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दसवीं शताब्दी में हुआ था इस मंदिर का निर्माण, इस वजह से लोग इन्हें कहते हैं 'बसिया डीह माता'

Wed, 10 Jun 2020 07:17 PM IST
vivek shukla अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 10 Jun 2020 07:17 PM IST
सार

  • शहर के पश्चिमी छोर पर स्थित है बसिया डीह माता का प्राचीन मंदिर
  • मंदिर में होते है मांगलिक कार्य, सावन के अंतिम दिन लगता है मेला

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special story of Basia Dih Mata temple in Gorakhpur
Basia Dih Mata - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गोरखपुर शहर के पश्चिमी छोर पर डोमिनगढ़ रेलवे स्टेशन से सटे स्थित बसिया डीह मंदिर है। मंदिर को लेकर लोगों में गहरी आस्था है। बड़ी संख्या में लोग यहां प्रतिदिन माता के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि माता भक्तों की सभी मुरादें पूरी करती हैं। इस मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी का माना जाता है। उस समय के थारू राजा मानसिंह ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।

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थारू राजा मान सिंह ने कराया था इसका निर्माण
स्व. पीके लाहिड़ी और केके पांडेय की पुस्तक 'आइने-गोरखपुर' में बसिया डीह मंदिर का वर्णन मिलता है। पुस्तक में इस बात का भी जिक्र है कि इस मंदिर का निर्माण संभवत: दसवीं शताब्दी में थारू राजा मान सिंह ने कराया था। बाद में क्रमवार डोमकटार और सतासी के राजाओं की देखरेख में मंदिर सुरक्षित रहा और उसकी प्रतिष्ठा समय के साथ बढ़ती रही।

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मंदिर के नाम पर बस गई पूरी बस्ती

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Basia Dih Mata - फोटो : अमर उजाला।

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में रात में देवी की निशा पूजन व जागरण पूरे विधि-विधान से संपन्न होता था और अगले दिन सुबह रात में बने बासी प्रसाद को ग्रहण करते थे। बासी प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा आज भी चली आ रही है। हालांकि एक और मान्यता के अनुसार यहां प्राचीन काल में एक बस्ती थी।

बस्ती के बसने के नाम पर इसे बसिया नाम मिला और बस्ती में पुराने घरों के होने की वजह से कालांतर में इसमें डीह शब्द जुड़ गया। यह बस्ती बाद में राप्ती-रोहिन नदी के प्रवाह में विलीन हो गई लेकिन यहां की कुलदेवी का स्थान बच गया, जिसकी मान्यता आज सिद्ध स्थल के रूप में है।

पूरे साल होते हैं मांगलिक कार्य
बसिया डीह में स्थापित माता के स्वरूप को लोग मां दुर्गा का अवतार मानकर आराधना करते हैं। मंदिर परिसर में मांगलिक कार्यों का सिलसिला वर्ष भर चलता रहता है। नवरात्र के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती है। वहीं सावन के अंतिम दिन यहां बड़े मेले का आयोजन होता है जिसके बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। मान्यता यह है कि यहां मानी गई मनौती जरूर पूरी होती है।

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