
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बहल। कारगिल दिवस के अवसर पर पूरा देश मां भारती के वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दे रहा है। ऐसे अवसर पर कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए, वीरचक्र से सम्मानित देश के वीर सपूत लांस हवलदार रामकुमार लांबा को उनका पूरा गांव और परिवार भी याद कर रहा है। युद्ध में घायल होने के बावजूद भी वे घुसपैठियों को आखिरी क्षण तक खदेड़ते रहे थे।
जून 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान 15 हजार फीट की ऊंचाई पर किलाबंद चौकी में हथियारों के जखीरे के साथ मौजूद घुसपैठियों को निकालने का कार्य उन्हें दिया गया था। अपनी टुकड़ी के साथ जब रामकुमार लांबा टारगेट के नजदीक पहुंचे तो दुश्मनों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। कंधे व कमर में गोली लगने के बावजूद घायल अवस्था में भी वे दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे। उन्होंने एक हैंड ग्रेनेड फेंककर एक घुसपैठिये को मार गिराया और दो को घायल कर दिया था। अपने जख्मों की परवाह किए बगैर वे दुश्मनों का डटकर सामना करते रहे। दुश्मनों के नजदीक पहुंचने पर उन्होंने और दो और घुसपैठियों को को मार गिराया। इस दौरान अधिक खून बहने के कारण वे देश के लिए शहीद हो गए। उनके अदम्य साहस, शौर्य व सर्वोच्च बलिदान के लिए सरकार ने उन्हें मार्च 2000 को वीर चक्र से भी सम्मानित किया था।
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अंतिम संस्कार के दौरान नहीं पता था क्या हो रहा है -
उनके पुत्र नगेंद्र पेशे से वकील हैं और अपने परिवार, विशेष कर अपनी मां के संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 6 जून 1999 को उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दिन था। आर्मी के एक भारी वाहन में उनके पिता के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर लाया गया था। उस वक्त नगेंद्र की उम्र महज सात साल की थी और वह कुछ सोचने-समझने की स्थिति में नहीं था। नगेंद्र ने बताया कि जब उसे उसकी दादी ने पिता के अंतिम दर्शन करने के लिए बुलाया तो मुझे बिल्कुल भी अहसास नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। मेरे पिता के अंतिम संस्कार के कुछ दिनों के बाद मां ने हम दोनों भाइयों (नगेंद्र और देवेंद्र) को पढ़ने हॉस्टल में भेज दिया गया।
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हॉस्टल में करते थे पिता के एक फोन का इंतजार -
नगेंद्र बताते हैं कि हॉस्टल में हर रविवार को माता-पिता के फोन आते थे और बच्चों से बात करवाई जाती थी। जब भी फोन की घंटी बजती तो फोन के पास जाता और वॉर्डन की आवाज सुनता और उम्मीद करता की वॉर्डन साहब मुझे बुलाएंगे। पर मुझे हर बार निराशा ही हाथ लगती। उन दिनों गांव में लैंडलाइन कम होने की वजह से मां से भी महीने-दो महीने में भी एक-दो बार ही बात हो पाती थी। मुझे अपने पिता की तब सबसे ज्यादा कमी महसूस होती है। जब मैं अपने दोस्तों को उनके पिता के साथ बात करते हुए देखता, तब महसूस होता कि मैंने कभी अपने पिता से फोन पर बात नहीं की और ना ही मैं कभी कर पाऊंगा।
जब मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ और अपने पिता की वीरता की कहानियां सुनी तब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक वीर बहादुर सैनिक का बेटा हूं।
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रेडियो ऑपरेटर थे रामकुमार -
नगेंद्र ने बताया कि मेरे पिता एक रेडियो ऑपरेटर थे। उनका काम था अहम जानकारी एक अफसर से दूसरे अफसर तक पहुंचाना। उनके साथ काम करने वाले बताते हैं कि मेरे पिता की आवाज आज भी उनके कानों में गूंजती है। अभी 9 जुलाई 2022 को वॉर मेमोरियल पर जब मेरी मां को शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाया गया तो हमें गर्व का अहसास हुआ। आज उनकी हर यादें हमें गौरवान्वित व रोमांचित कर जाती है। हम और हमारा यह देश उनको कभी नहीं भूल पाएगा।
