नंदिनी गाय ने झाड़ियों के बीच चढ़ाया दूध तो निकला था पंचमुखी शिवलिंग, इस राजा से जुड़ा है इसका इतिहास
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उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर इंडो नेपाल बॉर्डर से सटे इटहिया का शिव मंदिर मिनी बाबा धाम के नाम से विख्यात है। यहां दर्शन के लिए नेपाल, बिहार समेत अन्य स्थानों से लोग आते हैं।
पंचमुखी शिवलिंग के इतिहास के संबंध में मंदिर के मुख्य पुजारी ध्यान गिरी बताते हैं कि इस पंचमुखी शिवलिंग के प्रादुर्भाव की कहानी निचलौल स्टेट के राजा बृषभसेन से जुड़ी हैं। राजा बृषभसेन प्रतापी प्रजावत्सल न्याय प्रिय राजा थे। वह भगवान शंकर के अनन्य भक्त थे। उनके गौशाला में एक नंदिनी नाम की गाय थी जिसे राजा बहुत मानते थे।
सुबह शाम उस गाय का दर्शन कर उसके दूध का सेवन करते थे। उस समय ईटाहिया सहित यह समूचा क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था। नंदिनी गाय उसी जंगल में घास चरती थी। कुछ दिन के बाद नंदिनी ने दूध देना बंद कर दिया और अपना दुध जंगल के घनी झाड़ियों में जमीन पर चढ़ाने लगी।
जब राजा बृषभसेन को यह जानकारी हुई तो उन्होंने इस स्थान पर खुदाई कराई। वहां एक पंचमुखी शिवलिंग मिला। जिसे देखकर राजा भाव विहवल हो गए तथा पंचमुखी शिवलिंग का राजा प्रतिदिन पूजा अर्चना करने लगे। जिससे राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम रत्नसेन पड़ा।
वर्ष 1968 में बना शिव मंदिर
राजा बृषभसेन की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रत्नसेन निचलौल के राजा हुए तथा अपने पिता की तरह अपनी पत्नी स्वर्ण रेखा के साथ प्रति दिन पंचमुखी शिवलिंग की पूजा अर्चना किया करते थे। राजा रत्नसेन के शासनकाल में एक दिन कुछ चोर रात्रि में चोरी के उद्देश्य से राज्य में प्रवेश कर रहे थे।
जब वे पंचमुखी शिव मंदिर के सामने पहुंचे तो मंदिर के अंदर से आवाज आई गांव वालों जागो चोर चोरी करने गांव में आ गए हैं। इससे गांव के लोग जग गए और चोर भाग गए।
मंदिर से सटे डुमरी निवासी पंडित अनिरुद्ध तिवारी व मुन्ना गिरी बताते हैं कि जिस आम के जड़ से पंचमुखी भगवान शिव का प्रादुर्भाव हुआ है। वह अपने आप में एक अनोखा वृक्ष था। बुजुर्गो के अनुसार एक बार एक बंदर उस आम के पेड़ पर चढ़ गया परंतु बहुत प्रयास के बाद भी नीचे नहीं उतर सका।
भूख प्यास से उसकी मृत्यु हो गई। जहां बंदर मरा था। वहां हनुमान मंदिर बनाया गया है। आम का वृक्ष गिर जाने के बाद पंचमुखी शिवलिंग पर गड़ौरा निवासी स्वर्गीय चंद्रशेखर मिश्र ने 1968-69 में मंदिर का निर्माण कराया।