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Gorakhpur News: सीनियर डॉक्टर नहीं निभा रहे जिम्मेदारी.. इसलिए जूनियर कर रहे मनमानी

Tue, 23 Apr 2024 05:23 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 23 Apr 2024 05:23 AM IST
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Senior doctors are not fulfilling their responsibilities...that's why juniors are acting arbitrarily.

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मेडिकल कॉलेज के नेहरू अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था जूनियर डॉक्टरों के हाथ
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेहरू अस्पताल में आए दिन हो रहे मारपीट के मामलों की असल वजह सीनियर डॉक्टर का अपनी जिम्मेदारी जूनियर डॉक्टरों के भरोसे छोड़ देना है। एक तरह से अस्पताल का संचालन ही इन्हीं अनुभवहीन जूनियर डॉक्टरों के हाथ में है।
उधर मेडिकल कॉलेज में पहुंचने वाले अधिकांश मरीज जीवन और मौत से जूझ रहे होते हैं, उनके तीमारदार तत्काल बेहतर इलाज की आस में डॉक्टर के पास फरियाद लेकर जाते हैं। ऐसे में जूनियर डॉक्टर और तीमारदार एक दूसरे की परेशानी नहीं समझते और नौबत मारपीट तक पहुंच जाती है।
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प्राचार्य डॉ. रामकुमार जायसवाल का कहना है कि कॉलेज को बदनामी से बचाने के लिए अब वृहद स्तर पर काउंसिलिंग की जरूरत है। इसमें जूनियर डॉक्टरों के साथ-साथ मरीजों के तीमारदारों को भी शामिल करना होगा।
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वार्डों में डरे-सहमे रहते हैं मरीज और तीमारदार
नेहरू अस्पताल का वार्ड नंबर 11 मेडिसिन इमरजेंसी वार्ड है। यहां आए मरीजों को हर दिन फजीहत झेलनी होती है। क्योंकि यहां मरीज को भर्ती कराकर इलाज कराना बड़ा कठिन है। जब मरीज की हालत में सुधार होने लगता है तब यहां से वार्ड नंबर 14, वार्ड नंबर नौ या वार्ड नंबर पांच में भेजा जाता है। कुशीनगर के तरयासुजान निवासी मोहन सोमवार को इस वार्ड में अपने एक रिश्तेदार के साथ आए थे। इनका कहना था कि डाॅक्टरों का व्यवहार ठीक नहीं है। देवरिया से आए श्याम बिहारी का कहना है कि मरीजों और तीमारदारों के साथ जूनियर डॉक्टरों का व्यवहार अच्छा नहीं होता है। लेकिन व्यक्ति मजबूर रहता है इसलिए सब कुछ सुनना और बर्दाश्त करना होता है। कृष्ण कुमार का कहना है कि डाॅक्टर इलाज के दौरान बात-बात पर पर्चा फेंक देते हैं। विरोध करने पर मरीज को जबरन डिस्चार्ज करने लगते हैं। इस डर से चुपचाप रहना ही बेहतर होता है।


वर्जन
मेडिकल कॉलेज आया हर मरीज गंभीर प्रकृति का होता है। डॉक्टर सभी मरीजों को एक जैसा ही उपचार देने का प्रयास करते हैं, लेकिन मरीज के साथ आए लोग कई बार अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं, जिससे विवाद की नौबत आती है। हालांकि, ऐसा नहीं होना चाहिए। डॉक्टर को लोग इसीलिए भगवान मानते हैं कि वह अपने मरीज के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास करता है। अच्छा डॉक्टर बनने के लिए धैर्य सबसे आवश्यक होता है, लेकिन जूनियर डॉक्टरों में इसकी कमी दिख रही है। इसलिए जल्द ही सभी विभागाध्यक्षों के साथ बैठक कर इसका समाधान खोजा जाएगा। इसके अलावा जूनियर डाॅक्टरों की अलग से काउंसिलिंग भी कराई जाएगी, जिससे कि उनके व्यवहार में परिवर्तन हो सके।
- डॉ. रामकुमार जायसवाल, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कॉलेज
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