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बंजर जमीन पर छाई हरियाली: अगर जिद, जुनून और जज्बा हो तो मिट्टी भी उगले 'सोना'

Thu, 18 May 2023 11:23 AM IST
vivek shukla टीपी शाही, गोरखपुर।
टीपी शाही, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 18 May 2023 11:23 AM IST
सार

सब्जी की खेती करने वालों ने बताया कि वह लोग दिवाली के बाद यहां आ गए। उसके बाद खेती में जुट गए। होली के आसपास सब्जी निकलने लगती हैं। शुरुआती दौर में रेट ज्यादा रहता है। अधिक सब्जी निकलने पर बाजार नरम हो जाता है। इस साल अधिक पूंजी लगने के फायदा ज्यादा नहीं है।

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Six families made sandy land fertile with vitality
राप्ती नदी के किनारे सहुआकोल गांव में सब्जी के खेत में काम करते सब्जी वाले। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

जज्बा और जुनून हो तो मिट्टी भी -सोना- उगल सकती है। बंजर जमीन पर पसीना बहाकर बरेली के किसानों ने इसे साबित किया है। सैकड़ों किलोमीटर दूर से गगहा ब्लाॅक के सहुआकोल गांव में डेरा जमाए किसानों की उगाई सब्जियां गोरखपुर और आसपास के इलाकों के लोगों का स्वाद बढ़ा रही हैं।

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वहीं इसके जरिए किसानों की लाखों की आमदनी भी हो रही है। सात सौ किमी दूर बरेली से आए छह परिवारों की जीवटता से रेतीली जमीन उपजाऊ बन गई है। तेज हवा चलने पर जहां कभी धूल का गुबार उठता था, वह इलाका हरित क्षेत्र बन गया है। यहां से कई जिलों के लोगों को हरी सब्जियां खाने को मिल रही हैं।
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गगहा ब्लाॅक के आखिरी छोर पर राप्ती नदी के किनारे सहुआकोल गांव बसा हुआ है। नदी के किनारे की जमीन रेतीली है। यहां पर खेती न होने के कारण खर उपजता था। वह खर छप्पर बनाने के काम आता है। बहुत से लोग उसे बेचकर थोड़ी सी आमदनी कर लेते थे। लेकिन, बरेली से अपने छह साथियों के साथ आए याकूब ने 80 एकड जमीन को लीज पर लेकर खेती शुरू की। अब हरी सब्जियां उगाकर यह साबित कर दिया कि जज्बा हो तो कहीं, कुछ भी पैदा किया जा सकता है।
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इनके घरों में पीढ़ियों से होती है सब्जी की खेती

बरेली जिले के फतेहगंज इलाके के मूल निवासी याकूब ने बताया कि सब्जी की खेती का उनका पुश्तैनी धंधा है। उनके बाप-दादा ने पहले पंजाब, राजस्थान में नदी के किनारे सब्जी की खेती शुरू की। खेती बाड़ी का हुनर सीखने के बाद अब वे गोरखपुर-बस्ती मंडल में नदी के किनारे खेती कर रहे हैं।

यहां खेती करने के इरादे को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पहले उनकी सब्जियां बरेली, शाहजहांपुर से गोरखपुर मंडी में आती थीं। उसी बीच उन लोगों का संपर्क आढ़तियों से हुआ। पहले फोन पर बात हुई फिर यहां आए। सबसे पहले सिद्धार्थनगर में सब्जी की खेती शुरू की। अब गोरखपुर आए हैं। पहले पूर्व मेयर अंजू चौधरी के नदुआ स्थित गांव में सब्जी की खेती शुरू की। उसके बाद लालपुर टीकर, डोमिनगढ़ में। याकूब का कहना है कि वह विगत 20 सालों से गोरखपुर जिले में सब्जी की खेती करते हैं।

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चार हजार रुपये प्रति एकड़ पर है एक साल का एग्रीमेंट
याकूब के साथ आए बशीर अहमद, मोहम्मद शमी, सईद अहमद ने बताया कि कुछ लोगों ने संपर्क किया और जमीन दिखाई। हम लोगों को जमीन पसंद आ गई तो यहां पर सब्जी की खेती को तैयार हो गए। बताया कि यहां पर एक जज साहब की सबसे अधिक जमीन करीब 40 एकड़ है। उनके अलावा राधेश्याम दुबे, दिग्विजय दुबे की जमीन पर भी खेती कर रहे हैं। जिस जमीन पर सब्जी उगाए हैं, उस पर पहले खर-पतवार थे। उसे निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। चार हजार रुपये प्रति एकड़ में खेत मिला है और खेती में लागत 12 से 13 हजार रुपये प्रति एकड़ आई है।





 

20 किमी दूर से लाए हैं गोबर की खाद

सब्जी की खेती कर रहे याकूब व बशीर ने बताया कि खेत में खर को निकालने के लिए उन लोगों को कई महीने तक जेसीबी चलवानी पड़ी। खर को निकालने के बाद खेतों की काफी जुताई की गई है। खेतों में डालने के लिए 2000 रुपये ट्राली गोबर की खाद लाए। करीब 8 लाख की गोबर की खाद खेतों में डाला है। गोबर की खाद लाने के लिए 20 किलोमीटर तक गांव -गांव जाना पड़ा। तब जाकर यह रेत का मैदान ,जहां केवल खर उगता था आज हर तरफ हरियाली दिख रही है।

दिवाली के बाद से जुटे हैं खेती में
सब्जी की खेती करने वालों ने बताया कि वह लोग दिवाली के बाद यहां आ गए। उसके बाद खेती में जुट गए। होली के आसपास सब्जी निकलने लगती हैं। शुरुआती दौर में रेट ज्यादा रहता है। अधिक सब्जी निकलने पर बाजार नरम हो जाता है। इस साल अधिक पूंजी लगने के फायदा ज्यादा नहीं है। लेकिन, अब मुनाफा होने की उम्मीद है। याकूब ने बताया कि उनकी सब्जी गोरखपुर, कसयां, देवरिया, आजमगढ़, मऊ की मंडी में जाती है।



 

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