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जून 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान 15 हजार फीट की ऊंचाई पर किलाबंद चौकी में हथियारों के जखीरे के साथ मौजूद घुसपैठियों को निकालने का कार्य उन्हें दिया गया था। अपनी टुकड़ी के साथ जब रामकुमार लांबा टारगेट के नजदीक पहुंचे तो दुश्मनों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। कंधे व कमर में गोली लगने के बावजूद घायल अवस्था में भी वे दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे। उन्होंने एक हैंड ग्रेनेड फेंककर एक घुसपैठिये को मार गिराया और दो को घायल कर दिया था। अपने जख्मों की परवाह किए बगैर वे दुश्मनों का डटकर सामना करते रहे। दुश्मनों के नजदीक पहुंचने पर उन्होंने और दो और घुसपैठियों को को मार गिराया। इस दौरान अधिक खून बहने के कारण वे देश के लिए शहीद हो गए। उनके अदम्य साहस, शौर्य व सर्वोच्च बलिदान के लिए सरकार ने उन्हें मार्च 2000 को वीर चक्र से भी सम्मानित किया था।
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अंतिम संस्कार के दौरान नहीं पता था क्या हो रहा है -
उनके पुत्र नगेंद्र पेशे से वकील हैं और अपने परिवार, विशेष कर अपनी मां के संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 6 जून 1999 को उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दिन था। आर्मी के एक भारी वाहन में उनके पिता के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर लाया गया था। उस वक्त नगेंद्र की उम्र महज सात साल की थी और वह कुछ सोचने-समझने की स्थिति में नहीं था। नगेंद्र ने बताया कि जब उसे उसकी दादी ने पिता के अंतिम दर्शन करने के लिए बुलाया तो मुझे बिल्कुल भी अहसास नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। मेरे पिता के अंतिम संस्कार के कुछ दिनों के बाद मां ने हम दोनों भाइयों (नगेंद्र और देवेंद्र) को पढ़ने हॉस्टल में भेज दिया गया।
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हॉस्टल में करते थे पिता के एक फोन का इंतजार -
नगेंद्र बताते हैं कि हॉस्टल में हर रविवार को माता-पिता के फोन आते थे और बच्चों से बात करवाई जाती थी। जब भी फोन की घंटी बजती तो फोन के पास जाता और वॉर्डन की आवाज सुनता और उम्मीद करता की वॉर्डन साहब मुझे बुलाएंगे। पर मुझे हर बार निराशा ही हाथ लगती। उन दिनों गांव में लैंडलाइन कम होने की वजह से मां से भी महीने-दो महीने में भी एक-दो बार ही बात हो पाती थी। मुझे अपने पिता की तब सबसे ज्यादा कमी महसूस होती है। जब मैं अपने दोस्तों को उनके पिता के साथ बात करते हुए देखता, तब महसूस होता कि मैंने कभी अपने पिता से फोन पर बात नहीं की और ना ही मैं कभी कर पाऊंगा।
जब मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ और अपने पिता की वीरता की कहानियां सुनी तब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक वीर बहादुर सैनिक का बेटा हूं।
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रेडियो ऑपरेटर थे रामकुमार -
नगेंद्र ने बताया कि मेरे पिता एक रेडियो ऑपरेटर थे। उनका काम था अहम जानकारी एक अफसर से दूसरे अफसर तक पहुंचाना। उनके साथ काम करने वाले बताते हैं कि मेरे पिता की आवाज आज भी उनके कानों में गूंजती है। अभी 9 जुलाई 2022 को वॉर मेमोरियल पर जब मेरी मां को शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाया गया तो हमें गर्व का अहसास हुआ। आज उनकी हर यादें हमें गौरवान्वित व रोमांचित कर जाती है। हम और हमारा यह देश उनको कभी नहीं भूल पाएगा।
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