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चलता रहा गोलमाल: अपना ही 84 लाख रुपये नहीं वसूल सका गोरखपुर नगर निगम, सब चुप्पी साधे रहे

Mon, 01 Jan 2024 01:56 PM IST
vivek shukla रोहित सिंह, गोरखपुर।
रोहित सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 01 Jan 2024 01:56 PM IST
सार

यूनिपोल और शेल्टर के काम से जुड़े सूत्रों ने बताया कि 2007 से लेकर 2017-18 तक इस खंड में दूसरे अधिकारी तैनात थे। इसका जिम्मा भी दूसरे अधिकारियों के पास था। वर्तमान में तैनात कर्मचारियों की लापरवाही यह थी कि उन्होंने तत्कालीन फाइलों को स्थानांतरण के समय रिसीव नहीं किया था।

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Gorakhpur Municipal Corporation could not recover its own Rs 84 lakh
गोरखपुर नगर निगम। - फोटो : amar ujala

विस्तार

नगर निगम क्षेत्र में 2015 से 2020 तक मनमाने तरीके से यूनिपोल लगा और इसका रेंट भी निगम के सरकारी खाते में जमा नहीं करवाया गया। इसकी पुष्टि खुद नगर निगम ने एक आरटीआई के जवाब में दिया है। निगम ने माना है कि फर्म एनएनआई ने लगाए गए यूनिपोल के सापेक्ष में 83,95,921 रुपये का किराया जमा नहीं किया। शनिवार को नगर आयुक्त ने दूसरे मामले में गैंट्री गेट, यूनिपोल और बस शेल्टर की फाइल गायब होने पर तीन लिपिकों को निलंबित कर दिया था।

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वर्ष 2015 में सहायक नगर आयुक्त स्वर्ण सिंह की निगरानी में नगर निगम की गाड़ियों में जीपीएस लगाने और उसके बदले शहर में यूनिपोल लगाए जाने के लिए निविदा निकाली गई थी। उस समय मुख्य लेखाधिकारी बृजेश सिंह थे। उन्हीं के पास यूनिपोल की निविदा दिए जाने का प्रभार था।
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निकाली गई निविदा में शर्त थी कि नगर निगम की गाड़ियों में जीपीएस लगाया जाएगा। इसे लगाने वाली फर्म को शहर में बिना प्रीमियम जमा किए यूनिपोल दे दिए जाएंगे। फर्म को यूनिपोल का मासिक किराया नगर निगम में जमा करना होगा। उस समय इस निविदा के लिए पांच लोगों ने आवेदन किया था और इस आवेदन में कानपुर की फर्म एएनआई को 42 यूनिपोल का टेंडर मिल गया था।

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नगर निगम के सूत्रों के मुताबिक, फर्म की तरफ से यूनिपोल लगाए गए और इसका रेंट खुद लिया गया, लेकिन नगर निगम में जमा नहीं किया गया। ये सिलसिला वर्ष 2015 से ही लगातार चलता रहा, लेकिन किसी की नजर फर्म के लगाए यूनिपोल और उसके जमा किए जाने वाले रेंट पर नहीं गई।

इसी बीच सिविल कोर्ट के अधिवक्ता नितिन शाही ने नगर निगम से आरटीआई के जरिये जवाब मांगा। पूछा कि जीपीएस से संबंधित जितने यूनिपोल दिए हैं, उस फर्म का कितना बकाया है। नगर निगम ने जवाब देकर इस धनरशि की जानकारी दी। तभी से ये धनराशि लंबित चली आ रही है। इसी बीच 11 गैंट्री गेट का एक नया मामला सामने आ गया। नगर आयुक्त ने कार्रवाई भी कर दी। संवाद

 

वर्ष 2007 में बोर्ड की बैठक में भी उठा था मामला
वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी प्रदेश की सत्ता में थी। इस दौरान शहर में लगाए गए 11 गैंट्री गेट, यूनिपोल और बस शेल्टर का जिम्मा दो फर्मों को मिला था। तत्कालीन उपसभापति राम दयाल ने बताया कि इस मामले में तत्कालीन पार्षदों ने भी शिकायत की और मुद्दा बोर्ड में उठाया था। बताया कि फर्मों की तरफ से गैंट्री गेट के अलावा खुद की होर्डिंग लगा दी गई है। बोर्ड में कार्रवाई की बात उठी, लेकिन अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की।

फाइल नहीं दिखा पाए लिपिक
यूनिपोल और शेल्टर के काम से जुड़े सूत्रों ने बताया कि 2007 से लेकर 2017-18 तक इस खंड में दूसरे अधिकारी तैनात थे। इसका जिम्मा भी दूसरे अधिकारियों के पास था। वर्तमान में तैनात कर्मचारियों की लापरवाही यह थी कि उन्होंने तत्कालीन फाइलों को स्थानांतरण के समय रिसीव नहीं किया था। अब जब जांच चली और पूछताछ हुई तो वे फाइल ही नहीं दिखा सके। सूत्र बताते हैं कि इस फाइल से जुड़े जिम्मेदार अपनी मौजूदगी में इन फाइलों को चलवाते रहे, लेकिन रिकार्ड की जांच नहीं की।

 

स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो तो कई जिम्मेदार भी नपेंगे
जिस मामले में तीन लिपिकों पर कार्रवाई हुई है, अगर इसकी जांच स्वतंत्र एजेंसी कर दी जाए तो और बड़ा गबन सामने आ सकता है। फाइल नहीं दिखा पाने के दोषियों पर तो कार्रवाई कर दी गई, लेकिन वर्ष 2007 से लेकर 2023 तक चले इस खेल में कई आवंटन, प्रपत्रों की जांच, फर्म के खातों का संकलन, निविदा के नियमों का पालन, ये सब जिनके जिम्मे था, उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

मामले की जानकारी नहीं है। फिर भी अगर ऐसा हुआ है, तो ये बेहद गलत है। नगर आयुक्त से पूरे मामले की जांच करवाई जाएगी। फर्म और संबंधित अधिकारियों की कार्य प्रणाली की जांच नगर आयुक्त से करवाएंगे। जो भी दोषी होगा उसपर सख्त कार्रवाई की जाएगी। फर्मों की कार्य प्रणाली की जांच का जिम्मा और निगरानी संबंधित अधिकारियों की ही होती है। - अमृत अभिजात, प्रमुख सचिव, नगर विकास।

इस मामले में आर्बिट्रेशन चल रहा है। मेल और व्हाट्सएप पर पता चला कि हम पर 84 लाख रुपये बकाया और 20 लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया है। जबकि, हमारा पक्ष सुना ही नहीं गया है।- विशाल बाजपेई, निदेशक मेसर्स एनएनआई प्रमोशंस।

 
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