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Noida News: छात्र-छात्राओं को दंड देने पर प्रतिबंध, होगी सख्त कार्रवाई
Fri, 17 Oct 2025 12:49 AM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
Updated Fri, 17 Oct 2025 12:49 AM IST
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- दंड देने वाले पर अनुशासनिक कार्रवाई के साथ ही दर्ज होगा केस
- जांच में दोषी विद्यालयों का मान्यता व अनुदान का होगा प्रत्याहरण
सिद्धार्थनगर। सभी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को शारीरिक दंड और मानसिक यातना दिए जाने पर संबंधित के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होगी। अपर मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन दीपक कुमार ने बीएसए को भेजे पत्र में इसके संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसके तहत ऐसी शिकायतों का त्वरित जांचकर दोषी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के साथ ही केस दर्ज कराया जाएगा। साथ ही ऐसे विद्यालयों की मान्यता प्रत्याहरण या अनापत्ति प्रमाण पत्र वापस लेने की कार्रवाई होगी। वहीं अनुदानित सूची में शामिल ऐसे विद्यालयों के अनुदान प्रत्याहरण की भी कार्रवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल तुषार गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य याचिका पर दिए गए आदेश के बाद प्रदेश सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सभी बीएसए को पत्र भेज विद्यालयों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को दंड दिए जाने पर प्रतिबंध तथा सुरक्षा एवं संरक्षा संबंधी निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत यह प्रावधान है कि किसी बच्चे को शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा अथवा उसका मानसिक उत्पीड़न नहीं किया जाएगा। जो कोई इसका उल्लंघन करेगा, उसके विरुद्ध सेवा नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त अधिनियम में बच्चे के शिक्षा के अधिकार को मॉनिटर करना तथा शिकायतों को दूर करने का प्रावधान किया गया है। स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करने का उत्तरदायी होगा कि विद्यालय में किसी बालक के साथ जाति, वर्ग, धर्म अथवा लिंग आधारित दुर्व्यवहार या भेदभाव न किया जाए। स्थानीय प्राधिकारी यह भी सुनिश्चित करेगा कि कक्षा में, मध्याह्न भोजन के दौरान, खेल के मैदानों में, सामान्य पेयजल एवं प्रसाधन सुविधाओं के प्रयोग में एवं प्रसाधनों अथवा कक्षाओं की सफाई में कमजोर और साधनहीन वर्ग के बालकों के साथ कोई विभेदकारी अथवा अलगाववादी व्यवहार न किया जाए।
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सुरक्षा प्रदान करना विद्यालयों का दायित्व
विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को शारीरिक एवं मानसिक सुरक्षा प्रदान करना एक प्रमुख दायित्व है। विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चे भविष्य के उत्कृष्ट नागरिक बन सकें, इसके लिए विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण सृजन किया जाना आवश्यक है, जिससे बच्चे बिना किसी डर और विभेद के शिक्षा ग्रहण कर सकें। छात्रों को उनके अधिकारों से परिचित कराने तथा उनके प्रति भेदभाव न किये जाने के संबंध में सुरक्षा एवं संरक्षा की जानकारी अध्यापकों को दी जाए।
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उत्पीड़न पर प्रतिबंधित
विद्यालयों में शिक्षक व सहपाठियों की ओर से शारीरिक उत्पीड़न जिसमें पंच मारना, नोचना, धक्का देना, लात मारना, थप्पड़ मारना, कान ऐंठना, हाथ, छड़ी व लोहे की रॉड से मारना, उंगली के पोर पर मारना, बच्चे की पीठ पर मारना, एक बच्चे के सिर को दूसरे बच्चे के सिर से लड़ाना, बच्चे को किताब कॉपी न लाने के लिए खड़ा करना, बच्चे के सिर पर वजन रखकर आदि प्रतिबंधित है। साथ ही बच्चे मुर्गा बनाकर, धूप में खड़ा करना या किसी प्रकार का भावात्मक उत्पीड़न, मौखिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक व यौन उत्पीड़न को भी प्रतिबंधित किया गया है।
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उत्पीड़न रोकने के लिए होगी यह व्यवस्था
प्रत्येक विद्यालय में प्रधानाध्यापक कक्ष के बाहर एक शिकायत पेटिका रखी जाएगी, जिसमें छात्र-छात्राएं अपनी शिकायत बिना भय के डाल सकें। संस्था प्रबंधक का दायित्व होगा कि वह प्रतिदिन पेटिका खोलकर प्राप्त शिकायत पर तुरंत जांचकर कार्रवाई करें। सभी विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को जागरूक करते हुए उत्पीड़न के विरोध में सजग करते हुए उनके अंदर आत्मविश्वास जागृत किया जाए। घटना प्रकाश में आने समझौता के लिए कोई दबाव बनाने व छुपाने का प्रयास नहीं होना चाहिए।
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विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को दंड दिए जाने पर प्रतिबंध तथा सुरक्षा एवं संरक्षा संबंधी शासनादेश के निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराया जाएगा। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
