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गोरखपुर विश्वविद्यालय : प्रो. राजवंत राव बने अधिष्ठाता कला संकाय
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प्रो. राजवंत राव, डीडीयू।
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के सीनियर प्रोफेसर राजवंत राव को अधिष्ठाता कला संकाय बनाया गया है। वह मंगलवार को कार्यभार ग्रहण करेंगे।
प्रो. राजवंत को प्रो. कीर्ति पांडेय के सेवानिवृत्त होने पर वरिष्ठता के चक्रानुक्रम में यह अहम जिम्मेदारी दी गई है। इससे पहले प्रो. कीर्ति पांडेय के उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज की अध्यक्ष बनने पर भी प्रो. राव अधिष्ठाता बनाए गए थे। वह करीब एक साल तक अधिष्ठाता रहे थे। प्रो. कीर्ति के आयोग से वापस आने पर उन्होंने स्वतः ही पद छोड़ दिया था।
परीक्षा व्यवस्था में बदलाव का जाता है श्रेय
डीडीयू व कॉलेजों में परीक्षा व्यवस्था में बदलाव से संबंधी दो कार्यों का श्रेय प्रो. राजवंत राव को ही जाता है। बीए की परीक्षाएं पहले करीब डेढ़ महीने तक चलती थीं। प्रो. राव ने इसे छह ग्रुप में विभाजित करने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद अब परीक्षाएं दो हफ्ते में ही समाप्त हो जाती हैं। पहले गैर प्रायोगिक विषयों की मौखिक परीक्षा में बाह्य परीक्षक जाते थे। अक्सर परीक्षक की ओर से ''फरमाइश'' के आरोपों की खबरें आती रहती थीं। प्रो. राव ने डीन के रूप में मौखिक परीक्षाओं से बाह्य परीक्षक की भूमिका खत्म करने की सिफारिश की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था।
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यूपीपीएससी के भी रहे हैं सदस्य
प्रो. राव उप्र लोक सेवा आयोग के भी सदस्य रहे हैं। इसके अलावा वह देश की 10 से अधिक अकादमिक समितियों के सदस्य हैं। इनमें इंडियन न्यूमेस्मेटिक सोसाइटी, भारतीय इतिहास संकलन समिति, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और द हिस्ट्री एंड कल्चर सोसाइटी प्रमुख हैं। वह मौजूद समय में अयोध्या अध्ययन केंद्र के निदेशक भी हैं।
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प्रो. राजवंत को प्रो. कीर्ति पांडेय के सेवानिवृत्त होने पर वरिष्ठता के चक्रानुक्रम में यह अहम जिम्मेदारी दी गई है। इससे पहले प्रो. कीर्ति पांडेय के उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज की अध्यक्ष बनने पर भी प्रो. राव अधिष्ठाता बनाए गए थे। वह करीब एक साल तक अधिष्ठाता रहे थे। प्रो. कीर्ति के आयोग से वापस आने पर उन्होंने स्वतः ही पद छोड़ दिया था।
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परीक्षा व्यवस्था में बदलाव का जाता है श्रेय
डीडीयू व कॉलेजों में परीक्षा व्यवस्था में बदलाव से संबंधी दो कार्यों का श्रेय प्रो. राजवंत राव को ही जाता है। बीए की परीक्षाएं पहले करीब डेढ़ महीने तक चलती थीं। प्रो. राव ने इसे छह ग्रुप में विभाजित करने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद अब परीक्षाएं दो हफ्ते में ही समाप्त हो जाती हैं। पहले गैर प्रायोगिक विषयों की मौखिक परीक्षा में बाह्य परीक्षक जाते थे। अक्सर परीक्षक की ओर से ''फरमाइश'' के आरोपों की खबरें आती रहती थीं। प्रो. राव ने डीन के रूप में मौखिक परीक्षाओं से बाह्य परीक्षक की भूमिका खत्म करने की सिफारिश की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था।
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यूपीपीएससी के भी रहे हैं सदस्य
प्रो. राव उप्र लोक सेवा आयोग के भी सदस्य रहे हैं। इसके अलावा वह देश की 10 से अधिक अकादमिक समितियों के सदस्य हैं। इनमें इंडियन न्यूमेस्मेटिक सोसाइटी, भारतीय इतिहास संकलन समिति, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और द हिस्ट्री एंड कल्चर सोसाइटी प्रमुख हैं। वह मौजूद समय में अयोध्या अध्ययन केंद्र के निदेशक भी हैं।