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शोध : लिवर, किडनी व शरीर की चयापचय प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है गॉल ब्लैडर कैंसर
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गोरखपुर। गॉल ब्लैडर कैंसर केवल पित्ताशय तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह लिवर, किडनी और शरीर की चयापचय (मेटाबॉलिक) प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। गोरखपुर के तीन संस्थानों के संयुक्त शोध में पहली बार यह तथ्य सामने आए हैं। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 286 लोगों का अध्ययन किया। यह शोध स्प्रिंगर नेचर समूह के जर्नल 'डिस्कवर ऑन्कोलॉजी' के मई के अंक में प्रकाशित हुआ है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी के प्रो. शरद मिश्र, उनकी शोधार्थी प्रिया साहनी ने यह शोध किया है। इसमें हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर हॉस्पिटल एवं अनुसंधान केंद्र के चिकित्सकों डॉ. पूनम गुप्ता, डॉ. सीपी अवस्थी एवं डॉ. नरेंद्र बिरबिया और महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की डॉ. अनुपमा ओझा ने सहयोग किया।
शोधार्थी प्रिया साहनी ने बताया कि शोध के केंद्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को रखा गया। कुल 143 गॉलब्लैडर कैंसर मरीज और 143 सामान्य लोगों के रक्त के नमूने लिए गए। कैंसर मरीजों में एलएफटी, केएफटी और सीबीसी बढ़े हुए पाए गए। एजजीपीटी, एसजीओटी, एएलपी, बिलीरुबीन, यूरिया और क्रिएटिनिन का स्तर भी बढ़ा हुआ मिला। मरीजों के प्लेटलेट्स 60 हजार से 2.94 लाख तक पाए गए। महज 16 मरीजों के प्लेटलेट्स ही दो लाख से अधिक मिले।
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हीमोग्लोबीन कम, डब्ल्यूबीसी अधिक
प्रो. शरद मिश्र ने बताया कि कुछ गॉलब्लैडर कैंसर मरीजों में हीमोग्लोबिन एवं लिम्फोसाइट्स की मात्रा कम, जबकि श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्ल्यूबीसी) एवं न्यूट्रोफिल्स की संख्या अधिक पाई गई। यह शरीर में लगातार सूजन, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी व कैंसर के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
बढ़ती उम्र के साथ कैंसर के खतरे भी अधिक
शोध में अलग-अलग आयु वर्ग के पुरुष व महिलाओं को शामिल किया गया। ज्यादातर मरीज 41 से 70 वर्ष की आयु के थे। इनमें 68.53 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों के 81.82 प्रतिशत मरीज रहे। शोध में मरीजों के व्यवसाय, स्मोकिंग व शराब पीने की लत, जलापूर्ति जैसे विषयों को भी रखा गया।
शुरुआती पहचान व बेहतर उपचार रणनीति बन सकेगी
शोध से यह भी संकेत मिला कि गॉलब्लैडर कैंसर में शरीर के भीतर सूजन, लिवर क्षति, पित्त अवरोध, किडनी पर प्रभाव व प्रतिरक्षा तंत्र में बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इससे भविष्य में कैंसर की शुरुआती पहचान और बेहतर उपचार रणनीति विकसित करने में सहायता मिल सकती है।भविष्य में इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए गॉलब्लैडर कैंसर में जीन स्तर पर होने वाले उत्परिवर्तनों का अध्ययन किया जाएगा।
बोलीं कुलपतिइस संबंध में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि इस शोध से सामान्य रक्त जांच एवं बायोकेमिकल परीक्षणों के माध्यम से भी गॉलब्लैडर कैंसर की गंभीरता का प्रारंभिक अनुमान लगाया जा सकता है। यह अध्ययन स्वास्थ्य जागरूकता, कैंसर अनुसंधान एवं भविष्य की चिकित्सा पद्धतियों को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगा।
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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी के प्रो. शरद मिश्र, उनकी शोधार्थी प्रिया साहनी ने यह शोध किया है। इसमें हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर हॉस्पिटल एवं अनुसंधान केंद्र के चिकित्सकों डॉ. पूनम गुप्ता, डॉ. सीपी अवस्थी एवं डॉ. नरेंद्र बिरबिया और महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की डॉ. अनुपमा ओझा ने सहयोग किया।
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शोधार्थी प्रिया साहनी ने बताया कि शोध के केंद्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को रखा गया। कुल 143 गॉलब्लैडर कैंसर मरीज और 143 सामान्य लोगों के रक्त के नमूने लिए गए। कैंसर मरीजों में एलएफटी, केएफटी और सीबीसी बढ़े हुए पाए गए। एजजीपीटी, एसजीओटी, एएलपी, बिलीरुबीन, यूरिया और क्रिएटिनिन का स्तर भी बढ़ा हुआ मिला। मरीजों के प्लेटलेट्स 60 हजार से 2.94 लाख तक पाए गए। महज 16 मरीजों के प्लेटलेट्स ही दो लाख से अधिक मिले।
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हीमोग्लोबीन कम, डब्ल्यूबीसी अधिक
प्रो. शरद मिश्र ने बताया कि कुछ गॉलब्लैडर कैंसर मरीजों में हीमोग्लोबिन एवं लिम्फोसाइट्स की मात्रा कम, जबकि श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्ल्यूबीसी) एवं न्यूट्रोफिल्स की संख्या अधिक पाई गई। यह शरीर में लगातार सूजन, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी व कैंसर के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
बढ़ती उम्र के साथ कैंसर के खतरे भी अधिक
शोध में अलग-अलग आयु वर्ग के पुरुष व महिलाओं को शामिल किया गया। ज्यादातर मरीज 41 से 70 वर्ष की आयु के थे। इनमें 68.53 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों के 81.82 प्रतिशत मरीज रहे। शोध में मरीजों के व्यवसाय, स्मोकिंग व शराब पीने की लत, जलापूर्ति जैसे विषयों को भी रखा गया।
शुरुआती पहचान व बेहतर उपचार रणनीति बन सकेगी
शोध से यह भी संकेत मिला कि गॉलब्लैडर कैंसर में शरीर के भीतर सूजन, लिवर क्षति, पित्त अवरोध, किडनी पर प्रभाव व प्रतिरक्षा तंत्र में बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इससे भविष्य में कैंसर की शुरुआती पहचान और बेहतर उपचार रणनीति विकसित करने में सहायता मिल सकती है।भविष्य में इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए गॉलब्लैडर कैंसर में जीन स्तर पर होने वाले उत्परिवर्तनों का अध्ययन किया जाएगा।
बोलीं कुलपतिइस संबंध में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि इस शोध से सामान्य रक्त जांच एवं बायोकेमिकल परीक्षणों के माध्यम से भी गॉलब्लैडर कैंसर की गंभीरता का प्रारंभिक अनुमान लगाया जा सकता है। यह अध्ययन स्वास्थ्य जागरूकता, कैंसर अनुसंधान एवं भविष्य की चिकित्सा पद्धतियों को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगा।