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Gorakhpur News: देव दिवाली आज, श्रद्धालु लगाएंगे आस्था की डुबकी
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- देव दिवाली पर शहर में आयोजित होंगे कार्यक्रम
- राप्ती नदी के रामघाट में उमड़ेंगे श्रद्धालु
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व सोमवार को मनाया जाएगा। श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में आस्था की डुबकी लगाएंगे। इसी दिन देव दिवाली भी मनाई जाएगी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्नान और दान से मनोवांछित फल मिलता है।
वाराणसी के प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार, इस दिन पूर्णिमा तिथि का मान दिन में दो बजकर 17 मिनट तक है। इस दिन कृतिका नक्षत्र भी दिन में एक बजकर 52 मिनट, पश्चात रोहिणी नश्रत्र, शिव योग और सुस्थिर नामक औदायिक योग है। चंद्रमा की स्थिति वृषभ राशि पर और चंद्रमा अपने उच्च स्थिति में रहेंगे। वहीं, 26 नवंबर को शाम से ही पूर्णिमा तिथि का आरंभ हो रहा है और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि होने से व्रत के लिए 26 नवंबर का ही रहेगा, लेकिन स्नान-दान, तर्पण, जप, तप आदि 27 नवंबर ही मान्य रहेगा।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान और सायंकाल दीप दान का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान कर श्रद्धालु अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। दीप जलाकर ज्ञान और विद्या के प्रकाश का बोध कराते हैं। मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह में किए गए दान, व्रत, तप, जप आदि का लाभ चिरकाल तक बना रहता है। जो श्रद्धालु संपूर्ण माह पूजन-अर्चन न कर सका हो तो कार्तिक मास के आखिरी दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करता है तो उसके लिए काफी फलदायी होता है।
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ऐसे करें पूजन
पंडित जोखन पांडेय शास्त्री के अनुसार, कार्तिक मास को प्रात:काल पवित्र नदी या गंगा को स्नान कर विधिपूर्वक शालिग्राम का पूजन करें। यदि संभव हो तो सत्यनारायण व्रत कथा का भी आयोजन करें। सायंकाल पूर्णिमा को देव मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाएं। गंगा के जल या पवित्र नदियों के जल में या नदी के तट पर दीपदान करें। इस तिथि में ब्राह्मणों को दान देने, भोजन कराने, गरीबों को भिक्षा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का विधान है।
देव दिवाली की है परंपरा
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण दिवाली मनाने पृथ्वी पर आते हैं। मान्यता है कि त्रिपुर के नाश से प्रसन्न होकर देवताओं ने काशी में पंचगंगा घाट पर दीपोत्सव का आयोजन किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, काशी के राजा देवदास ने अपने राज्य में देवताओं को प्रतिबंधित कर दिया था।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदलकर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर गंगा स्नान और अर्चन किए। जब यह बात राजा देवदास को मालूम हुई तो उन्होंने प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। इस दिन प्रसन्न होकर देवताओं ने दिवाली मनाई।
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- राप्ती नदी के रामघाट में उमड़ेंगे श्रद्धालु
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व सोमवार को मनाया जाएगा। श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में आस्था की डुबकी लगाएंगे। इसी दिन देव दिवाली भी मनाई जाएगी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्नान और दान से मनोवांछित फल मिलता है।
वाराणसी के प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार, इस दिन पूर्णिमा तिथि का मान दिन में दो बजकर 17 मिनट तक है। इस दिन कृतिका नक्षत्र भी दिन में एक बजकर 52 मिनट, पश्चात रोहिणी नश्रत्र, शिव योग और सुस्थिर नामक औदायिक योग है। चंद्रमा की स्थिति वृषभ राशि पर और चंद्रमा अपने उच्च स्थिति में रहेंगे। वहीं, 26 नवंबर को शाम से ही पूर्णिमा तिथि का आरंभ हो रहा है और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि होने से व्रत के लिए 26 नवंबर का ही रहेगा, लेकिन स्नान-दान, तर्पण, जप, तप आदि 27 नवंबर ही मान्य रहेगा।
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कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान और सायंकाल दीप दान का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान कर श्रद्धालु अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। दीप जलाकर ज्ञान और विद्या के प्रकाश का बोध कराते हैं। मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह में किए गए दान, व्रत, तप, जप आदि का लाभ चिरकाल तक बना रहता है। जो श्रद्धालु संपूर्ण माह पूजन-अर्चन न कर सका हो तो कार्तिक मास के आखिरी दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करता है तो उसके लिए काफी फलदायी होता है।
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ऐसे करें पूजन
पंडित जोखन पांडेय शास्त्री के अनुसार, कार्तिक मास को प्रात:काल पवित्र नदी या गंगा को स्नान कर विधिपूर्वक शालिग्राम का पूजन करें। यदि संभव हो तो सत्यनारायण व्रत कथा का भी आयोजन करें। सायंकाल पूर्णिमा को देव मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाएं। गंगा के जल या पवित्र नदियों के जल में या नदी के तट पर दीपदान करें। इस तिथि में ब्राह्मणों को दान देने, भोजन कराने, गरीबों को भिक्षा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का विधान है।
देव दिवाली की है परंपरा
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण दिवाली मनाने पृथ्वी पर आते हैं। मान्यता है कि त्रिपुर के नाश से प्रसन्न होकर देवताओं ने काशी में पंचगंगा घाट पर दीपोत्सव का आयोजन किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, काशी के राजा देवदास ने अपने राज्य में देवताओं को प्रतिबंधित कर दिया था।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदलकर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर गंगा स्नान और अर्चन किए। जब यह बात राजा देवदास को मालूम हुई तो उन्होंने प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। इस दिन प्रसन्न होकर देवताओं ने दिवाली मनाई।