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Gorakhpur News: सूख रही आमी नदी को है भगीरथ की तलाश- भगवान ने की थी यहां साधना, लेकिन अब सूखने की कगार पर

Sat, 27 Apr 2024 11:35 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Sat, 27 Apr 2024 11:35 AM IST
सार

राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने दुख के कारणों की खोज में जब अपने राजमहल को छोड़ा तो कोपिया नामक जगह पर अनोमा नदी (वर्तमान आमी नदी) के किनारे पहुंचे। नदी में स्नान कर राजसी वस्त्र त्याग दिया और संन्यासी का रूप धारण कर पैदल चल दिए।

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The drying Aami river is in Gorakhpur search of any one Bhagiratha
आमी नदी का हाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भगवान बुद्ध ने जिस पवित्र नदी के किनारे अपने वस्त्र त्यागे थे, संत कबीर ने जिसके किनारे तपस्या की थी, वह आमी नदी आज प्रदूषित ही नहीं सूखने भी लगी है। नदी में जो पानी प्रवाहित हो रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा खलीलाबाद नगर पालिका और मगहर नगर पंचायत के अलावा विभिन्न फैक्टरियों से निकला गंदा पानी है।

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स्थिति यह है कि बरसात में जिस नदी के चलते गोरखपुर जिले में बाढ़ आती है, गर्मी में उसी नदी में पानी नहीं दिख रहा। नदी में प्रवाहित जल के शोधन के अलावा इसे अविरल बनाए रखने के लिए भी नए जल स्रोत तलाशने की जरूरत है।
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आमी नदी पर कई शोध कर चुके प्रो. गोविंद पांडेय बताते हैं कि आमी का मतलब है जिसका पानी आम जैसा मीठा हो। बौद्धकाल में इसका उल्लेख अनोमा नदी के तौर पर किया गया।
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यह राप्ती की सहायक नदी है। सिद्धार्थनगर के सिकहरा ताल से निकलकर संतकबीरनगर के जिला मुख्यालय खलीलाबाद, मगहर होते हुए गोरखपुर के सहजनवां तहसील से होते हुए सोहगौरा गांव के सामने फिर राप्ती में ही मिल जाती है।

करीब 100 किलोमीटर इस लंबी यात्रा में नदी के किनारे लगभग 200 गांव स्थित हैं। बौद्धकालीन साहित्यों में इस बात का उल्लेख है कि राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने दुख के कारणों की खोज में जब अपने राजमहल को छोड़ा तो कोपिया नामक जगह पर अनोमा नदी (वर्तमान आमी नदी) के किनारे पहुंचे।

नदी में स्नान कर राजसी वस्त्र त्याग दिया और संन्यासी का रूप धारण कर पैदल चल दिए। संतकबीर भी जब वाराणसी छोड़कर मगहर आए तो आमी नदी प्रवाहमान थी और इसी के किनारे उन्होंने अपनी तपोस्थली बनाई। पुराने समय में इस नदी में मछली पालन बड़े पैमाने पर होता रहा है।

इसलिए नदी के आसपास के गांवाें में मछुआ समुदाय के लोगाें की संख्या भी अधिक है, लेकिन अब यह नदी सूखने लगी है। वर्तमान में नदी में इतना भी पानी नहीं है कि उसमें पड़े प्लास्टिक व अन्य कचरा भी बहकर आगे बढ़ सके। मगहर कबीर चौरा के सामने नदी में पानी बहुत कम बचा है। खलीलाबाद से मगहर के बीच एक पतली रेखा जैसी दिख रही है। यही हाल मगहर से गीडा के बीच भी है।

इस नदी के पानी की गुणवत्ता पर शोध कर चुके प्रमोद कुमार विश्वकर्मा बताते हैं कि नदी में प्रवाहित दूषित पानी के चलते इसका पारिस्थितिकी तंत्र तो बिगड़ा ही, आसपास के गांवों का भूगर्भ जल भी दूषित हो गया।

प्रो. गोविंद पांडेय बताते हैं कि सिकहरा ताल से बालूशासन तक नदी का पानी गुणवत्ता ए श्रेणी के आसपास रहती है, लेकिन मगहर तक आते-आते डी श्रेणी और उससे नीचे जाने पर ई श्रेणी से भी निचले स्तर पर चली जाती है। ए श्रेणी का पानी शोधन के बाद पीने लायक होता है, जबकि ई श्रेणी का पानी जलीय जंतुओं के लिए भी उपयुक्त नहीं होता।

एनजीटी ने दिया था पौधरोपण व जलाशय बढ़ाने का सुझाव
इस नदी की पवित्रता और अविरलता के लिए लंबे समय तक आंदोलन की अगुवाई करने वाले विश्वविजय सिंह बताते हैं कि वर्ष 2018-19 में एनजीटी की तरफ से डीपी सिंह ने नदी क्षेत्र का निरीक्षण किया था। उन्होंने नदी के हालात पर चिंता जताते हुए इसमें पूरे साल पानी के प्रवाह को बनाए रखने के लिए नमामि गंगे योजना में शामिल करने समेत कुछ विशेष प्रयास करने की सलाह दी थी।

इसमें सबसे पहला सुझाव यही था कि नदी के किनारे बड़े पौधे लगाए जाएं। इसके अलावा कैचमेंट एरिया में तालाब, कुओं और अन्य जलस्रोत को जीवित रखने का प्रयास किया जाए। साथ ही जहां कहीं से भी नदी में अपशिष्ट डाला जा रहा हो, उसकी जांच कर तत्काल रोक लगाई जाए।

शहरी और फैक्टरियों के प्रदूषित पानी को शोधन के बाद भी नदी में न डाला जाए। शोधन के बाद पानी का प्रयोग सिंचाई समेत अन्य कार्यों में लिया जाए, लेकिन इस पर जमीनी स्तर पर कोई कार्य नहीं हुआ।

अब नाले जैसी दिखने लगी है नदी
खलीलाबाद, मगहर और गीडा क्षेत्र में आमी नदी अब बरसाती नाला बन चुकी है। नदी में प्रवाहित पानी से अधिक नालों और फैक्टरियों का कचरा दिखता है। बरसात के दिनों में नदी का गंदा पानी फैलने से किसानों की हजारों एकड़ फसल नष्ट होती है। अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस नदी का प्रवाह स्वयं ही समाप्त हो जाएगा।


इसलिए अगर नदी को जीवित रखना है तो इसके लिए जलस्रोत भी तलाशने होंगे। इसके लिए नदी के किनारे पौधरोपण से लेकर इसके कैचमेंट एरिया में स्थित जलाशयों की हालत भी सुधारनी होगी।

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