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डॉक्टर की सलाह: गर्भावस्था के दौरान खानपान पर दें अधिक ध्यान, छोटी सी लापरवाही पड़ सकती है भारी
Mon, 15 Nov 2021 02:23 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 15 Nov 2021 02:23 PM IST
सार
डॉ. सीमा शाही ने बताया कि गर्भावस्था में महिलाओं को अगर शुगर हो जाता है तो वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इससे मां के साथ बच्चे की जान को खतरा रहता है।
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कांफ्रेंस के समापन पर मौजूद डॉक्टर।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुरहिता करीम का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपने खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। गर्भावस्था में खून की कमी होने से महिलाएं कुपोषण का शिकार हो जाती हैं। इस वजह से मां के साथ बच्चे को भी खतरा रहता है। डॉ. सुरहिता आइसोपार्ब द्वारा आयोजित मिड टर्म कांफ्रेंस के दूसरे दिन रविवार को स्टीलबर्थ पर व्याख्यान दे रहीं थीं।
कांफ्रेंस में डॉ. सीमा शाही ने बताया कि गर्भावस्था में महिलाओं को अगर शुगर हो जाता है तो वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इससे मां के साथ बच्चे की जान को खतरा रहता है। शुगर की वजह से गर्भपात, समय से पहले प्रसव और संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। सिजेरियन डिलीवरी की आशंका बढ़ जाती है।
डॉ. अमृता सरकारी जयपुरियार ने बताया कि गर्भावस्था की शुरुआती में जांच से पता लग सकता है कि गर्भवती को बाद में अधिक रक्तचाप होने की आशंका है या नहीं। जांच में महिला हाई रिस्क में आती हैं तो पहले से दवा दे दी जाती है। इससे बीपी नियंत्रित रखा जाता है। अगर ब्लड प्रेशर नियंत्रित हो जाता है तो मां और बच्चे को खतरा कम हो जाता है। अधिक रक्तस्राव से हेल्प सिंड्रोम का खतरा भी होता है। सही समय पर इलाज से इसे दूर किया जा सकता है।
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डॉ दीप्ती चतुर्वेदी ने बताया कि गर्भावस्था में कई तरह के वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकते हैं। इस वजह से भी बच्चे का पेट में या डिलीवरी के बाद निधन हो सकता है। ऐसे इन्फेक्शन में टॉर्च, सिफीलिस, जीका वायरस, पर्वो वायरस, हरपीज वायरस, चिकन पॉक्स शामिल हैं। गर्भावस्था में इंफेक्शन होने से मां और शिशु दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
कार्यक्रम में डॉ अरुल कुमारन, डॉ पीसी महापात्रा, डॉ मंदाकिनी, डॉ सुरेश, डॉ मुरलीधर पाई, डॉ सविता, डॉ सरिता अग्रवाल, डॉ किरण पांडेय, डॉ साधना गुप्ता, डॉ रीना श्रीवास्तव, डॉ मधु गुलाटी, डॉ अरुणा छपरिया, डॉ राजेश गुप्ता, डॉ सुनील कमानी, डॉ मधुबाला एवं डॉ अनुभा गुप्ता भी मौजूद रहीं।
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कांफ्रेंस में डॉ. सीमा शाही ने बताया कि गर्भावस्था में महिलाओं को अगर शुगर हो जाता है तो वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इससे मां के साथ बच्चे की जान को खतरा रहता है। शुगर की वजह से गर्भपात, समय से पहले प्रसव और संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। सिजेरियन डिलीवरी की आशंका बढ़ जाती है।
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डॉ. अमृता सरकारी जयपुरियार ने बताया कि गर्भावस्था की शुरुआती में जांच से पता लग सकता है कि गर्भवती को बाद में अधिक रक्तचाप होने की आशंका है या नहीं। जांच में महिला हाई रिस्क में आती हैं तो पहले से दवा दे दी जाती है। इससे बीपी नियंत्रित रखा जाता है। अगर ब्लड प्रेशर नियंत्रित हो जाता है तो मां और बच्चे को खतरा कम हो जाता है। अधिक रक्तस्राव से हेल्प सिंड्रोम का खतरा भी होता है। सही समय पर इलाज से इसे दूर किया जा सकता है।
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डॉ दीप्ती चतुर्वेदी ने बताया कि गर्भावस्था में कई तरह के वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकते हैं। इस वजह से भी बच्चे का पेट में या डिलीवरी के बाद निधन हो सकता है। ऐसे इन्फेक्शन में टॉर्च, सिफीलिस, जीका वायरस, पर्वो वायरस, हरपीज वायरस, चिकन पॉक्स शामिल हैं। गर्भावस्था में इंफेक्शन होने से मां और शिशु दोनों पर प्रभाव पड़ता है।
