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अमर उजाला पड़ताल: गोरखपुर में एक रुपये की पर्ची, दो हजार रुपये का इलाज

Tue, 19 Apr 2022 10:59 AM IST
vivek shukla नीरज मिश्रा, गोरखपुर।
नीरज मिश्रा, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 19 Apr 2022 10:59 AM IST
सार

गोरखपुर जिला अस्पताल से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक में मुफ्त इलाज का दावा छलावा साबित हो रहा है। डॉक्टर अस्पताल की पर्ची के साथ एक अलग पर्ची दे रहे हैं। ऐसे में मरीजों की मजबूरी बन रही है कि वे बाहर से दवा लें।

 

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Amar Ujala Investigation One rupee slip two thousand rupees treatment
गोरखपुर जिला अस्पताल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गोरखपुर जिला अस्पताल से लेकर प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त इलाज का दावा छलावा साबित हो रहा है। दावा तो यह है कि एक रुपये की पर्ची में मरीज का मुफ्त में इलाज किया जाएगा। लेकिन, यहां अधिकतर दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। इसी तरह कई प्रकार की जांच भी बाहर से करानी पड़ती है। इन अस्पतालों में मुफ्त इलाज के चक्कर में पहुंचने वाले मरीजों को हजार से दो हजार रुपये तक इजाज पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

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जानकारी के मुताबिक, जिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब दो हजार मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें 60 प्रतिशत मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। पंजीकरण से लेकर डॉक्टर तक पहुंचने में मरीजों को घंटों लग जाते हैं। इसके बाद मरीजों के हाथ आती हैं दो पर्चियां। एक वह जो एक रुपये देकर पंजीकरण खिड़की से बनवाते हैं, दूसरी वह जिसमें डॉक्टर बाहर की दवाएं लिखते हैं।
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बताते हैं कि डॉक्टर दो-तीन दवाएं अस्पताल की लिखते हैं, जबकि एक छोटी पर्ची पर बाहर की कई दवाएं लिख देते हैं। मरीज जब मेडिकल स्टोर पर दवा खरीदने पहुंचता है, तो उसे 500 से 1,000 रुपये तक खर्च करने पड़ जाते हैं। इनमें से अधिकतर मरीज बाहर की पूरी दवाएं खरीद नहीं पाते, क्योंकि उनके पास पैसे नहीं होते हैं। अधिकतर लोग आधी-अधूरी दवा खरीदकर चले जाते हैं।
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इसी तरह, विभिन्न रोगों की जांच के लिए भी मरीजों को पैसे खर्च करने पड़ते हैं। बीमारी की गंभीरता के हिसाब से डॉक्टर जांच कराने के लिए कहते हैं। इनमें से कई जांच मरीजों को बाहर से करानी पड़ जाती है, जोकि काफी महंगी पड़ती है। इस तरह मुफ्त इलाज कई मरीजों को एक ही बार में तकरीबन दो हजार रुपये का पड़ जाता है।

इस तरह समझें मरीजों की परेशानी

केस एक

बाहर से खरीदनी पड़ी 754 रुपये की दवा  
बासमती देवी को चलने में परेशानी है। आर्थो विभाग में दिखाया तो डॉक्टर ने कैल्शियम और दर्द की दवाएं पर्ची पर लिख दीं। एक छोटी पर्ची पर कुछ और दवाएं लिखीं, जो बाहर से खरीदने पर 754 रुपये की पड़ीं। गैस की दवाएं भी बाहर से खरीदनी पड़ी।

केस दो

650 रुपये की दवा बाहर से ली

सलामती के पेट में दर्द था। डॉक्टर को दिखाया तो अल्ट्रासाउंड की सलाह दे दी। अल्ट्रासाउंड जिला अस्पताल में निशुल्क हो गया। पर्ची पर कुछ दवाएं लिखीं, जो जिला अस्पताल से मिल गईं, लेकिन 650 रुपये की दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ी।

केस तीन

दवा पर खर्चे 945 रुपये
गिरने की वजह से दुर्गेश नंद के बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया। डॉक्टर ने कच्चा प्लास्टर किया। पक्का प्लास्टर करने के लिए समय दिया है। जिला अस्पताल से कैल्शियम और दर्द की गोली मिल गई, लेकिन 954 रुपये की दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ी।

केस चार

कुछ दवाएं बाहर से खरीदीं

कुलदीप श्रीवास्तव को बुखार के साथ खांसी की समस्या थी। जिला अस्पताल से एंटीबायोटिक और बुखार की दवाएं मिल र्गइं। कुछ जांच डॉक्टर ने लिखे थे, जिसे पैथालॉजी में निशुल्क करा लिया। कुछ दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ी। उनका कहना था कि जिला अस्पताल की व्यवस्था में पहले की अपेक्षा सुधरी है।

 

जन औषधि केंद्र की नहीं लिख रहे दवाएं
जिला अस्पताल परिसर में जन औषधि केंद्र है। इसमें दवाओं का स्टाक ठीक है, लेकिन डॉक्टर जन औषधि केंद्र की दवाएं नहीं लिख रहे हैं। जबकि, यह दवाएं जेनरिक होने से बाजार से 70 से 80 गुना सस्ती होती हैं। बाजार में जिस एंटीबायोटिक की कीमत 200 रुपये के आसपास है, वही जन औषधि केंद्र पर 30 से 40 रुपये में मिल जाती है।  

जिला अस्पताल में 326 की जगह 297 दवाएं
जिला अस्पताल में 326 तरह की दवाएं होनी चाहिए। इनमें से 297 तरह की दवाएं मौजूद हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत खांसी, चर्म रोग, आर्थो के मरीजों को हो रही है। इन मरीजों को दी जाने वाली खांसी की सीरप, खुजली की ट्यूब, आई ड्रॉप, पेन किलर और एंटीबायोटिक, गैस जैसी मामूली दवाएं मरीजों को नहीं मिल पा रही हैं।

बाहर से करानी पड़ रही टीएमटी और इको जांच  
जिला अस्पताल में सबसे अधिक दिक्कत हृदय रोगियों को हो रही है। हृदय रोग विभाग में 70 से 80 मरीज इलाज के लिए प्रतिदिन पहुंचते हैं। इनमें 25 से 30 मरीजों को टीएमटी और इको जांच करानी पड़ती है। यह जांच मजबूरी में मरीज बाहर से करा रहे हैं, क्योंकि यह दोनों मशीन एक साल से जिला अस्पताल में खराब पड़ी हैं। हृदय रोगियों को भी बाहर से दवा खरीदनी पड़ रही है। हृदय रोग की दवाएं काफी महंगी हैं, जो अस्पताल से नहीं मिल रही हैं।

जिला अस्पताल सीएमएस डॉ अंबुज ने कहा कि जिला अस्पताल में सभी तरह की दवाएं उपलब्ध हैं। डॉक्टरों को बाहर की दवा नहीं लिखनी है। इस पर मनाही है। मरीज स्वेच्छा से अगर बाहर की दवा लिखवाने की बात कहता है, तो उसमें अस्पताल प्रशासन कुछ नहीं कर सकता। पैथालॉजी जांचें और एक्स-रे तक अस्पताल में किया जा रहा है। 

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