500 पहलवानों का भविष्य अंधेरे में, न होगी पदकों की गिनती और ना मिलेंगी सुविधाएं
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मिट्टी के अखाड़े में कुश्ती लड़ने वाले जिले के करीब 500 पहलवानों का भविष्य अंधेरे में है। चूंकि यह कुश्ती अब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होनी बंद हो गई है।
ऐसे में इस कुश्ती के पहलवान स्पोर्ट्स कोटे का लाभ नहीं उठा सकेंगे। इन पहलवानों के न तो पदकों की गिनती होगी और न ही उन्हें किसी विभाग में खेल कोटे के तहत नौकरी मिलेगी।
जानकारी देते हुए जिला कुश्ती कोच विचित्र ने बताया कि मिट्टी और मैट वाली दो तरह की कुश्ती होती है, लेकिन मिट्टी वाली कुश्ती राज्य स्तर तक ही सीमित रह गई हैं, नेशनल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब मैट वाली कुश्ती खेली जाती है।
सभी अखाड़ों में मिट्टी वाली कुश्ती
मिट्टी वाले पहलवान मैट वाली कुश्ती में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। नेशनल और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के ट्रायल में क्वालीफाई न कर पाने के कारण वह इनसे वंचित रह जाते हैं।
वहीं मिट्टी की कुश्ती लडने वाले पहलवानों को केवल दंगल में ही नकद पुरस्कार राशि मिलती है। उन्हें राज्य और केंद्र सरकार के तहत स्पोर्ट्स कोटे का कोई लाभ नहीं दिया जाता। जिले में करीब 25 अखाड़े है, जिसमें सिर्फ मिट्टी वाली कुश्ती ही खेली जाती है।
जिलेभर में मात्र खेल परिसर को छोड़ कर कोई भी गांव या कोई ऐसा अखाड़ा नहीं हैं, जहां मैट वाली कुश्ती का प्रशिक्षण दिया जाता हो, लीलू पहलवान ने बताया कि कई बार खेल विभाग से मैट की मांग की गई है, लेकिन कोई सुविधा पहलवानों को नहीं मिलती।
खेल परिसर में भी सुविधाएं नहीं
यहीं कारण है कि बड़ी बड़ी प्रतियोगिताओं में जिले का कोई भी खिलाड़ी शामिल नहीं हो पाता। इसका उदाहरण हाल में हुई एक करोड़ की कुश्ती प्रतियोगिता है।
विचित्र ने बताया कि मैट वाली कुश्ती 72 मैट पर खेली जाती हैं, लेकिन परिसर में अभी 32 मैट है। जिनकर अभ्यास करवाने में परेशानी होती है। उन्होंने खेल विभाग से मैट की मांग की है।
इसके साथ वह कुश्ती के स्तर को उठाने में जुट गए है। इनका कहना है कि 8 से 12 साल का कोई भी बच्चा पहलवानी में अपना भविष्य संवार सकता है।