कार्यक्रम में डॉ अरुल कुमारन, डॉ पीसी महापात्रा, डॉ मंदाकिनी, डॉ सुरेश, डॉ मुरलीधर पाई, डॉ सविता, डॉ सरिता अग्रवाल, डॉ किरण पांडेय, डॉ साधना गुप्ता, डॉ रीना श्रीवास्तव, डॉ मधु गुलाटी, डॉ अरुणा छपरिया, डॉ राजेश गुप्ता, डॉ सुनील कमानी, डॉ मधुबाला एवं डॉ अनुभा गुप्ता भी मौजूद रहीं।
मां का मोटापा जज्चा-बच्चा के लिए खतरनाक
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की पूर्व विभागध्यक्ष डॉ रीना श्रीवास्तव ने बताया कि गर्भवती का कुपोषित होना या मोटा होना दोनों बेहद खतरनाक है। यह बच्चे और मां के लिए सही नहीं है। पूर्वांचल में करीब 22 फीसदी से अधिक गर्भवती कुपोषित होती हैं। इनका बीएमआई 18.5 से कम होता है। खतरनाक यह है कि ऐसी महिलाओं के बच्चे बड़े होने पर जल्दी बीमार होते हैं। उनमें मेटाबॉलिक व न्यूरोलॉजिकल दिक्कत हो सकती है।
प्री-मेच्योर डिलीवरी का खतरा ज्यादा
डॉ नूतन जीना ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान या उससे पहले मां को पोषण युक्त आहार बहुत जरूरी है। अगर मां स्वस्थ रहेगी तो बच्चे का शारीरिक विकास अच्छा होगा। अगर मां मोटी होती है तो भी खतरा रहता है। मोटापे की वजह से महिलाओं में बीपी, थायराइड, डायबिटीज की समस्या हो सकती है। कारण सामान्य प्रसव के चांस बेहद कम हो जाते हैं। साथ ही समय से पहले प्रसव का खतरा भी रहता है।
मां का आहार सबसे जरूरी
बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्त्री एवं प्रसूति रोग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ राधा जीना ने बताया कि मां को मिलने वाला आहार बच्चे की सेहत का सबसे बड़ा आधार है। गर्भावस्था से पहले ही पर्याप्त पोषण आहार जरूरी है। इससे गर्भावस्था के दौरान बच्चे के विकास में बाधा नहीं आती है। साथ ही बच्चे में जन्मजात विकृति जैसे कटे ओठ-तालू, रीढ़ की हड्डी की दिक्कत जैसी बीमारियां नहीं होती। मां के पोषण का असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ता है।
पहली तिमाही में 10 फीसदी का हो जाता है गर्भपात
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ मीनाक्षी गुप्ता ने बताया कि पूर्वांचल में पहली तिमाही में गर्भपात के मामले बढ़ते जा रहे हैं। पहली तिमाही में 10 फीसदी गर्भवती का गर्भपात हो जाता है। इनमें से एक तिहाई गर्भपात की वजह पता भी नहीं होता। दो तिहाई मामलों में मां की शारीरिक स्थिति या गर्भस्थ भ्रूण की विकृति के कारण गर्भपात होने की बात सामने आ चुकी है। इससे बचाने का उपाय है कि लोग मां बनने से तीन माह पहले प्री-प्रेगनेंसी चेकअप कराएं।
प्री-मेच्योर डिलीवरी का खतरा ज्यादा
डॉ नूतन जीना ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान या उससे पहले मां को पोषण युक्त आहार बहुत जरूरी है। अगर मां स्वस्थ रहेगी तो बच्चे का शारीरिक विकास अच्छा होगा। अगर मां मोटी होती है तो भी खतरा रहता है। मोटापे की वजह से महिलाओं में बीपी, थायराइड, डायबिटीज की समस्या हो सकती है। कारण सामान्य प्रसव के चांस बेहद कम हो जाते हैं। साथ ही समय से पहले प्रसव का खतरा भी रहता है।
मां का आहार सबसे जरूरी
बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्त्री एवं प्रसूति रोग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ राधा जीना ने बताया कि मां को मिलने वाला आहार बच्चे की सेहत का सबसे बड़ा आधार है। गर्भावस्था से पहले ही पर्याप्त पोषण आहार जरूरी है। इससे गर्भावस्था के दौरान बच्चे के विकास में बाधा नहीं आती है। साथ ही बच्चे में जन्मजात विकृति जैसे कटे ओठ-तालू, रीढ़ की हड्डी की दिक्कत जैसी बीमारियां नहीं होती। मां के पोषण का असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ता है।
पहली तिमाही में 10 फीसदी का हो जाता है गर्भपात
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ मीनाक्षी गुप्ता ने बताया कि पूर्वांचल में पहली तिमाही में गर्भपात के मामले बढ़ते जा रहे हैं। पहली तिमाही में 10 फीसदी गर्भवती का गर्भपात हो जाता है। इनमें से एक तिहाई गर्भपात की वजह पता भी नहीं होता। दो तिहाई मामलों में मां की शारीरिक स्थिति या गर्भस्थ भ्रूण की विकृति के कारण गर्भपात होने की बात सामने आ चुकी है। इससे बचाने का उपाय है कि लोग मां बनने से तीन माह पहले प्री-प्रेगनेंसी चेकअप कराएं।