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Vinod Upadhyay Encounter: श्रीप्रकाश शुक्ला को देख माफिया बना था विनोद, पूर्वांचल पर करना चाहता था राज
Fri, 05 Jan 2024 02:21 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 05 Jan 2024 02:21 PM IST
सार
माफिया विनोद उपाध्याय का एनकाउंटर यूपी एसटीएफ की टीम ने गुरुवार रात को कर दिया। सुबह घायल अवस्था में उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां टीम ने मृत बता दिया। विनोद उपाध्याय एक लाख रुपये का इनामी था। विभिन्न जिलों में कुल 35 मुकदमे दर्ज थे।
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माफिया विनोद उपाध्याय और डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला। (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
90 के दशक में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से यूपी बिहार के लोग थरथर कांपते थे। लोग इसे शार्प शूटर के नाम से जानते थे। 25-26 साल के इस डॉन से पुलिस के साथ अपराधी भी खौफ खाते थे। श्रीप्रकाश शुक्ला को देखकर माफिया विनोद उपाध्याय भी जरायम की दुनिया का राजा बनना चाह रहा था। लेकिन उसका यह सपना सपना ही रह गया। डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला की तरह उसे भी एसटीएफ ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया।
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बता दें कि विनोद उपाध्याय को पकड़ने के लिए पुलिस लगातार शिंकजा कस रही थी। गोरखपुर के अलावा अयोध्या और लखनऊ समेत अन्य शहरों में भी उसकी तलाश में छापेमारी चल रही थी। अंत में एसटीएफ को सुल्तानपुर में सफलता मिली।
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विनोद, माफिया सत्यव्रत राय का भी करीबी रह चुका है। लेकिन जमीन और रुपयों के लेनदेन को लेकर दोनों में विवाद हो गया था। इसी बीच विनोद के करीबी गंगेश पहाड़ी और दीपक सिंह की हत्या हो गई। इस हत्याकांड में सत्यव्रत और सुजीत चौरसिया समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया था। इसके बाद सत्यव्रत और सुजीत, विनोद को भी मारने के लिए ढूंढने लगे। जबकि विनोद अपने साथियों की हत्या का बदला लेने के लिए सुजीत को ढूंढने लगा। उस समय भी पुलिस ने विनोद को दबोचा था।
जानकारी के लिए बता दें कि सत्यव्रत राय डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला का बहुत करीबी मित्र था। सत्यव्रत राय ने अपराध की शुरुआत श्रीप्रकाश शुक्ला के साथ ही की थी। कई मुकदमे में वांछित होने के बावजूद उसका दोष साबित नहीं हो पाया।
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छात्रसंघ चुनाव से बनाया था दबदबा
गोरखपुर विश्वविद्यालय साल 2003 में छात्रसंघ का चुनाव का आयोजन हुआ। उस समय छात्रसंघ राजनीति प्रत्याशी कम और उसके समर्थकों की दबंगई पर आधारित हुआ करती थी। विनोद ने अपने साथी को चुनाव लड़ाया। इस समय तक विनोद के ऊपर आपराधिक मामले बहुत दर्ज नहीं थे और न ही विनोद को अपराधी की श्रेणी में गिना जाता था। चुनाव के पीछे मंशा थी कि अगर उसका प्रत्याशी चुनाव जीतता है तो उसकी धमक अपने आप बढ़ जाएगी और यही हुआ।
इसे भी पढ़ें: माफिया विनोद उपाध्याय की राजनीति में थी धमक, बसपा के टिकट पर लड़ा था विधानसभा का चुनाव
चुनाव बड़ी सरगर्मी से संपन्न हुआ। मतदान के दिन विश्वविद्यालय गेट के पास उसके और विरोधी गुट के प्रत्याशी के बीच जमकर मारपीट भी हुई। कहा जाता है कि विरोधी गुट के प्रत्याशी को ही विनोद के गुट ने जमकर पीट दिया था। चुनाव हुआ और परिणाम विनोद के पक्ष में आया। इसी जीत के बाद उसका कद उसके वर्ग के मनबढ़ लोगों के बीच बढ़ने लगा। 2006 में एक बार फिर छात्रसंघ का चुनाव हुआ। लेकिन इस बार इनके पक्ष के प्रत्याशी को लिंगदोह की शर्तों की वजह से मैदान से हटना पड़ा। इसी के बाद 2007 में पीडब्लूडी कांड हो गया। इस घटना में विनोद के साथ छात्रसंघ का प्रत्याशी भी आरोपी बना था।
गोरखपुर विश्वविद्यालय साल 2003 में छात्रसंघ का चुनाव का आयोजन हुआ। उस समय छात्रसंघ राजनीति प्रत्याशी कम और उसके समर्थकों की दबंगई पर आधारित हुआ करती थी। विनोद ने अपने साथी को चुनाव लड़ाया। इस समय तक विनोद के ऊपर आपराधिक मामले बहुत दर्ज नहीं थे और न ही विनोद को अपराधी की श्रेणी में गिना जाता था। चुनाव के पीछे मंशा थी कि अगर उसका प्रत्याशी चुनाव जीतता है तो उसकी धमक अपने आप बढ़ जाएगी और यही हुआ।
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