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Exclusive: यूपी के इस जिले में आजादी के बाद कभी नहीं खिला 'कमल', हर बार खिसकी जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी

Thu, 24 Jun 2021 02:53 PM IST
vivek shukla विनोद कुमार तिवारी, देवरिया।
विनोद कुमार तिवारी, देवरिया। Published by: vivek shukla Updated Thu, 24 Jun 2021 02:53 PM IST
सार

जिला परिषद के 47 वर्ष और जिला पंचायत के 26 वर्ष बीत गए कार्यकाल, जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में कांटें की है इस बार लड़ाई, बढ़ी सरगर्मी।

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BJP not never win District Panchayat President after independence in deoria
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : PTI

विस्तार

उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए तीन जुलाई को होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। भाजपा-सपा इस बार आमने-सामने हैं। आजादी के बाद से ही देवरिया में जिला परिषद अध्यक्ष के 47 वर्ष एवं जिला पंचायत अध्यक्ष के 26 वर्ष के कार्यकाल में कई चुनाव हुए लेकिन कभी अध्यक्ष की कुर्सी पर कमल नहीं खिल सका। जबकि कांग्रेस, सपा, बसपा के साथ ऐसा नहीं हैं। उन्हें मौका मिल चुका है। भाजपा सत्ता में भी कई बार रह चुकी हैं फिर भी कमल नहीं खिल सका। सपा इस बार अपनी सीट बरकरार रखना चाहती है। वहीं भाजपा इस बार पद हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।

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जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है। जिला परिषद का पहला चुनाव एक मई 1948 को हुआ था। चंद्रशेखर पांडेय शास्त्री को पहला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। इनके बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रयागध्वज सिंह वर्ष 1961 में अध्यक्ष बने। इसके बाद 15 जुलाई 1963 को मोहम्मद फारूक चिश्ती अध्यक्ष नामित हुए। 25 अक्तूबर 1963 को राजमंगल पांडेय को अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
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इसके बाद प्रयागध्वज सिंह 13 अप्रैल 1969 को दोबारा अध्यक्ष बने। वर्ष 1974 में बिरजानंद सिंह अध्यक्ष बने। वर्ष 1989 में गौकरण सिंह अध्यक्ष बने, उनके कार्यकाल के दौरान एक माह के लिए सुभाष त्रिपाठी को अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। छह अक्तूबर 1994 को गौकरण सिंह दोबारा अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन हो गए और 22 मई 1995 तक रहे। जिला परिषद के वह अंतिम अध्यक्ष रहे।
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वर्ष 1995 में जिला परिषद से हो गया जिला पंचायत

पंचायती राज अधिनियम लागू होने के पहली बार वर्ष 1995 के चुनाव में भाजपा ने भाग्य आजमाया। दमयंती विश्वकर्मा चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं। कांग्रेस की द्रौपदी मल्ल चुनाव जीत गईं। अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद धनंजय राव को अध्यक्ष बनाया गया। इसी दौरान 1999 में  हुए चुनाव में शकुंतला यादव अध्यक्ष बनीं। वर्ष 2000 में हुए चुनाव में कृष्णा जायसवाल चुनाव अध्यक्ष बनीं।

अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद कुछ दिनों के लिए राणाप्रताप सिंह अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हुए। वर्ष 2005 के चुनाव में आनंद कुमार सिंह चुनाव जीते। वर्ष 2010 के चुनाव में तत्कालीन बसपा एमएलसी श्रीनाथ एडवोकेट की पत्नी बालेश्वरी देवी अध्यक्ष चुनी गईं और कार्यकाल पूरा कीं। वर्ष 2015 के चुनाव में सपा के रामप्रवेश यादव अध्यक्ष बने।

क्या कहते हैं जानकार
तीन बार भाजपा अध्यक्ष रहे विजय कुमार दुबे का कहना है कि आजादी के बाद भाजपा मजबूती से कई बार चुनाव लड़ी लेकिन सफलता हासिल नहीं हो सकी। वर्ष 1995 में दमयंती विश्वकर्मा और कृष्णा जायसवाल को बराबर मत प्राप्त हुए थे। लेकिन द्वितीय वरीयता के वोट से कृष्णा जायसवाल चुनाव जीत गईं। वर्ष 2000 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में कृष्णा जायसवाल चुनाव लड़ीं लेकिन तीन मतों से हार गईं।

 इस बार मजबूती से पार्टी चुनाव लड़ रही है। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष धनंजय राव का कहना है कि कांग्रेस, सपा, बसपा का अध्यक्ष पद पर कब्जा रहा है। लेकिन, भाजपा को सफलता नहीं मिल सकी है। उधर, पूर्व सपा जिलाध्यक्ष बाबूलाल यादव का कहना है कि सपा कई बार अध्यक्ष का चुनाव जीती है। इस बार भी सपा ही चुनाव जीतेगी।

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