- शैलेश कुमार, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी
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- जांच में दोषी विद्यालयों का मान्यता व अनुदान का होगा प्रत्याहरण
सिद्धार्थनगर। सभी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को शारीरिक दंड और मानसिक यातना दिए जाने पर संबंधित के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होगी। अपर मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन दीपक कुमार ने बीएसए को भेजे पत्र में इसके संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसके तहत ऐसी शिकायतों का त्वरित जांचकर दोषी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के साथ ही केस दर्ज कराया जाएगा। साथ ही ऐसे विद्यालयों की मान्यता प्रत्याहरण या अनापत्ति प्रमाण पत्र वापस लेने की कार्रवाई होगी। वहीं अनुदानित सूची में शामिल ऐसे विद्यालयों के अनुदान प्रत्याहरण की भी कार्रवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल तुषार गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य याचिका पर दिए गए आदेश के बाद प्रदेश सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सभी बीएसए को पत्र भेज विद्यालयों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को दंड दिए जाने पर प्रतिबंध तथा सुरक्षा एवं संरक्षा संबंधी निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिए गए हैं, जिसमें बताया गया है कि निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत यह प्रावधान है कि किसी बच्चे को शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा अथवा उसका मानसिक उत्पीड़न नहीं किया जाएगा। जो कोई इसका उल्लंघन करेगा, उसके विरुद्ध सेवा नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त अधिनियम में बच्चे के शिक्षा के अधिकार को मॉनिटर करना तथा शिकायतों को दूर करने का प्रावधान किया गया है। स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करने का उत्तरदायी होगा कि विद्यालय में किसी बालक के साथ जाति, वर्ग, धर्म अथवा लिंग आधारित दुर्व्यवहार या भेदभाव न किया जाए। स्थानीय प्राधिकारी यह भी सुनिश्चित करेगा कि कक्षा में, मध्याह्न भोजन के दौरान, खेल के मैदानों में, सामान्य पेयजल एवं प्रसाधन सुविधाओं के प्रयोग में एवं प्रसाधनों अथवा कक्षाओं की सफाई में कमजोर और साधनहीन वर्ग के बालकों के साथ कोई विभेदकारी अथवा अलगाववादी व्यवहार न किया जाए।
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सुरक्षा प्रदान करना विद्यालयों का दायित्व
विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को शारीरिक एवं मानसिक सुरक्षा प्रदान करना एक प्रमुख दायित्व है। विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चे भविष्य के उत्कृष्ट नागरिक बन सकें, इसके लिए विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण सृजन किया जाना आवश्यक है, जिससे बच्चे बिना किसी डर और विभेद के शिक्षा ग्रहण कर सकें। छात्रों को उनके अधिकारों से परिचित कराने तथा उनके प्रति भेदभाव न किये जाने के संबंध में सुरक्षा एवं संरक्षा की जानकारी अध्यापकों को दी जाए।
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उत्पीड़न पर प्रतिबंधित
विद्यालयों में शिक्षक व सहपाठियों की ओर से शारीरिक उत्पीड़न जिसमें पंच मारना, नोचना, धक्का देना, लात मारना, थप्पड़ मारना, कान ऐंठना, हाथ, छड़ी व लोहे की रॉड से मारना, उंगली के पोर पर मारना, बच्चे की पीठ पर मारना, एक बच्चे के सिर को दूसरे बच्चे के सिर से लड़ाना, बच्चे को किताब कॉपी न लाने के लिए खड़ा करना, बच्चे के सिर पर वजन रखकर आदि प्रतिबंधित है। साथ ही बच्चे मुर्गा बनाकर, धूप में खड़ा करना या किसी प्रकार का भावात्मक उत्पीड़न, मौखिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक व यौन उत्पीड़न को भी प्रतिबंधित किया गया है।
उत्पीड़न रोकने के लिए होगी यह व्यवस्था
प्रत्येक विद्यालय में प्रधानाध्यापक कक्ष के बाहर एक शिकायत पेटिका रखी जाएगी, जिसमें छात्र-छात्राएं अपनी शिकायत बिना भय के डाल सकें। संस्था प्रबंधक का दायित्व होगा कि वह प्रतिदिन पेटिका खोलकर प्राप्त शिकायत पर तुरंत जांचकर कार्रवाई करें। सभी विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को जागरूक करते हुए उत्पीड़न के विरोध में सजग करते हुए उनके अंदर आत्मविश्वास जागृत किया जाए। घटना प्रकाश में आने समझौता के लिए कोई दबाव बनाने व छुपाने का प्रयास नहीं होना चाहिए।
विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को दंड दिए जाने पर प्रतिबंध तथा सुरक्षा एवं संरक्षा संबंधी शासनादेश के निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराया जाएगा। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
- शैलेश कुमार, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी